Thursday, February 22, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 11 : कान्हा माने ना .. Kanha

एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला  में अगला गाना वो जो अपने लाजवाब संगीत और बेहद मधुर गायिकी के दम पर जा पहुँचा है ग्यारहवीं पायदान पर। शुभ मंगल सावधान के इस सुरीले गीत को संगीतबद्ध किया और लिखा है तनिष्क वायु की जोड़ी ने और इसे गाया है नवोदित गायिका शाशा तिरुपति ने।


तो आखिर क्या खास है इसके संगीत संयोजन में। पानी की लहर की तरह इस गीत की धुन शुरु होती है और एक कोरस से गुजरते हुए सरोद की मीठी झनकार तबले की संगत में श्रोताओं को मुखड़े तक ले आती है। गीत की पहली पंक्ति के उतार चढाव  के साथ ही आप शाशा तिरुपति की आवाज़ के कायल हो जाते हैं। पहले इंटरल्यूड का 23 सेकेंड का टुकड़ा  इस साल की सबसे सुरीली पेशकश में से  एक गिने जाने का हक़दार है ।

क्या कमाल रचा है तनिष्क बागची और वायु श्रीवास्तव की जोड़ी ने राग भीम पलासी से प्रेरित इस रचना में। वॉयलिन की धुन आपके रोंगटे खड़े करती है और फिर सरोद और उसके पीछे की बाँसुरी दिल के कोरों को सहलाते हुए निकल जाती है। गीत के अंत में वायलिन की धुन उसी मिठास की याद दिलाती हुई दुबारा बजती है और मन वाह वाह किए बिना नहीं रह पाता। इस गीत में वॉयलिन पर मानस हैं और सरोद बजाया है प्रदीप बारोट ने। आप दोनों को मेरा दिल से नमस्कार और बधाई।

शाशा तिरुपति इस साल की सबसे उभरती हुई गायिका हैं। श्रीनगर में जन्मी और कनाडा की नागरिकता प्राप्त शाशा एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी कलाकार  हैं। वैसे तो हिंदी फिल्मों में पिछले सात आठ सालों से इक्के दुक्के गीत गाती रहीं। पर इस साल ओके जानू के गाने हम्मा ने लोगों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। दस साल की उम्र से ही शास्त्रीय संगीत सीखने वाली शाशा को फिल्मों में गाने की इच्छा गुरु के गीत तेरे बिना बेस्वादी रतियाँ सुन कर हुई।



वे ए आर रहमान की जबरदस्त प्रशंसक रही हैं। कोक स्टूडियो 3 के दौरान उनका रहमान से परिचय हुआ। ए आर रहमान ने ही उन्हें तमिल फिल्मों में गाने का मौका दिया और फिर उनका कैरियर चल निकला । तीस वर्षीय शाशा अब तक दस अलग अलग भाषाओं में गा चुकी हैं। कान्हा के लिए उन्हें इस साल की बेहतरीन गायिका के लिए कई पुरस्कारों में नामांकित भी किया गया।

तनिष्क बागची वैसे तो संगीतकार हैं ही पर वे अपने जोड़ीदार वायु श्रीवास्तव  के साथ गीत भी साथ ही लिखते हैं। शुभ मंगल सावधान का ये गाना एक ऐसे युगल की कहानी बयाँ करता है  जिनकी शादी होने वाली है पर भावी दूल्हे राजा पहले से ही मिलन को व्याकुल हैं। तनिष्क वायु ने बड़ी चतुरता से नायक  के लिए नटखट कान्हा वाला रूप चुना और ब्रज की मीठी बोली के माध्यम से  इशारों ही इशारों में कान्हा की बेसब्री को शब्दों में बाँधा। फिल्म और नायक के मूड के हिसाब से गीत में हास्य का  पुट भरने के लिए उन्होंने मुखड़े और अंतरे में ट्रिक और क्विक जैसे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया।

शाशा की इस बात के लिए दाद देनी होगी कि उन्होंने अपनी गायिकी में गीत की शास्त्रीयता भी बरकरार रखी और जहाँ शोख होने की जरूरत हुई वैसे ही अपनी आवाज़ को ढाल दिया। तो आइए सुनें उनकी आवाज़ में ये नग्मा जो कि कान्हा की तरह ही नटखट मिज़ाज का है।


