Saturday, January 25, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 15 : छोटी छोटी गल दा बुरा न मनाया कर Choti Choti Gal

अर्जुन हरजाई के संगीत से मेरी पहली मुलाकात लखनऊ सेंट्रल के गीत रंगदारी से हुई थी। उस गीत के बारे में बात करते हुए मैंने आपको बताया था कि किस तरह गीतकार कुमार (यानी कुमार राकेश)अर्जुन के लिए फिल्म जगत में कृष्ण सदृश सारथी साबित हुए थे। लखनऊ सेंट्रल 2017 में आई थी। पिछले दो सालों में फिल्मों में अर्जुन का काम बहुत दिखाई तो नहीं दिया पर ये खबर जरूर मिली कि इसी बीच वो अपनी स्कूल की प्रेमिका से परिणय सूत्र में बँध गए। पिछले साल उनके संगीतबद्ध गीत जज़मेंटल है क्या और मोतीचूर चकनाचूर जैसी फिल्मों में सुनाई दिए। 


अब क्रिकेट की भाषा में कहूँ तो उन्हें जो दो गेंदे मिलीं उसमें एक में उन्होंने छक्का लगा दिया। ज़ाहिर सी बात है उनके सारथी कुमार का भी इस सफलता में बराबर का हाथ रहा। कुमार को मैं आज के युग का आनंद बक्षी मानता हूँ। वे ज़मीन से उठे एक प्रतिभाशाली गीतकार हैं। जनता की नब्ज़ समझते हैं। कुमार अक़्सर कहा भी करते हैं कि गीतों में वो ऐसी हुकलाइन बनाने की कोशिश करते हैं जो समाज के परिवेश से निकल कर आई हो।
अगर अपनी बात करूँ तो उनके लिखे तमाम गीतों में मेरे निशां हैं कहाँ, मुझे जो भेजी थी दुआ, पानियों सा, रंगदारी, तेरा यार हूँ मैं बेहद पसंद हैं और इस फेरहिस्त में संगीतमाला की ग्यारहवीं पायदान का ये गीत भी शामिल हो गया है। इस साल की संगीतमाला में भी उनके लिखे तीन गीत हैं जिसमें दूसरा आज आप सुनेंगे।

अर्जुन हरजाई व कुमार राकेश 
फिल्म मोतीचूर चकनाचूर की नायिका का ख़्वाब है कि उसे ऍसा पति मिले जो "फॉरेन" यानी विदेशी धरती में ज़िंदगी गुजार रहा हो। अपने सपने को सच करने के लिए वो पड़ोस के अधेड़ लड़के से भी शादी के लिए तैयार हो जाती है पर उसकी नौकरी का सच जानकर नायिका के अरमानों पर ग्रहण लग जाता है।

पति पत्नी के इसी मनमुटाव पर कुमार को गीत लिखना था और उन्होंने बेहद प्यारा मुखड़ा लिखा छोटी छोटी गल दा बुरा न मनाया कर.. जे मैं मनावा मन वी जाया कर। अब कौन ऐसा होगा जो छोटी छोटी बातों पर रूठा ना हो या उसने ऐसी किसी बात पे किसी को माया ना हो।

यही वज़ह है कि जिसने भी इस गीत की मधुर धुन के साथ जब कुमार के इन बोलों को सुना तो उसे दिल में बसा लिया। कुमार की मूल भाषा वैसे भी पंजाबी है पर पंजाबी का इस्तेमाल करते हुए भी उन्होंने गीत का स्वरुप ऐसा रखा है जिसे हिंदीभाषी भी समझ सकें। मुखड़े की पकड़ को कुमार अंतरों में भी बनाए रखते हैं।

अर्जुन ने गीत में तबले के आलावा बाँसुरी और क्लारिनेट का प्रयोग किया है। इस गीत को गाने वाले भी वहीं हैं और उनके इस गीत की सफलता ये बताती है कि उनकी आवाज़ लोगों के दिलों तक पहुँची है। तो आइए सुनते हैं उनका गाया ये गीत


मिन्नतां करां मैं तां तेरियाँ वे
करे या न करे हेरा फेरियाँ वे
मिन्नतां करां मैं तां तेरियाँ वे
करे या न करे हेरा फेरियाँ वे

तेरे ही यकीण ते, मैं तां लग्गा जीण वे
दिल न दुखाया कर..
छोटी छोटी गल दा बुरा न मनाया कर
जे मैं मनावा मन वी जाया कर
छोटी छोटी गल दा बुरा न मनाया कर
जे मैं मनावा मन वी जाया कर

तू न पहचाने रब मेरा जाने
यारियां मैं पाइयां सच्चियाँ
जन्मा दे लायी दिल जोड़ेया मैं
डोरा न समझ कच्चियाँ
मैनू लग्गे डर वे, मैं जावां मर वे
अँख न चुराया कर
छोटी छोटी गल ...मन वी जाया कर

रूहां उत्ते तेरा नाम लिखेया मैं, कागज ना समझ कोई वे
छड के मैं सारी दुनियां ओ माही, इक बस तेरी होइ वे
तैनू दित्ता हक़ वे मैनु कोल रख वे
हथ न छुड़ाया कर
छोटी छोटी गल ...मन वी जाया कर


वार्षिक संगीतमाला में अब तक
12. ओ राजा जी, नैना चुगलखोर राजा जी  Rajaji
13. मंज़र है ये नया Manzar Hai Ye Naya 
14. ओ रे चंदा बेईमान . बेईमान..बेईमान O Re Chanda
15.  मिर्ज़ा वे. सुन जा रे...वो जो कहना है कब से मुझे Mirza Ve
16. ऐरा गैरा नत्थू खैरा  Aira Gaira
17. ये आईना है या तू है Ye aaina
18. घर मोरे परदेसिया  Ghar More Pardesiya
19. बेईमानी  से.. 
20. तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ? Kaise Hua
21. तेरा बन जाऊँगा Tera Ban Jaunga
22. ये जो हो रहा है Ye Jo Ho Raha Hai
23. चलूँ मैं वहाँ, जहाँ तू चला Jahaan Tu chala 
24.रूह का रिश्ता ये जुड़ गया... Rooh Ka Rishta 

Friday, January 24, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 15 : मिर्ज़ा वे. सुन जा रे...वो जो कहना है कब से मुझे Mirza Ve

वार्षिक संगीतमाला का अगला गीत है फिल्म मरुधर एक्सप्रेस से। जानता हूँ इस फिल्म का नाम भी आपने शायद ही सुना होगा। यूँ तो इसका संगीत काफी पहले रिलीज़ हुआ था पर ये फिल्म पिछले साल जुलाई में रिलीज़ हुई और एक एक्सप्रेस ट्रेन की तरह सिनेमाघरों में बिना ज्यादा देर रुके फिल्मी पर्दे से उतर गयी। 


इस फिल्म का संगीत दिया था एक समय प्रीतम के जोड़ीदार रह चुके जीत गांगुली ने। फिल्म का तो पता नहीं पर एलबम में इस गीत के दो अलग वर्जन थे। एक में उर्जा से भरपूर सोनू निगम की आवाज़ थी तो दूसरी ओर इस गीत के अपेक्षाकृत शांत रूप को असीस कौर ने निभाया था। जीत का संगीत संयोजन वहाँ भी बेहतरीन है पर असीस उसे और बेहतर गा सकती थीं ऐसा मुझे लगा। सोनू निगम को भले ही आज के दौर में गाने के ज़्यादा  मौके नहीं मिलते पर इस छोटे बजट की फिल्म के लिए भी अपना दम खम लगा कर ये गीत निभाया है।

