Saturday, March 24, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 3 ले जाएँ जाने कहाँ हवाएँ हवाएँ Hawayein

हवाएँ मन को तरंगित रखती हैं। जिस दिन ये लहरा कर चलती हैं उस दिन मूड ख़ुद ब ख़ुद अच्छा हो जाता है। हवाओं से मेरा प्यार बचपन से रहा है। हवाओं का शोर जैसे ही सुनाई पड़ता तो या तो घर की खिड़कियाँ खुल जातीं या फिर कदम घर की उस छोटी सी बॉलकोनी की ओर चल पड़ते। हवाओं को अपने चेहरे, अपने शरीर पर महसूस करना तब से लेकर आज तक मन को प्रफुल्लित करता रहा है। जब हवाओं से प्रेम हो तो उनसे जुड़ें गीत तो ज़ाहिर है पसंद होंगे ही। 




किशोर दा का गाया गीत हवा के साथ घटा के संग संग हो या फिर लता जी का नग्मा उड़ते पवन के रंग चलूँगी,  मौसम की मस्त बयार के साथ हम अक़्सर गुनगुनाया करते थे। गुलज़ार का भी एक गीत था ना जिसमें उन्होंने हवाओं को अपना सलाम पहुँचाया है

हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम 
हम अनजान परदेसियों का सलाम 

हवाएँ सबको छूती हुई भले ही खुशी के अनमोल पल दे जाएँ पर उनका ख़ुद का कोई ठिकाना कब रहा? इसीलिए उनकी कहानी हुसैन बंधुओं ने इस बेहद लोकप्रिय ग़ज़ल में कुछ यूँ बयाँ की है

मैं हवा हूँ, कहाँ है वतन मेरा
दश्त मेरा ना ये चमन मेरा 

हवाओं के इसी बंजारेपन का उल्लेख गुलज़ार  फिल्म फ़िज़ा में कुछ यूँ कर गए..

मैं हवा हूँ कहीं भी ठहरती नहीं 
रुक भी जाऊँ कहीं पर तो रहती नहीं 
मैने तिनके उठाये हुये हैं परों पर, आशियाना नहीं मेरा 

गीतकार इरशाद कामिल ने भी इन्हीं हवाओं पर एक बार फिर अपनी कलम चलाई और क्या खूब चलाई कि फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' भले ना हिट हुई हो, ये गाना आम जनता की चाहत बन बैठा। इस गाने की जो लय है, बोलों में प्रेम का जो कलकल बहता भाव है वो अरिजीत की आवाज़ में लोगों के होठों पर चढ़ कर बोलता है। प्रेम के साथ सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि वो कब कहाँ और किससे हो जाए ये आप पहले से जान ही नहीं सकते। यही वजह है कि प्रेम है तो अनिश्चितताएँ हैं, बेचैनी है। जिसे आप अपना मान बैठे हैं वो आगे भी अपना रहेगा क्या इसकी कोई गारंटी नहीं है। इरशाद कामिल ने इस गीत में हवाओं को इन अनिश्चितताओं का वाहक बनाया है और इसीलिए वो कहते हैं

ले जाएँ तुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ ले जाएँ मुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ 
ले जाएँ जाने कहाँ ना मुझको ख़बर, ना तुझको पता

कुछ पंक्तियाँ बेहद प्यारी गढ़ी हैं इरशाद कामिल ने इस गीत में जैसे कि हवाएँ हक़ में वही हैं आते जाते जो तेरा नाम लें या फिर चेहरा क्यूँ मिलता तेरा, यूँ ख़्वाबों से मेरे, ये क्या राज़ है...कल भी मेरी ना थी तू न होगी तू कल, मेरी आज है। पर ये जो "आज" है ना वही सबसे महत्त्वपूर्ण हैं क्यूँकि इन्हीं साथ बिताए पलों की खुशियाँ जीवन पर्यन्त साथ रहेंगी चाहे वो शख़्स आपके साथ रहे ना रहे। प्रीतम के अन्य कई गीतों की तरह इस गीत का संगीत संयोजन भी गिटार पर आधारित है। अरिजीत ने पिछले साल कामयाबी के नए मुकाम रचे हैं और पच्चीस गानों की इस फेरहिस्त में हर तीसरा गाना उनका ही गाया हुआ है। वैसे ये भी बता दूँ कि इस गीतमाला में उनका गाया ये आख़िरी गीत है। आशा है आने वाले सालों में भी वो अपनी आवाज़ से यूँ ही हमें रिझाते रहेंगे।

संगीत के लिए दिए जाने वाले Mirchi Music Awards में ये गीत बेहतरीन गायक, गीतकार और संगीतकार तीनों के खिताब अपनी झोली में भर गया। फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली भी इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार हैं क्यूँकि वे प्रीतम और इरशाद कामिल की टीम पर अपनी हर फिल्म में पूरा भरोसा रखते हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को जिसकी शूटिंग बुडापेस्ट में हुई है।


तुझको मैं रख लूँ वहाँ जहाँ पे कहीं है मेरा यकीन 
मैं जो तेरा ना हुआ किसी का नहीं, किसी का नहीं 
ले जाएँ जाने कहाँ हवाएँ, हवाएँ....ले जाएँ तुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ 
बेगानी है ये वादी हवाएँ, हवाएँ...ले जाए मुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ 
ले जाए जाने कहाँ ना मुझको खबर ना तुझको पता ओ.. 

बनाती है जो तू वो यादें जाने संग मेरे कब तक चलें 
इन्हीं में तो मेरी सुबह भी ढले शामें ढले, मौसम ढले 
ख्यालों का शहर तू जाने तेरे होने से ही आबाद है 
हवाएँ हक़ में वही हैं आते जाते जो तेरा नाम लें 
देती है जो सदाएँ हवाएँ, हवाएँ , न जाने क्या बताएँ हवाएँ, हवाएँ 
ले जाएँ तुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ ले जाएँ मुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ 
ले जाएँ जाने कहाँ ना मुझको ख़बर, ना तुझको पता

चेहरा क्यूँ मिलता तेरा, यूँ ख़्वाबों से मेरे, ये क्या राज़ है 
कल भी मेरी ना थी तू न होगी तू कल, मेरी आज है 
तेरी हैं मेरी सारी वफ़ाएँ, वफ़ाएँ...माँगी है तेरे लिए दुआएँ, दुआएँ 
ले जाएँ तुझे कहाँ हवाएँ, हवाएँ ले जाएँ मुझे कहाँ हवाएँ ...




तो इस गीत के बाद अब बताना रह गया है आप को इस साल के रनर्स अप और सरताज गीत के बारे में। ये गीत उतने ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुए हैं पर जब मैं इन्हें सुनता हूँ मेरे दिल के तार बजने लगते हैं। देखते हैं ये आपके दिलों पर राज कर पाते हैं या नहीं।

वार्षिक संगीतमाला 2017

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4 comments:

Kavita Singh on March 25, 2018 said...

मेरा पसंदीदा गीत ........बहुत बार सुना पर पर अब भी बार बार सुनती हूँ।

RADHA TIWARI on March 25, 2018 said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (26-03-2018) को ) "सुख वैभव माँ तुमसे आता" (चर्चा अंक-2921) पर होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

Manish Kumar on March 25, 2018 said...

हाँ कविता जी, तन और मन दोनों को तरंगित करने वाला गीत है। मुझे भी पहली बार सुनते ही पसंद आ गया था।

Manish Kumar on March 25, 2018 said...

इस प्रविष्टि को चुनने के लिए हार्दिक आभार राधा जी।

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