ऊँची ऊँची डोरियों पे बाँधो रे गगर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 
जग जो बिछाये हर जाल काट ले 
मक्खन चुराए हर माल छाँट ले 
मुरली से करे ऐसी ट्रिक टिक टिक टिक 
पनघट की है बड़ी.. पनघट की है बड़ी कठिन डगर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 

रोके मोहे, टोके मोहे 
काटे रे डगर ओ रे यमुना के तट की 
लाज नाही, काज नाही मारे जो कंकरिया 
तो फूटे मोरी मटकी 
बात चतुर भरमाए प्रेम जाल में रिझाए.. 
जो भी करे, करे सब quick quick quick quick 
कहूँ मैं पिया जी थोडा कर लो सबर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 



जिस तरह शाशा कान्हा के नहीं मानने की बात करती हैं वैसे ही आप भी इस गीत के खत्म होते ही कहेंगे बस इतना ही! अभी तो  मन ही नहीं भरा था।  कोई बात नहीं जनाब आपके लिए इस गीत का और अंतरा मैं जोड़ दिए देता हूँ जो कि फिल्म में नहीं है पर जिसे  आयुष्मान खुराना ने अपनी आवाज़ दी है

बृज आवे लाज काहे
बदरा बुलाए काहे धीर धरे सजनी
सुरमयी रुत भई, आ जा दोनों यमुना के तीर चलें संगनी
मन में भ्रमर गुनगुनाए
काहे सखी तू घबराए
प्रेम तेरा मेरा बड़ा फिट फिट फिट
आज तू बहाने चाहे कितने भी कर पर ना माने ना..कान्हा माने ना

वार्षिक संगीतमाला में अब तक

12. ज़िन्दगी तेरे रंगों से, रंगदारी ना हो पायी
13. ये इश्क़ है
14. ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे.
15. ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी
16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Monday, February 19, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #12 ज़िन्दगी तेरे रंगों से, रंगदारी ना हो पायी.. Rangdari

वार्षिक संगीतमाला में दूसरी बार प्रवेश ले रहा है लखनऊ सेंट्रल का एक और गीत जिसमें मायूसी भी है और जीवटता भी। इसे फिर अपनी आवाज़ से सँवारा है अरिजीत सिंह ने। पर इस गीत के साथ जो नया नाम जुड़ा है वो है युवा संगीतकार अर्जुन हरजाई का। 


अर्जुन की मुंबई फिल्म जगत में संघर्ष गाथा करीब एक दशक पुरानी है। घर में संगीत का माहौल था। माँ पिताजी गायिकी से जुड़े थे । 2006 की बात है जब  इंटर के बाद  मुंबई में संगीत सीखने के लिए उन्होंने  सुरेश वाडकर के संगीत संस्थान में दाखिला लिया। साथ ही साथ साउंड इंजीनियरिंग की विधा में उनकी सीखने की पहल ज़ारी रही।  फिर कुछ दिनों बाद उनका काम माँगने का सिलसिला शुरु हुआ। ख़ैर फिल्मों में काम तो नहीं मिला पर जिंगल को संगीतबद्ध करने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। फिर तो विज्ञापनों के लिए संगीत देने के प्रस्तावों की झड़ी लग गयी।  फिल्मों में बतौर संगीत निर्देशक पहली बार वो 2014 TITU MBA और फिर गुड्डू इंजीनियर में नज़र आए। पर उन्हें बड़ा ब्रेक टीवी धारावाहिक POW बंदी युद्ध के में मिला।

अर्जुन अपने कैरियर में सबसे बड़ा योगदान गीतकार कुमार का मानते हैं जिन्होंने उनकी भेंट निर्माता व निर्देशक निखिल आडवाणी से करायी। POW के बाद निखिल ने लखनऊ सेंट्रल के लिए तीन गीतों को संगीतबद्ध करने का जिम्मा अर्जुन को सौंपा। इसी फिल्म के एक और चर्चित गीत तीन कबूतर में अर्जुन ने गिटार के आलावा आम जरूरत की चीजों से बाकी का संगीत तैयार किया क्यूँकि गाना जेल के अंदर क़ैदियों पर फिल्माना था जिनके पास गिटार के आलावा कुछ भी नहीं था। जहाँ तक रंगदारी की बात है ये एक शब्द प्रधान गीत है जिसमें अर्जुन द्वारा  गिटार और बाँसुरी पर आधारित संगीत संयोजन  कुमार यानि गीतकार राकेश कुमार के भावों को उभारने में मदद करता है।