संगीतमाला में अगर ये गीत शामिल हो सका है उसकी एक बड़ी वज़ह जीत गाँगुली की धुन और संगीत संयोजन है जिसकी वज़ह से ये गीत तुरंत मन में स्थान बना लेता है। जीत ने एक सिग्नेचर ट्यून का इस्तेमाल किया है जो मुखड़े के पहले और अंतरे में बार बार बजती है और कानों को बड़ी भली लगती है। 

गीत का मूड रूमानी है और मनोज मुंतशिर की कलम तो ऐसे गीतों पर बड़ी सहजता से चलती है। मनोज सहज भाषा में अपने गीतों में कविता का पुट देने में माहिर रहे हैं। हाँ ये जरूर है कि इस गीत का लिबास तैयार करते हुए उन्होंने उर्दू शब्दों के गोटे जरूर जड़ दिए हैं जिससे गीत की खूबसूरती बढ़ जरूर गई है। मिसाल के तौर पर जब वो प्रेमिका को कहते हैं कि उसे एक पल भी नहीं भूले हैं तो उसका विश्वास पुख्ता हो उसके लिए वो आकाशगंगा के ग्रहों की गवाही लेना नहीं भूलते और गीत में लिखते हैं शाहिद (गवाह) हैं सय्यारे (सारे ग्रह)...इक पल मैं ना भूला तुझे।

शहरे दिल की रौनक तू ही, तेरे बिन सब खाली मिर्ज़ा...
तू ही बता दे कैसे काटूँ, रात फ़िराक़ा वाली मिर्ज़ा...
मिर्ज़ा वे. सुन जा रे...वो जो कहना है कब से मुझे
शाहिद हैं. सय्यारे...इक पल मैं ना भूला तुझे
मिर्ज़ा तेरा कलमा पढ़ना, मिर्ज़ा तेरी जानिब बढ़ना
तेरे लिए ख़ुदा से लड़ना, मिर्ज़ा मेरा जीना-मरना
सिर्फ़ तेरे इशारे पे है..ओ... सिर्फ़ तेरे इशारे पे है...

चाँद वाली रातों में, तेरी शोख़ यादों में
डूब-डूब जाता है यह दिल
मोंम सा पिघलता है, बुझता ना जलता है
देख तू कभी आ के ग़ाफ़िल
मिर्ज़ा वे. सुन जा रे.
वो जो कहना है कब से मुझे....

ओ ख़ुदाया सीने में ज़ख़्म इतने सारे हैं
जितने तेरे अंबर पे तारे...
जो तेरे समंदर हैं, मेरे आँसुओं से ही
हो गये हैं खारे-खारे
मिर्ज़ा वे. .....

(ग़ाफ़िल - अनिभिज्ञ, फ़िराक़ - वियोग, जानिब - तरफ, सय्यारे - ग्रह)

सोनू ने काफी द्रुत ताल में इस गीत को निभाया है। अगर आप सोनू निगम की गायिकी के अंदाज़ के मुरीद हैं तो इस गीत को आप जरूर पसंद करेंगे।

 

वार्षिक संगीतमाला में अब तक
23. चलूँ मैं वहाँ, जहाँ तू चला Jahaan Tu chala 
24.रूह का रिश्ता ये जुड़ गया... Rooh Ka Rishta 

Wednesday, January 22, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 15 : मंज़र है ये नया, मंज़र नया Manzar Hai Ye Naya

कलंक, मणिकर्णिका, कबीर सिंह और घोस्ट जैसी फिल्मों  के साथ साथ पिछले साल एक और फिल्म थी जिसका संगीत काफी सराहा गया था। ये फिल्म थी उरी दि सर्जिकल स्ट्राइक। फिल्म का संगीत दिया था प्रतिभाशाली संगीतकार शाश्वत सचदेव ने। अपने शानदार बोलों व संगीतके साथ इस फिल्म का जो गीत मेरी वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं पायदान पर जगह बनाने में सफल हुआ वो है अभिरुचि चंद का लिखा मंज़र है ये नया। 

पहली बार जब गीत का मुखड़ा मेरे कानों में गूँजा..... काँधे पे सूरज टिका के चला तू .....तो लगा कि अरे ये कहीं गुलज़ार साहब की रचना तो नहीं क्यूँकि वो इस तरह के बिंब का इस्तेमाल करने में माहिर हैं। बहुत बाद में मुझे ये जानकारी हुई कि इस गीत को नवोदित गीतकार अभिरुचि ने लिखा है और गीत की उनकी शैली को देख मुझे ये समझते देर नहीं लगी कि वो जरूर हम लोगों की तरह गुलज़ार की शैदाई होंगी।


देशप्रेम से ओतप्रेम इस फिल्म के गीत संगीत से यही अपेक्षा थी कि वो  श्रोताओं को एक जोश और उमंग से भर दे। आख़िर यही तो वो फिल्म थी जिसने How is the Josh ! वाले जुमले को हिंदुस्तान के बच्चे बच्चे की जुबाँ पर ला दिया था। अभिरुचि के लिखे शानदार बोलों की मदद से गायक शांतनु सुदामे और संगीतकार शाश्वत सचदेव ये करने में बेहद सफल रहे।

शाश्वत की प्रतिभा से तो मैं आपको फिल्लौरी के गीत साहिबा... साहिबा...चल वहाँ जहाँ मिर्जा में करा ही चुका हूँ। मैंने तब आपको बताया था कि डॉक्टर पिता और प्रोफेसर माँ का ये जयपुरी लाल संगीत में शुरुआत से रुचि रखने के बाद भी माँ के कहने पर कानून की पढ़ाई पढ़ गया। फिर विदेशों के अलग संगीत समूहों के साथ काम करके जब भारत लौटा तो अपनी पहली ही फिल्म में उसने अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ दिए। 

पियानों और की बोर्ड में निपुण शाश्वत का संगीत संयोजन यहाँ भी ध्यान खींचता है। गिटार पर यंगमिन और ताल वाद्यों पर शिवमणि की झंकार के साथ संगीत का सबसे सुरीला टुकड़ा गीत के अंत में तब आता है जब राजू धूमल की बजाई शहनाई गूँज उठती है। शाश्वत को नए नए वाद्ययंत्रों और आवाज़ के साथ प्रयोग करने का बड़ा शौक़ रहा है। इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए वो जर्मनी से अपने मन का सिंथिसाइज़र उठा कर लाए।

अभिरुचि चंद व शाश्वत सचदेव
फिल्लौरी में शाश्वत का काम देख अभिरुचि ने उनके साथ काम करने की इच्छा ज़ाहिर की थी। शाश्वत ने उन्हें ये मौका उरी के एक गीत में दे दिया और क्या कमाल के बोल लिखे अभिरुचि ने।  पेशे से वो एक पत्रकार थीं पर कविता से अपने लगाव की वजह से टाइम्स आफ इंडिया की नौकरी छोड़कर दिल्ली से मुंबई आ गयीं। फिल्मों में पटकथा लेखन के आलावा बतौर गीतकार उन्होंने कपूर एंड संस, NH10, अक्टूबर जैसी फिल्मों के चंद गीत लिखे है।

अभिरुचि द्वारा लिखी गीत की शुरुआती पंक्तियों में वो ताकत है जिसे पढ़कर ही खून में एक गर्मी सी आने लगती है और मन गीत के साथ बहने लगता है। ये गीत यूँ तो फिल्म में सेना के खास मिशन में जा रहे सैनिकों में दम खम भरता है पर ये उन सभी लोगों को उतना ही भाएगा जो पूरे जोश व जुनून के साथ अपनी मंजिलों की तलाश में दिन रात कर्मठता से लगे हुए हैं। 