इस गीत को लिखा कुमार ने जो पंजाबी फिल्मों के जाने माने गीतकार हैं और हिंदी पंजाबी मिश्रित डांस नंबर्स लिख लिख कर हिंदी फिल्मों में खासा नाम कमा चुके हैं। पर मैं उनसे तब ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ जब उन्होंने अपने गीतों में दर्द के बीज बोए हैं। उनके लिखे दो गीत मुझे खास तौर पर दिल के बेहद करीब लगे थे। एक तो शंघाई फिल्म का गाना जो भेजी थी दुआ और दूसरे Oh My God का मेरे निशाँ हैं कहाँ

इसी कड़ी में जुड़ा है लखनऊ सेंट्रल का ये गीत जो एक ऐसे इंसान की व्यथा का चित्रण कर रहा है जों जिंदगी के रंगों से अपना तारतम्य नहीं बैठा पाया है। फिर भी नायक ने  जिंदगी से प्रेम करना नहीं छोड़ा है।  जिंदगी ने कभी उससे दुश्मनी निभाई भी है तो कभी वो बिल्कुल पास आ कर धड़कन की तरह धड़की भी है। इसीलिए वो ज़िदगी से परेशान जरूर है पर नाउम्मीद नहीं। उसके मन की ऊहापोह को कुमार कुछ यूं व्यक्त करते हैं... 

ज़िन्दगी तेरे रंगों से, रंगदारी ना हो पायी
लम्हा लम्हा कोशिश की, पर यारी ना हो पायी
तू लागे मुझे दुश्मन सी, कभी लगे धड़कन सी
जुड़ी जुड़ी बातें हैं, टूटे हुए मन की..रंगदारी..


कुमार कहते हैं कि अगर ख़्वाबों को पूरा करना कठिन हो जाए तो इसका ये मतलब नहीं कि आँखें ख़्वाब देखना छोड़ दें। आखिर मंजिल की राह दुर्गम ही क्यूँ ना हो सच्चा राही तो उन पर चलता ही चलेगा । इन भावों में रंगदारी शब्द का प्रयोग अनूठा भी है और सार्थक भी।


रंगदारी..रंगदारी.. रंगदारी रंगदारी
आँखों से ना छूटेगी, ख़्वाबों की रंगदारी
रंगदारी..रंगदारी.. रंगदारी रंगदारी
राहों से ना रूठेगी, मंजिल की रंगदारी.. रंगदारी..

चाहे मुझे तोड़ दे तू, दर्दों में छोड़ दे
मेरी ओर आते हुए, रास्तों को मोड़ दे
मोड़ दे.. मोड़ दे
तोहमतें लगा दे चाहे, सर पे इल्ज़ाम दे
कर दे  ख़ुदा से दूर, काफिरों का नाम दे
नाम दे.. नाम दे
ये ख्वाहिशें है पागल सी, आसमां के बादल सी
बरसी तो धुल जाएगी, रौशनी ये काजल सी

ज़िन्दगी तेरे रंगों से...

गीत के अंतिम अंतरे में जीवन से  लड़ने की नायक की जुझारु प्रवृति को उन्होंने उभारने  की कोशिश की है। बादलों से पागल ख़्वाहिशों की उनकी तुलना और फिर उसके बरसने से कालिमा के छँटने का  भाव श्रोताओं में एक धनात्मक उर्जा का संचार कर देता है। अरिजीत एक बार फिर नायक की पीड़ा को अपनी गायिकी से यूँ बाहर ले आते हैं कि सुनने वाला भी नायक के चरित्र से अपने आपको एकाकार पाता है। तो आइए सुनते हैं ये गीत.. 

वार्षिक संगीतमाला में अब तक

13. ये इश्क़ है
14. ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे.
15. ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी
16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Friday, February 16, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 13 : आतिश ये बुझ के भी जलती ही रहती है..ये इश्क़ है. Ye Ishq Hai

वार्षिक संगीतमाला की अगली पेशकश है फिल्म रंगून से। पिछले साल के आरंभ में आई ये फिल्म बॉक्स आफिस पर भले ही कमाल ना दिखा सकी हो पर इसका गीत संगीत बहुत दिनों तक चर्चा का विषय रहा था। यूँ तो इस फिल्म में तमाम गाने थे पर मुझे सूफ़ियत के रंग में रँगा और मोहब्बत से लबरेज़ ये इश्क़ है इस फिल्म का सबसे बेहतरीन गीत लगा।

गुलज़ार के लिखे गीतों को एक बार सुन कर आप अपनी कोई धारणा नहीं बना सकते। उनकी गहराई में जाने के लिए आपको उनके द्वारा बनाए लफ़्ज़ों के तिलिस्म में गोते लगाने होते हैं और इतना करने के बाद भी कई बार कुछ प्रश्न अनसुलझे ही रह जाते हैं। विगत कुछ सालों से उनकी कलम का पैनापन थोड़ा कम जरूर हुआ है पर फिर भी शब्दों के साथ उनका खेल रह रह कर श्रोताओं को चकित करता ही रहता है।



तो चलिए साथ साथ चलते हैं गुलज़ार की इस शब्द गंगा में डुबकी लगाने के लिए।  मुखड़े में गुलज़ार ने  'सुल्फे ' शब्द का इस्तेमाल किया है जिसका अभिप्राय हुक्के या चिलम में प्रयुक्त होने वाली तम्बाकू की लच्छियों से हैं। जलने के बाद भी सुलगते हुए ये जो धुआँ छोड़ती हैं वो मदहोशी का आलम बरक़रार रखने के लिए काफी होता है। गुलज़ार कहते हैं कि इश्क़ की फितरत भी कुछ ऐसी है जिसकी जलती चिंगारी रह रह कर हमारे दिल में प्रेम की अग्नि को सुलगती रहती है।

ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
सूफी के सुल्फे की लौ उठ के कहती है 
आतिश ये बुझ के भी जलती ही रहती है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है..

सदियों से बहती नदी को गुलज़ार की आँखें उस प्रेमिका के तौर पे देखती हैं जो अपने प्रेमी रूपी किनारों पर सर रखकर सोई पड़ी है। यही तो सच्चा इश्क़ है जो तन्हाई में भी अपने प्रिय की यादों में रम जाता है। अपने इर्द गिर्द उसकी चाहत की परछाई को बुन लेता है। उन रेशमी नज़रों  के अंदर के राज अपनी आँखों से सुन लेता है। इसलिए गुलज़ार लिखते हैं

साहिल पे सर रखके, दरिया है सोया है 
सदियों से बहता है, आँखों ने बोया है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
तन्हाई धुनता है, परछाई बुनता है 
रेशम सी नज़रों को आँखों से सुनता है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है...

आख़िर इश्क़ के मुकाम क्या हैं? प्रेम की परिणिति एक दूसरे में जलते रहने के बाद उस ईश्वर से एकाकार होने की है जिसने इस सृष्टि की रचना की है। इसीलिए गुलज़ार मानते हैं कि इश्क़ की इस मदहोशी के पीछे उसका सूफ़ी होना है। इसलिए वो कभी रूमी की भाषा बोलता है तो कभी उनके भी गुरु रहे तबरीज़ी की।

सूफी के सुल्फे की लौ उट्ठी अल्लाह हू.
अल्लाह हू अल्लाह हू, अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू
सूफी के सुल्फे की लौ उट्ठी अल्लाह हू.
जलते ही रहना है बाकी ना मैं ना तू

ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
बेखुद सा रहता है यह कैसा सूफी है 
जागे तो तबरेज़ी बोले तो रूमी है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है...