काँधे पे सूरज, टिका के चला तू
हाथों में भर के चला बिजलियाँ
तूफां भी सोचे, ज़िद तेरी कैसी
ऐसा जुनून है किसी में कहाँ
बहता चला तू, उड़ता चला तू
जैसे उड़े बेधड़क आँधियाँ
बहता चला तू, उड़ता चला तू
जैसे उड़े आँधियाँ
मंज़र है ये नया, मंज़र नया
मंज़र है ये नया
कि उड़ रही है बेधड़क सी आँधियाँ
...
कँपते थे रस्ते, लोहे से बस्ते
बस्ते में तू भर चला आसमान
आएँगी सदियाँ, जाएँगी सदियाँ
रह जाएँगे फिर भी तेरे निशां
बहता चला तू..... आँधियाँ

तो आइए शांतनु की जानदार आवाज़ में सुनते हैं ये गाना


वार्षिक संगीतमाला में अब तक
23. चलूँ मैं वहाँ, जहाँ तू चला Jahaan Tu chala 
24.रूह का रिश्ता ये जुड़ गया... Rooh Ka Rishta 

Monday, January 20, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 15 : ओ रे चंदा बेईमान . बेईमान..बेईमान O Re Chanda

अक्सर लोगों को शिकायत रहती है कि आजकल के गीतों में पुराने गीतों सी ना मिठास है और ना ही उनके शब्दों में भावनाओं का आवेग झलकता है। वार्षिक संगीतमाला की चौदहवीं पायदान पर फिल्म 72 hours का ये गीत आप की इन दोनों शिकायतों को दूर करेगा ऐसा मुझे विश्वास है। 

इस गीत की मधुरता आप तक पहुँचेगी श्रेया घोषाल  की आवाज़ में और गीत के बेहद प्यारे बोलों को लिखने वाली हैं सीमा सैनी। भारत चीन युद्ध के अमर शहीद राइफल मैन जसवंत सिंह रावत पर बनाई गयी फिल्म ठीक एक साल पहले जनवरी 2019 में रिलीज़ हुई थी। फिल्म तो बॉक्स आफिस पर ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाई पर फिल्म के लिए बने गीतों में से एक गीत ओ रे चंदा जरूर अपनी पहचान छोड़ गया।


सीमा सैनी कितनी प्रतिभाशाली  कवयित्री है ये मुझे पहली बार वर्ष 2011 में उनके फिल्म लंका के लिए लिखे गीत शीत लहर को सुन कर लग गया था। तब उन्होंने एक दबंग नेता द्वारा अपहृत लड़की की वेदना को कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया था

शीत लहर है, भीगे से पर हैं... थोड़ी सी धूप माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और...ठहरा हुआ कुछ पानी है..."

उसी गीत में उन्होंने आगे लिखा था

तिनका तिनका रात उधेड़ो, दिन आज़ाद है कह दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना

सीमा किस तरह सिविल इंजीनियरिंग के पेशे से निकल कर मायावी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने पहुँची ये दास्तान तो पहले यहाँ लिखी थी। सीमा ने पिछले आठ सालों में गीत लिखने के साथ साथ वेब सिरीज और मास्टर शेफ की मास्टर क्लास जैसे शोज़ के लेखन का काम भी सँभाला है। आगे उनका अपने लिखे गानों को संगीत देने का इरादा है। जब भी वो कोई गीत लिखती हैं तो मन ही मन में उसका मीटर भी बन रहा होता है। उनका मानना है कि उन्हें अपने अंदर के संगीतकार को भी बाहर निकलने का मौका देना चाहिए। देखते हैं मेरे जैसे श्रोताओं को उनका संगीतबद्ध गीत कब तक सुनने को मिलता है?

सीमा की ये झोली में ये गीत तब गिरा जब एक मित्र ने उनकी मुलाकात संजय बोस से करवाई। संजय इस फिल्म के लिए एक काव्यात्मक गीत की तलाश में थे। उन्होंने सीमा का लिखा शीत लहर सुना था इसलिए बात जल्दी ही बन गयी।  
श्रेया घोषाल व सीमा सैनी
शीत लहर के  गीत में एक गहरी पीड़ा थी पर 72 hours के इस गीत में एक मीठी सी उलाहना है। फौजी की प्रेमिका के पास शिकायत करने के आलावा चारा ही क्या है। प्रियतम हैं कि देश की सेवा में सरहद पर जाकर बैठे हैं।  ये भी तो पता नहीं है कि किस हाल में हैं?  ना कोई संदेश ना कोई खबर ही। पर नायिका शिकायत करे तो किससे? 

अब ये सीमा की लेखनी का कमाल है कि इस गीत में उन्होंने चाँद को अभियुक्त बना कर कटघरे में खड़ा कर दिया। वैसे मजरूह साहब ने चाँद फिर निकला, मगर तुम ना आए  लिखते हुए चाँद से प्रियतम की याद को जरूर जोड़ा था पर सीमा ने तो एक कदम आगे बढ़कर उसे बेईमान ही बता दिया। बेईमान यूँ कि इधर नायिका की आँखें प्रियतम की बाट जोह रही हैं और ये मुआ चंद्रमा उसके प्रेमी पर नज़र रखते हुए भी उधर की खबर इधर नहीं पहुँचा रहा। उसके इंतज़ार की पीड़ा जब सुबह ओस रूपी आँसू बन कर निकलती है तो उसमें भी चंद्रमा का मुस्कुराता प्रतिबिंब उसे कचोटता रहता है। इसीलिए सीमा लिखती हैं... 

ओ रे चंदा बेईमान रे..ओ रे चंदा बेईमान रे
ऐ सुबह तू संदेशा देना, हम अधूरे हैं उनसे कहना
ना साँस आए ना राम रे, ओ रे चंदा बेईमान रे

तरसे जिसको मोरे नैन चंदा, तू दिखे उसे सारी रैन चंदा
मैं जल जाऊँ तुझसे ओ चंदा, हाय लगाऊँ तुझपे ओ चंदा

एहसास तेरा ले के आए, छू के तुझे आए हवाएँ
सुबह बूँद बन के पलकों पे आई, तू ओस में मुस्कुराए
ओ रे चंदा बेईमान बेईमान बेईमान


शीत लहर के गीत की तरह ही इस गीत को भी श्रेया ने गाया है और क्या गजब गाया है। सीमा का शिकायती लहजा उनकी आवाज़ में जीवंत हो उठा है। गीत की धुन संजय बोस ने बनाई जो श्रेया के हिस्से तक अत्यंत मधुर लगती है।  नायक के मनोभावों को व्यक्त करता गीत का अंतिम हिस्सा खुद संजय बोस ने गाया है।

ना मुलाकात, ना तुझसे कोई बात है
मैं जानता हूँ इन दिनो जो तेरे मेरे हालात हैं
एक सपना आँखों में दस्तक दे रहा
फिर मिले वो वादियाँ और तू साथ है
फिर मिलेंगे हम फिर गिरेगी बर्फ


इस गीत से जुड़ी बातें शेयर करने के लिए सीमा ने एक शाम मेरे नाम के लिए वक़्त निकाला उसके लिए मैं उनका हार्दिक आभारी हूँ।

Saturday, January 18, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 15 : ओ राजा जी, नैना चुगलखोर राजा जी Rajaji

एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला अब उस हिस्से में पहुँच गयी है जहाँ से ऊपर बजने वाला हर एक गीत मेरे दिल के बेहद करीब है। मेरा यकीन है कि इन पन्द्रह गीतों में से आधे गीत ऐसे होंगे जिनको आपने शायद पिछले साल सुना ही नहीं होगा। ऊपर की इन पन्द्रह पायदानों में जो पहला गीत है वो है फिल्म मणिकर्णिका से। 


आप तो जानते ही हैं कि इस फिल्म के गीत लिखे हैं प्रसून जोशी ने और साल के इस बेहतरीन एलबम के संगीतकार हैं शंकर एहसान लॉय! ये हस्तियाँ तो इतनी नामी हैं कि उनके बारे में आज ना बात करते हुए मैं आपको मिलवाना चाहूँगा इस गीत की गायिका प्रतिभा सिंह बघेल से। प्रतिभा की बहुमुखी प्रतिभा की झलकियाँ मैं पिछले एक दशक से देख रहा हूँ पर बतौर पार्श्व गायिका उन्हें इतना बड़ा ब्रेक मिलता देख मुझे दिल से खुशी हुई।

मध्यप्रदेश के शहर रीवाँ से ताल्लुक रखने वाली प्रतिभा भी सा रे गा मा पा के मंच की ही खोज हैं। वर्ष 2008 के चैलेंज में सा रे गा मा पा लक्ष्य घराने से अंतिम पाँच में जगह बनाने वाली प्रतिभा पिछले एक दशक से बतौर पार्श्व गायिका अपना मुकाम बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। ऐसा नहीं हैं कि उन्हें फिल्मों में इसके पहले गाने के अवसर नहीं मिले। आपने उनके गाए गीत इसक, शोरगुल, बॉलीवुड डायरीज़, हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया जैसी फिल्मों में सुने होंगे पर सा रे गा मा पा के अपने पहले गुरु शंकर महादेवन द्वारा दिया गया अवसर इस पुलिस इंस्पेक्टर की बेटी के लिए एक विशेष मायने रखता है। 

कंगना रणावत जैसी अभिनेत्री और भारतीय इतिहास की वीर नायिका रानी लक्ष्मी बाई की आवाज़ बनना उनके कैरियर के लिए एक अहम पड़ाव होगा ऐसा मुझे लगता है। प्रतिभा एक ऐसे परिवार में पली बढ़ी हैं जहाँ गाने और बजाने का शौक तो सबको था पर इसे बतौर कैरियर अपनाने का काम अपने काका के बाद प्रतिभा ने ही किया।

शास्त्रीय संगीत में पारंगत प्रतिभा जिस सहजता से ठुमरियाँ गाती हैं उतने ही मनोयोग से गुलाम अली, मेहदी हसन और हरिहरण की ग़ज़लों को भी गुनगुना लेती हैं। पिछले साल से उन्होंने संगीत नाटिका मुगलेआज़म और उमराव जान के मंचन में गायिका के साथ साथ अभिनय पर भी हाथ आजमाया है। आने वाले दिनों में आप उनकी ग़ज़ल का एक एलबम भी सुन पाएँगे।

तो चलिए लौटते हैं  इस गीत की तरफ। मणिकर्णिका के इस गीत के लिए शंकर ने उन्हें इतना ही कहा कि तुम गाओ..  टेंशन नहीं लेना। रिकार्डिंग के समय प्रतिभा थोड़ी नर्वस थीं और उन्होंने शंकर जी से जाकर कहा भी कि सर अगर अच्छा नहीं हुआ हो तो मैं दुबारा गा लूँगी पर उसकी नौबत ही नहीं आई। उन्होंने इसी फिल्म के लिए एक लोरी भी गायी है 'टकटकी' जो भले ही इस संगीतमाला का हिस्सा ना हो पर है एक प्यारा गीत।

मुखड़े के पहले का संगीत मन को शांत कर देता है और उसी के बीच प्रतिभा की मीठी आवाज़ अपने राजाजी को पुकारती हुई उभरती है। प्रसून मन की रुनझुन को खनकते, चितचोर, चुगलखोर नैनों से प्रकट करते हुए जब दिल का हाल कुछ यूँ बताते हैं ...सिंदूरी भोर, नहीं ओर-छोर....बाँधी कैसी ये डोर...धड़कन बेताल, सपने गुलाल....किया कैसा हाल, राजा जी...तो उनके शब्दों के इस कमाल पर शाबासी देने की इच्छा होती है। शंकर अहसान लॉय की संगीतकार त्रयी ने गीत में कोरस और बाँसुरी का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। प्रतिभा के गाए इस गीत की अंतिम पंक्तियों में साथ दिया है रवि मिश्रा ने।

ओ राजा जी, ओ महाराजा जी
नैना चुगलखोर राजा जी

मन की रुनझुन छुप ना पाए
खनक-खनक खनके नैना
बड़ी अजब है रीत प्रीत की
बिन बोले सब कुछ कहना
कुनकुनी-सी धूप बिखरी
जाए रे मनवा कुहू-कुहू बौराये रे
ओ राजा जी, नैना चुगलखोर, राजा जी
ओ महाराजा जी, नैना हैं चितचोर, राजा जी

सिंदूरी भोर, नहीं ओर-छोर
बाँधी कैसी ये डोर
धड़कन बेताल, सपने गुलाल
किया कैसा हाल, राजा जी

तेरा ध्यान भी छैल-छबीला
लचक-मचक के आए रे
मन ख़ुद से ही बातें करके
मन ही मन मुस्काए रे
कुनकुनी-सी धूप बिखरी...राजा जी

मन-अँगना कोई आया
शीतल छैयाँ बन छाया
इक चंचल नदिया को रस्तों से मिलाया
इक बहती हवा ने कानों में कहना सीखा
कल-कल जल ने इक पल रुकके रहना सीखा
पगडंडी को रस्ते मिल गये
धीरे-धीरे राहें नयी खुलती जाएँ रे


ये गीत गाने में इतना आसान भी नहीं हैं पर प्रतिभा ने गीत के उतार चढ़ावों को भली भांति निभाया हैं। ये गीत उन गीतों में से है जो धीरे धीरे आपके मन में बसता है और एक बार बस जाए तो फिर निकलने का नाम नहीं लेता। 😊

Thursday, January 16, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 20 : ऐरा गैरा नत्थू खैरा Aira Gaira

हिंदी फिल्मी गीतों का मुखड़ा किसी मुहावरे या लोकोक्ति पर हो ऐसा आपको कभी याद आता है। मुझे तो ये लिखते हुए ऐसा कुछ याद नहीं पड़ रहा है पर इस साल इस कमाल को कर दिखाया है अमिताभ भट्टाचार्य ने कलंक के इस चटपटे और झुमाने वाले गीत में जो कि गीतमाला की सोलहवीं सीढ़ी पर विराजमान है। 

इस साल संगीतमाला में शामिल होने वाला ये इकलौता मस्ती भरा गीत है जिसे आप समूह में गुनगुनाते हुए थिरक सकते हैं। आजकल डांस नंबर का मतलब जब उल्टे सीधे शब्दों से भरे पंजाबी मिश्रित रैप और रिमिक्स किये हुए गीतों को बनाना हो गया है, तो ऐसे गीत एक ताज़ी हवा की तरह मन को प्रफुल्लित कर देते हैं। चाहे प्रीतम का मस्त संगीत संयोजन हो, अमिताभ के शब्द हों, अंतरा की शुरुआती चुहल भरी गायिकी हो या फिर जावेद अली और तुषार जोशी की गीत के मध्य में अद्भुत जुगलबंदी.. सुनकर आय हाय करने का जी कर उठता है।