विशाल भारद्वाज के इस गीत में नाममात्र का संगीत संयोजन है। गिटार और बाँसुरी के साथ अरिजीत का स्वर पूरे गीत में उतार चढ़ाव के साथ बहता नज़र आता है। गायिकी के लिहाज़ से इस कठिन गीत को वो बखूबी निभा लेते हैं। एलबम में इस गीत का एक और रूप भी है जिसे रेखा भारद्वाज जी ने गाया है पर अरिजीत की आवाज़ का असर कानों में ज्यादा देर तक रहता है। तो आइए सुनें रंगून फिल्म का ये नग्मा


वार्षिक संगीतमाला में अब तक

14. ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे.
15. ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी
16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Monday, February 05, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 14 : ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे. Tere Mere

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर इस साल पहली बार प्रवेश कर रही है संगीतकार अमाल मलिक और गायक अरमान मलिक की जोड़ी। पिछले कुछ सालों में भाइयों की इस जोड़ी ने अलग अलग गीतकारों के साथ कुछ कमाल के गीत दिए हैं। पर जब जब रश्मि विराग यानि रश्मि सिंह और विराग मिश्रा की युगल गीतकार जोड़ी के साथ इन्होंने काम किया है बात कुछ और बनती नज़र आई है। 2016 में इनकी ही तिकड़ी ने मैं रहूँ या ना रहूँ तुम मुझमें कहीं बाकी रहना जैसा कमाल का गीत हम श्रोताओं को दिया था। इसके आलावा बोल दो, ना ज़रा, खामोशियाँ, मुस्कुराने की वज़ह तुम हो जैसे लोकप्रिय गीतों में भी ये टीम शामिल थी।



पिछले साल अक्टूबर में आयी सैफ़ अली खाँ की फिल्म शेफ में यही तिकड़ी एक बार फिर साथ आई। संगीतकार अमाल मलिक को जातीय तौर पर इस गीत से बहुत लगाव है। वो कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से उनकी ज़िदगी में जो अनुभव हुए उसका ही कुछ निचोड़ इस गीत में उभर के आया है।

गीतकार विराग मिश्र इस गीत में जो भाव पैदा कर सके हैं उसका वो बराबर का श्रेय अमाल को देते हैं। ये गीत उन्होंने अमाल के साथ मिल कर लिखा । अमाल के मन में एकदम साफ था कि वो गीत के शब्दों में कौन से भाव उत्पन्न करना चाहते हैं। संगीतकार अपने विचारों में इतना स्पष्ट हो तो ये एक चुनौती होती है गीतकार के लिए कि वो अपनी लेखनी से संगीतकार के जज़्बातों को शब्द दे सके।

विराग मिश्र और अमाल मलिक

ये गीत उस परिस्थिति को बयाँ करता है जब दो चाहने वाले हालात, अहम और गलतफहमियों के कुचक्र में फँसकर अलग हो जाते हैं।  गीत की पंक्ति ना तू ग़लत, ना मैं सही सुनते हुए मुझे येशेर याद आ जाता है..

कुछ तुमको भी अज़ीज़ हैं अपने सभी उसूल
कुछ हम भी इत्तिफाक़ से जिद के मरीज हैं

लेकिन अकेले रहकर नायक समझ पाता है कि उसे अपने हमसफ़र की कितनी ज्यादा जरूरत है। इसलिए विराग लिखते हैं ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे.. । बड़ी सहज पर दिल को छूने वाली पंक्तियाँ हैं ये। गीत के अंतरों  में विरह की मानसिक पीड़ा का चित्रण तो है ही, साथ ही ये उम्मीद भी कि राहों  से भटके हुए प्रेमी फिर मिलेंगे। 

अमाल खुद इस गीत के संगीत  संयोजन को पश्चिम और पूर्व का संगम मानते हैं। इस गीत को संगीतबद्ध करते समय उन्हें लगा कि इसमें एक भारतीयता होनी चाहिए और उसे उन्होंने Soft Rock Country Music वाली आवाज़(जिसे वे ख़ुद भी काफी पसंद करते हैं) से मिलाने की कोशिश की।गीत के प्रील्यूड में गिटार की टुनटुनाहट बड़ी प्यारी लगती हे और वो रह रह के पूरे गीत में आ आ कर कानों को सुकून देती हैं। गीत के बोलों के साथ ढोलक और सुराही जैसे ताल वाद्य संगत देते हैं। वहीं इंटरल्यूड्स में एक बार बाँसुरी की धुन भी उभर कर आती है। तो सुनिए अरमान मलिक की आवाज़ में ये नग्मा...