मुखड़े के पहले और अंतरों के बीच की सांगीतिक व्यवस्था में  प्रीतम और उनकी लंबी चौड़ी टीम का काम सुनने लायक है। गीत की शुरुआत के आधा मिनट में बजते तार वाद्य और अंतरों के बुलबुल तरंग के साथ बजते ताल वाद्य आपको गीत के मूड में ले आते हैं। प्रीतम द्वारा रचे इस कर्णप्रिय संगीत को रचने में दर्जन भर वादकों की मेहनत शामिल है। 

गीत का विषय तो ख़ैर वही पुराना है यानी नाच की महफिल में दो मसखरे आशिकों को अपना रंग ज़माना है। नाच वाली तो उन्हें ऍरा गैरा नत्थू खैरा कह कर बिना किसी गत का बता चुकी है। अमिताभ को तो बाजी दोनों ओर से खेलनी थी। नचनिया के वार को सँभालते हुए अमिताभ ने आशिकों का रंग कुछ इन शब्दों में जमाया है

फूल सा चेहरा ईरानी, और लहजा हिंदुस्तानी
झील सी तेरी आँखों में, एक हलचल है तूफानी
देख महफिल में आए हैं, जान की देने कुर्बानी
एक महबूबा की खातिर, आज दो दो दिलबर जानी

मुझे गीत सुनते समय गायिकी के लिहाज़ से मजा तब आता है जब जावेद अली तुषार के साथ आए हाए हाए कहते हुए ये अंतरा गाते हैं

रात ले के आई है, जश्न तारी आए हाए हाए
ग़म गलत करने की है, अपनी बारी आए हाए हाए
आज नाचे गाएँ, ज़रा इश्क़ विश्क फरमाएँ
और जान जलाने वाली भाड़ में जाए सारी
दुनिया दारी आए हाए हाए




बिल्लौरी निगाहों से करे है सौ इशारे
खिड़की के नीचे नासपीटा सीटी मारे
बिल्लौरी निगाहों से...
इश्क में हुआ है थोड़ा अंधा थोड़ा बहरा
सैयां मेरा ऐरा गैरा नत्थू खैरा
ऐरा गैरा नत्थू खैरा 

फूल सा चेहरा ईरानी
और लहजा हिंदुस्तानी
झील सी तेरी आँखों में
एक हलचल है तूफानी
देख महफिल में आए हैं
जान की देने कुर्बानी
एक महबूबा की खातिर
आज दो दो दिलबर जानी

जिनके दिल का इंजन तेरे
टेसन पे है ठहरा
हो जिनके दिल का इंजन तेरे
टेसन पे है ठहरा
समझे काहे ऐरा गैरा नत्थू खैरा...

रात लेके आई है
जश्न तारी आए हाए हाए
ग़म गलत करने की है
अपनी बारी आए हाए हाए
ओ रात ले के आई है...
आज नाचे गाएं
ज़रा इश्क विश्क फरमाएँ
और जान जलाने वाली भाड़ में जाए सारी
दुनिया दारी आए हाए हाए
हो दिल के आईने में झाँके सुंदरी का चेहरा
हो दिल के आईने में झाँके सुंदरी का चेहरा
इश्क में हुआ है थोड़ा अंधा थोड़ा बहरा
सैयां मेरा ऐरा गैरा नत्थू खैरा
सैयां मेरा ऐरा गैरा नत्थू खैरा
सैयां मेरा ऐरा गैरा नत्थू खैरा

तो आइए सुनते हैं कलंक का ये गीत 



Wednesday, January 15, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 20 : ये आईना है या तू है, जो रोज़ मुझको सँवारे Ye Aaina Hai..

वार्षिक संगीतमाला की सत्रहवीं पायदान पर वो नग्मा जिसके गीतकार और संगीतकार की उपस्थिति पिछले साल के गीतों में बेहद कम रही। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ अमाल मलिक और इरशाद कामिल की। याद कीजिए 2015 और 2016 के साल अमाल मलिक एम एस धोनी, एयर लिफ्ट, नूर व रॉय जैसी फिल्मों के साथ चर्चा में बड़ी तेजी से आए थे। पिछले तीन सालों में उन्होंने मात्र दर्जन भर गीत किए हैं। एक तो उनकी दिक्कत ये रही कि उन्हें अपना ज्यादा काम मल्टी कम्पोजर फिल्मों में मिला और दूसरे उनसे जिस विविधता की उम्मीद थी उसमें वो पूरी तरह सफल नहीं हुए।

इस साल उनके गीत दे दे प्यार दे और बदला में सुनाई दिए पर जिस गीत ने सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरीं वो था कबीर सिंह का ये आईना है या तू है। एक बड़ी ही मुलायम सी रचना जिसे इरशाद ने अपने प्यारे लफ्जों से एक अलग मुकाम पर पहुँचा दिया।


अमाल को इस गाने के लिए निर्देशक संदीप वांगा द्वारा यही कहा गया कि आपको मुझे कुछ बताना नहीं है बस आप फिल्म की परिस्थिति देख लीजिए जहाँ इस गाने को आना है। अमाल ने अर्जुन रेड्डी ने पहले भी देखी थी। ये गीत फिल्म में तब आता है जब कबीर सिंह का ब्रेक अप हो चुका रहता है और वो पशोपेश में हैं कि अपने प्यार से छिटक जाने के ग़म में डूबा रहे या फिर ज़िंदगी में आगे बढ़े। संदीप ने इतना जरूर कहा था कि तुम्हें ये गाना लिखते समय कबीर सिंह को भूल जाना है। याद रखना है तो उस लड़की को जिसके जीवन में कबीर आया है। उसके लिए प्यार के क्या मायने हैं ये सोचना।

अमाल कहते हैं कि वैसे तो लड़कियाँ बड़ी जटिल होती हैं पर मैंने ये चुनौती इरशाद भाई पर छोड़ दी बस उन्हें ये कहते हुए कि आपको प्यार, इश्क़, मोहब्बत जैसे शब्दों से हटकर अपनी बात रखनी है। इरशाद तो ख़ैर धुरंधर हैं ही खिलाड़ी हैं इस ज़मीं के। . रच दिया उन्होंने ये  मुखड़ा 

ये आईना है या तू है, जो रोज़ मुझको सँवारे?
इतना लगी सोचने क्यूँ मैं आज-कल तेरे बारे

पिछले साल लैला मजनूँ के गीतों से रिझाने वाले इरशाद कामिल भी अमाल की तरह इस साल कबीर सिंह के आलावा अपनी दूसरी फिल्म भारत में कुछ ज्यादा कमाल नहीं दिखा सके पर इस गीत में उन्हें मौका मिला अपनी लेखनी की धार दिखाने का और नतीजे में निकली ऐसी खूबसूरत पंक्तियाँ

तू झील खामोशियों की
लफ़्ज़ों की मैं तो लहर हूँ
एहसास की तू है दुनिया
छोटा सा मैं एक शहर हूँ

गीत का अंत भी बड़े मोहक अंदाज़ में किया है उन्होंने ये कहते हुए

सीने पे मुझको सजा के, जो रात सारी गुज़ारे
तो मैं सवेरे से कह दूँ "मेरे शहर तू ना आ, रे"

संगीतमाला के पिछले गीत की तरह ही इस गीत को गाया है श्रेया घोषाल ने। पिछले गीत जैसी शास्त्रीय बंदिश हो या इस गीत की विशुद्ध रूमानियत श्रेया की आवाज़ उसके साथ पूरा न्याय करती है। इस गीत की रिकार्डिंग ने श्रेया ने बीस मिनटों में ही खत्म कर दी। इस साल उनके तीन गीत इस संगीतमाला में हैं। दो गीत तो अब आपने सुन लिए। उनका गाया तीसरा गीत जरूर आपमें से बहुतों के लिए अनसुना होगा। तो इंतज़ार कीजिए उस गीत का और फिलहाल सुनिए कबीर सिंह का ये बोल प्रधान गीत जो अपनी लय में कम से कम संगीत के बीच कानों में बहता सा चला आता है।

पर्दे पर इस गाने को फिल्माया गया है शाहिद कपूर और निकिता दत्ता पर !


Monday, January 13, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 20 : घर मोरे परदेसिया Ghar More Pardesiya

वार्षिक संगीतमाला के दो हफ्तों का सफ़र मुझे पहुँचा लाया है अठारहवीं पायदान पर जहाँ है फिल्म कलंक का आप सब का चहेता ये नग्मा जिसका संगीत दिया है प्रीतम ने। संगीतकार प्रीतम पिछले कुछ सालों से लंबे ब्रेक ले रहे हैं। आख़िरी बार उनकी जानदार फिल्म जग्गा जासूस और जब हैरी मेट सेजल  में  उनका संगीत सुनाई पड़ा था जो ढाई साल पहले आई थी। इस साल  कलंक, छिछोरे और The Sky is Pink जैसी फिल्मों  में संगीतकार के रूप में उनका काम सुनने को मिला । 

कलंक भले आशा के अनुरूप नहीं चली पर उसका संगीत  काफी सराहा गया। इस संगीतमाला के प्रथम बीस गीतों में तीन गीत इस फिल्म से हैं और आज जो गीत यहाँ पर बज रहा है वो है घर मोरे परदेसिया। घर मोरे परदेसिया की ये शास्त्रीय बंदिश मुझे प्रीतम द्वारा रचे उनके गीत मेरे ढोलना सुन, मेरे प्यार की धुन... ..की याद दिला देती हैं। उस गीत में भी कमाल की सरगम थी जिसे एम. जी. श्रीकुमार के साथ श्रेया घोषाल ने बड़ी खूबसूरती से निभाया था। कलंक के इस गीत में भी श्रेया घोषाल हैं और उनके साथ हैं वैशाली म्हादे।


श्रेया घोषाल तो ख़ैर कमाल की गायिका हैं ही और इस तरह के शास्त्रीय  गीतों में तो उनका जो स्तर है वो और निखर के सामने आता है। वैशाली को मैंने पहले ज्यादा नहीं सुना और इस गीत के एक छोटे से हिस्से में ही उनकी आवाज़ सुनाई देती है। पुराने वक़्त पर आधारित फिल्मों में संगीत देना संगीतकारों के लिए चुनौती होता है। इन चुनौतियों पर की गयी मेहनत श्रोताओं के लिए विशेष अनुभूति बनकर आती है। प्रीतम के इस गीत में आप पिछली गीतमाला के स्टार नीलाद्रि कुमार का सितार भी सुन सकते हैं और सरोद पर रूपक नौगांवकर को भी । तबले पर अक्षय जाधव का कमाल पूरे गीत में दिखता है। 

ऐसी शास्त्रीय बंदिश वाले गीतों की एक खास संरचना होती है जिसमें गीतकार के लिए उस वक़्त का एक अहसास दिलाना ही मुख्य उद्देश्य होता है। अमिताभ यही ध्यान रखते हुए निर्मोही, सुध बुध, धनुर्धर, निहारना जैसे शब्दों का प्रयोग कर इस गीत की प्रकृति के साथ न्याय करने में सफल हुए हैं।

रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई
जय रघुवंशी अयोध्यापति, राम चन्द्र की जय
सियावर राम चन्द्र की जय, जय रघुवंशी अयोध्यापति
राम चन्द्र की जय, सियावर राम चन्द्र की जय
ता दी या ना धीम, दे रे ता ना दे रे नोम...ता दी या ना धीम,दे रे ता ना दे रे नोम...

रघुवर तेरी राह निहारे, रघुवर तेरी राह निहारे
सातों जन्म से सिया, घर मोरे परदेसिया
आओ पधारो पिया, घर मोरे परदेसिया
मैंने सुध-बुध चैन गवाके, मैंने सुध-बुध चैन गवाके
राम रतन पा लिया, घर मोरे परदेसिया..आओ पधारो पिया
धीम ता धीम ता ताना देरे ना, धीम ता धीम ता ताना देरे ना
धा नी सा मा, सा गा मा धा, नी धा मा गा पा
गा मा पा सा सा, गा मा पा नी नी
गा मा पा नी धा पा मा गा रे गा मा धा पा.... 


ना तो मईया की लोरी, ना ही फागुन की होरी
मोहे कुछ दूसरा ना भाए रे, जबसे नैना ये जाके
एक धनुर्धर से लागे, तबसे बिरहा मोहे सताए रे
दुविधा मेरी सब जग जाने, दुविधा मेरी सब जग जाने
जाने ना निरमोहिया
घर मोरे परदेसिया, आओ पधारो पिया
गई पनघट पर भरण भरण पनिया, दीवानी
गई पनघट पर भरण भरण पनिया
गई पनघट पर भरण भरण पनिया, दीवानी
गई पनघट पर भरण भरण पनिया
नैनो के नैनो के तेरे बान से, मूर्छित हुई रे हिरणनिया
झूम झना नन नन नन, झना नन नन नन

बनी रे बनी मैं तेरी जोगनिया, घर मोरे परदेसिया...आओ पधारो पिया


प्रीतम अब फिल्मों से हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कहने के मूड में हैं पर दिक्कत ये है कि फिल्म उद्योग उन्हें जल्दी छोड़ना नहीं चाहता। अगले साथ ब्रहमास्त्र सहित चार पाँच फिल्मों में आप उनका संगीत सुन पाएँगे।

घर मोरे परदेशिया एक ऐसा गीत है जिसे पर्दे पे देखना भी अपने आप में एक अनुभव है। कत्थक का प्रयोग हिंदी फिल्मी गीतों में होता रहा है। देवदास में माधुरी और ऐश्वर्या द्वारा अभिनीत  डोला रे डोला.. और अब यहाँ माधुरी के साथ आलिया  के नृत्य की भाव भंगिमाएँ वैभवशाली महल की सुंदरता में चार चाँद लगा जाती हैं। तो आइए देखते हैं इस गीत को..



Friday, January 10, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 20 : अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से Beimani Se

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर एक बार फिर है गॉन केश का एक और सुरीला नग्मा। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संगीतकार की भूमिका  निभाई है बिशाख ज्योति ने और इसे गाया है महालक्ष्मी अय्यर ने। अगर आपको बिशाख ज्योति का नाम कुछ कुछ सुना हुआ लग रहा हो तो बता दूँ कि वे सा रे गा मा सिंगिंग सुपरस्टार्स में रनर्स अप रहे थे। ये वही कार्यक्रम था जिसमें सुगंधा मिश्रा, स्निति मिश्रा और रंजीत रजवाड़ा जैसे नाम पहली बार उभरे थे। 

फिल्म जगत में गायिकी की प्रतिस्पर्धा इतनी ज्यादा है कि बहुत सारे गायक फिल्मों में बतौर संगीतकार अपनी जगह को तलाशने में जुटे हुए हैं। अब इसी साल की संगीतमाला में देखिए सोनल प्रधान, पायल देव, अखिल सचदेव और अब बिशाख ज्योति इन सारे गायकों ने संगीतकार का किरदार कितने करीने से निभाया है।


गॉन केश के पिछला नग्मे नुस्खा तराना और अब बेईमानी से समानता बस इतनी है कि दोनों को ही अभिषेक मजाल ने ही लिखा है। दिल्ली के इस गीतकार का नाटकों सें जुड़ाव रहा है और अब इस साल इस फिल्म के गीतों में भी उनकी प्रतिभा का दूसरा रूप छलका है। शायरी में मजाज़ की शोहरत से तो आप वाक़िफ़  ही होंगे। शायद अभिषेक ने अपना तख़ल्लुस मजाल रखने में उनसे प्रेरणा ली होगी।

जिस तरह नुस्खा तराना में फिल्म की कहानी का मर्म बयाँ करती उनकी पंक्ति ढूँढ रहा है पक्षी को दाना, मन में चला के ये नुस्खा तराना  हृदय को छू गयी थी वैसे ही यहाँ भी विपरीत स्वभाव के आकर्षण को उनका अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से  के रूप में व्यक्त करना दिल को बाग बाग कर देता है। प्रेम गीत हर साल सैकड़ों में लिखे जाते हैं पर उसी भाव को तरह तरह से कहने की अदा एक श्रोता के मन को पुलकित करती रहती है।


बिशाख ज्योति, अभिषेक मजाल व श्वेता त्रिपाठी
महालक्ष्मी अय्यर की आवाज़ हिंदी फिल्मों में कम ही सुनाई देती है। वैसे उन्होंने अपने लंबे कैरियर में हिंदी फिल्मों में गाहे बगाहे अच्छे गाने दिए हैं। अपनी पसंद की बात करूँ तो बंटी और बबली का छुप छुप के, टशन का फलक तक चल साथ मेरे और झूम बराबर झूम का बोल ना हल्के हल्के जैसे युगल गीत याद आते हैं। बिशाख ज्योति उनके साथ स्टेज शो भी किया करते हैं इसलिए अपनी इस बेहतरीन धुन के लिए उन्होंने उन्हें चुना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि इस गीत में जो मेलोडी है वो श्रेया की आवाज़ में और ज्यादा जँचती। 

गीत की सांगीतिक व्यवस्था का दारोमदार इस गीत में शुभदीप सिंह ने सँभाला है। गीत की शुरुआत में गिटार पर आधारित संगीत का टुकड़ा मधुर है। बाँसुरी का भी अच्छा इस्तेमाल किया है उन्होंने इस गीत में। तो आइए सुनते हैं ये पूरा गीत..



बेईमानी से मनमानी से
हासिल किया दिल आसानी से
बेगानी सी कहानी में

दाखिल हुआ दिल आसानी से
गिरती मेहर (मोहब्बत) ठहर के पेशानी (माथे) से
मुस्का रही नज़र ये नादानी से
कोई पूछ ले अगर ये दीवानी से
दीवानगी है क्या कुछ तो बता
बेईमानी से मनमानी से
अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से
बेगानी सी कहानी से
लो चली हो चली सपनों की सुरीली सदा

बेईमानी से, तूने साहिल पे रोका
बना लहरों का झोंका, छू गया
मेरी रूह जहाँ तक गई तू गया
इन रूहों की रूमानी से
अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से
बेगानी सी कहानी से
लो चली हो चली सपनों की सुरीली सदा.. 
बेईमानी से मनमानी से

हासिल किया दिल आसानी से

बेइमानी से कोई वादा ना करना
जरा रुक के गुजरना साथिया
तेरी हर खामोशी पे मैंने हाँ किया
ख़ुद से मिलूँ, हैरानी से
अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से
बेगानी सी कहानी से
लो चली हो चली सपनों की सुरीली सदा.. 
बेईमानी से मनमानी से

हासिल किया दिल आसानी से

फिल्म में गीत के दूसरे अंतरे का इस्तेमाल नहीं हुआ है पर आज के ज़माने में कोई गीत रिक्शे पर फिल्माया जाए तो देखना तो बनाता है ना ! गीत में आपको नज़र आएँगे श्वेता त्रिपाठी के साथ जितेंद्र कुमार।



Wednesday, January 08, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 20 : तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ? Kaise Hua

साल के शानदार गीतों का ये सफ़र अब जा पहुँचा है शुरुआती बीस गीतों की ओर और यहाँ गीत एक बार फिर फिल्म कबीर सिंह का। कबीर सिंह के मुख्य चरित्र को लेकर हुए वाद विवाद के बाद भी ये फिल्म इस साल की सफल फिल्मों में एक रही। युवाओं ने इसे खासा पसंद किया और इसमें इसके संगीत की भी एक बड़ी भूमिका रही। संगीतमाला का पिछला गीत भी इसी फिल्म से था। इस गीत की धुन और गायिकी दोनों का दारोमदार विशाल मिश्रा ने सँभाला। पर बेख्याली और तुझे कितना चाहने लगे हम को पीछे छोड़ता ये गीत संगीतमाला में दाखिल हुआ है तो वो मनोज मुंतशिर के प्यारे बोलों की बदौलत।


जहाँ तक इस गीत के बनने की बात है तो संगीतकार विशाल मिश्रा ने इस गीत की धुन चंद मिनटों में बनाई। रातों रात गाना स्वीकृत हुआ और विशाल ने मनोज को काम पर लगा दिया। ये एक ऐसा गीत है जिसके बोलों को सुनकर आप उन दिनों की यादों में डूब सकते हैं जब पहले प्यार ने आपको अपनी गिरफ्त में लिया था। 

घर की बालकोनी हो या ट्यूशन की वो क्लास, कॉलेज का कैंटीन हो या फिर दोस्त की शादी का उत्सव...कॉलेज के हॉस्टल में पहले प्यार की कहानियाँ कुछ ऐसी ही जगहों से शुरु होती थीं। जिस लड़के में इस मर्ज के लक्षण दिखते उसे सँभालना ही मुश्किल हो जाता था। रात दिन सोते जागते ऐसे लोगों पर बस एक ही ख्याल तारी रहता था। मनोज ने भी शायद ऐसे ही वाकयों से प्रेरणा ली होगी ये कहने में कि "तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ"? 


एक रोचक तथ्य ये भी है कि पहले इस पंक्ति की जगह मनोज ने लिखा था "जो ना होना था कैसे हुआ"। वो तो गीत को सुनते वक्त टी सीरीज़ के मालिक भूषण कुमार ने सलाह दी कि इसे थोड़ा डिफाइन करो कि क्या होना था, क्या नहीं हुआ ताकि वो पंक्ति अपने आप में पूर्ण लगे और इस तरह गीत की पंच लाइन तू इतना जरूरी कैसे हुआ अस्तित्व में आई। मनोज ने गीत के तीन अंतरे लिखे और उसमें एक विशाल ने पसंद किया।

अंतरे में जो बहती कविता है वो मुझे इस गीत की जान लगती है। बतौर संगीतकार मैंने देखा है कि विशाल की शब्दों की समझ बेहतरीन है। करीब करीब सिंगल में राजशेखर के गहरे बोलों वो जो था ख़्वाब सा, क्या कहें जाने दे पर संगीत रचने वाले भी वही थे। 

यहाँ मनोज का खूबसूरत बयाँ बारिश की बोली को समझने से ले के अस्त व्यस्त जीवन की आवारगी के बाद आते ठहराव को गीत के बोलों में  इस तरह उभारता है कि  उन दिनों के कई मंज़र स्मृतियों के आईने में उभर उठते हैं ।

हँसता रहता हूँ तुझसे मिलकर क्यूँ आजकल
बदले-बदले हैं मेरे तेवर क्यूँ आजकल
आँखें मेरी हर जगह ढूंढें तुझे बेवजह
ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह
कैसे हुआ? कैसे हुआ?
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ?
कैसे हुआ? कैसे हुआ?
तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ?

मैं बारिश की बोली समझता नहीं था
हवाओं से मैं यूँ उलझता नहीं था
है सीने में दिल भी, कहाँ थी मुझे ये खबर

कहीं पे हो रातें, कहीं पे सवेरे
आवारगी ही रही साथ मेरे
"ठहर जा, ठहर जा, " ये कहती है तेरी नज़र
क्या हाल हो गया है ये मेरा?
आँखें मेरी हर जगह ढूंढें तुझे बेवजह
ये मैं हूँ या कोई और है मेरी तरह?
कैसे हुआ? कैसे हुआ?

तो आइए सुनें शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी पर फिल्माए गए इस गीत को


Tuesday, January 07, 2020

वार्षिक संगीतमाला 2019 Top 25 : तेरा बन जाऊँगा Tera Ban Jaunga

इस साल की संगीतमाला में छः फिल्में ऐसी है जिनका इस संगीतमाला की पचास फीसदी पायदानों पर कब्जा है यानि तीस में से पन्द्रह गीत इन्हीं फिल्मों के हैं। घोस्ट के दो गीतों से आप परिचित हो ही चुके हैं। ऐसा ही कमाल इस साल कबीर सिंह के गीतों ने भी रचा है।  

श्रोताओं की जो पसंद मुझे मिली है उसमें भी इस फिल्म के गीतों का अच्छा खासा दखल है। इस फिल्म के सारे तो नहीं पर कुछ गीत एक शाम मेरे नाम की इस वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बने हैं। वे गीत कौन से हैं वो बहुत जल्द ही आप जान जाएँगे। आज गीतमाला की इस सीढ़ी पर जो गीत है उसे संगीतबद्ध किया अखिल सचदेव ने और लिखा कुमार ने। इस युगल गीत को अखिल के साथ आवाज़ दी है तुलसी कुमार ने।


अब इस गीत की सफलता का श्रेय मैं सबसे ज्यादा अखिल सचदेव के मधुर धुन को देना चाहूँगा। तुलसी कुमार की आवाज़ का मैं शैदाई तो नहीं पर इस गीत में जब जब वो मेरी राहें गाती हैं तो उसे बार बार सुनने का दिल जरूर करता है। आदित्य देव नें फिर यहाँ संगीत की व्यवस्था सँभाली है और क्यू खूबसूरत टुकड़े दिए हैं अंतरों के बीच। रही कुमार साहब की बात तो कुमार के ऐसे गीतकार हैं जिन्हें सहज शब्दों के साथ जनता की नब्ज़ पकड़ने का हुनर मालूम है। उनके शब्दों में इस गीत के अंतरों में कोई खास गहराई नहीं हैं पर कुछ पंक्तियाँ जरूर बेहद प्यारी लगती हैं जैसे मुखड़े में मेरी राहें तेरे तक हैं, तुझपे ही तो मेरा हक़ है इश्क़ मेरा तू बेशक़ है..तुझपे ही तो मेरा हक़ है या फिर अंतरे की ये पंक्तियाँ लखाँ तों जुदा मैं हुई तेरे ख़ातिर..तू ही मंज़िल दिल तेरा मुसाफ़िर...रब नूँ भुला बैठा  तेरे करके..मैं हो गया काफ़िर।



मेरी राहें तेरे तक हैं
तुझपे ही तो मेरा हक़ है
इश्क़ मेरा तू बेशक़ है
तुझपे ही तो मेरा हक़ है
साथ छोड़ूँगा ना तेरे पीछे आऊँगा
छीन लूँगा या खुदा से माँग लाउँगा
तेरे नाल तक़दीरां लिखवाऊँगा

मैं तेरा बन जाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा

सोंह तेरी मैं क़सम यही खाऊँगा
कित्ते वादेया नूँ मैं निभाऊँगा
तुझे हर वारी अपणा बनाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा
 शुक्रिया
दा रा रा रा .....

लखाँ तों जुदा मैं हुई तेरे ख़ातिर
तू ही मंज़िल दिल तेरा मुसाफ़िर
रब नूँ भुला बैठा तेरे करके
मैं हो गया काफ़िर
तेरे लिए मैं जहां से टकराऊँगा
सब कुछ खो के तुझको ही पाऊँगा
दिल बन के दिल धडकाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा, मैं तेरा बन जाऊँगा

सोंह तेरी मैं क़सम यही खाऊँगा
कित्ते वादेयाँ नूँ मैं निभाऊँगा
तुझे हर वारी अपणा बनाऊँगा
मैं तेरा बन जाऊँगा, मैं तेरा बन जाऊँगा
मेरी राहें तेरे तक हैं

आपमें से बहुतों के लिए ये प्रश्न होगा कि आख़िर ये अखिल सचदेव हैं कौन? मैं तो यही कहूँगा कि वो अभिनेत्री हुमा कुरैशी के सहपाठी  हैं। अब अगर आप ये पूछेंगे कि ये इस हुनरमंद संगीतकार का कैसा परिचय है तो उसके लिए मुझे एक कहानी सुनानी पड़ेगी आपको। आज से करीब एक दशक पहले अखिल ने जब गिटार अपने हाथों में लिया तो उन्हें लगा कि संगीत ही उनका असली प्रेम है। वर्ष 2011 में उन्होंने अपना एक रॉक सूफी बैंड नशा बनाया। 
अखिल सचदेव व  तुलसी कुमार
एक बार गिटार पर उन्होंने धुन बनाकर हुमा को सुनाई। हुमा ने धुन की तारीफ़ की और बात आई गयी हो गयी। एक दफ़ा जब अखिल मुंबई पहुँचे तो हुमा के घर खाने पर गए। वहाँ फिल्मी कलाकारों की महफिल जमीं थी। भोजन के पश्चात गाना बजाना शुरु हुआ तो हुमा ने अखिल को मिलवाते हुए कहा कि ये हैं हमारे असली संगीतकार। अखिल ने अपनी उसी धुन को सुनाया और सबने उसे खूब पसंद किया। शशांक खेतान भी वहीं मौज़ूद थे। वे उस वक़्त बद्रीनाथ की दुल्हनिया की पटकथा पर काम कर रहे थे। उन्होंने अखिल से कहा कि ये गाना उन्हें अपनी फिल्म के लिए चाहिए पर उसे बनने में अभी डेढ़ साल तक का वक़्त लग सकता है। 

अखिल तो वापस दिल्ली आ गए पर शशांक ने अपना वादा पूरा किया। लगभग साल भर बाद फिल्म की शूटिंग शुरु होते ही शशांक का फोन अखिल के लिए आ गया। यानी अपनी दोस्त की मदद से अखिल का हिंदी फिल्मों  में गायक व संगीतकार बनने का सपना एक साथ पूरा हुआ। वो गीत था हमसफ़र जो कि खासा लोकप्रिय भी हुआ। 

गीत की सफलता को देखते हुए इसका एक और वर्सन भी बना जिसे सिर्फ अखिल ने गाया है। इस गीत के इतने सारे श्रोता प्रेमी हैं तो मुझे लगा कि उपहार स्वरूप उन्हें गीत का ये रूप भी सुना देना चाहिए।

 

 

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इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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