तेरे मेरे दरमियाँ हैं बातें अनकही
तू वहाँ है मैं यहाँ क्यूँ साथ हम नहीं
फैसले जो किये, फासले ही मिले
राहें जुदा क्यूँ हो गयी, ना तू ग़लत, ना मैं सही
ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे..
ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

थोड़ी सी दूरियाँ हैं थोड़ी मजबूरियाँ हैं
लेकिन है जानता मेरा दिल
हो.. इक दिन तो आएगा जब तू लौट आयेगा तब
फिर मुस्कुराएगा मेरा दिल सोचता हूँ यहीं
बैठे बैठे यूँ ही
राहें जुदा क्यूँ हो गयी  ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

यादों से लड़ रहा हूँ, खुद से झगड़ रहा हूँ
आँखों में नींद ही नहीं है हो..
तुझसे जुदा हुए तो लगता ऐसा है मुझको
दुनिया मेरी बिखर गयी है
दोनों का था सफ़र, मंजिलों पे आकर
राहें जुदा क्यूँ हो गयी  ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

सुन मेरे ख़ुदा, बस इतनी सी मेरी दुआ
लौटा दे हमसफ़र मेरा, जाएगा कुछ नहीं तेरा
तेरे ही दर पे हूँ खड़ा, जाऊँ तो जाऊँ मैं कहाँ
तकदीर को बदल मेरी मुझपे होगा करम तेरा..





वार्षिक संगीतमाला में अब तक

15. ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी
16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Wednesday, January 31, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान 15 :ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी Baarish

वार्षिक संगीतमाला में अब बची है आखिरी की पन्द्रह सीढ़ियाँ। पन्द्रहवीं सीढ़ी पर गाना वो जिसमें रूमानियत भी है और मधुरता भी। इस गीत का संगीत दिया है फिर एक बार तनिष्क बागची ने और इसे लिखा है अराफात महमूद ने। फिल्म हाफ गर्लफ्रेंड के इस गाने को तो आप पहचान ही गए होंगे। जी हाँ ये गाना है 'बारिश'। अब बारिश की बूँदों चाहे हौले हौले गिरें या तड़तड़ाकर, इनका स्पर्श मन में मखमली सा अहसास तो  जगा ही देता है। 

आप किसी को चाहते हैं पर उसे कह नहीं पाते तो होता ये है कि आपकी सारी भावनाएँ मन में ही घनीभूत होती रहती हैं। गीतकार अराफात महमूद के पास संगीतकार तनिष्क बागची कहानी की ऐसी ही एक परिस्थिति लेकर आए और कहा कि कुछ ऐसा लिखो कि तुम्हारे शब्दों किसी की भी प्रेमिका प्रभावित हो जाए। तनिष्क की चुनौती स्वीकार करते हुए अराफात ने लिखा कभी तुझमें उतरूँ, तो साँसों से गुजरूँ...तो आए दिल को राहत.मैं हूँ बे ठिकाना, पनाह मुझको पाना..हैं तुझमें दे इजाज़त। अराफात इसे अपना गीत का पसंदीदा टुकड़ा मानते हैं।



वैसे अराफात महमूद में एक दशक से फिल्म जगत में सक्रिय हैं पर बमुश्किल उन्होंने बीस के लगभग गीत लिखे होंगे। पहली बार उनका लिखा नग्मा वार्षिक संगीतमाला 2014 में शामिल हुआ था। गाने के बोल थे मैं ढूँढने को ज़माने में जब वफ़ा निकला पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला तभी से मुझे उनकी काबिलियत का अंदाजा हो गया था।

बंगाल के आसनसोल से ताल्लुक रखने वाले अराफात ने तालीम AMU से हासिल की। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि वो एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। शायरी से उनका प्रेम उन्हें मुंबई खींच लाया जहाँ आठ नौ सालों की जद्दिज़हद के बाद उन्होंने सफलता का स्वाद चखा। उनका मानना है कि वही काम करना चाहिए जिसमें मजा आए और सीखने की हसरत कभी कम ना हो। अपने वरीय गीतकारों के अच्छे काम को सुनने से ही उन्हें और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है।

अराफात गीत के दूसरे अंतरे हवाओं और परिंदों का जिक्र कर मन को गुदगुदाते हैं तो वहीं मौन रहकर भी अपनी प्रेयसी से उनके दिल की बात समझ लेने की गुजारिश भी करते हैं।

संगीतकार तनिष्क गीत की शुरुआत संतूर की मधुर तान से करते हैं और इंटल्यूड्स के समय साथ में गिटार और वायलिन भी ले आते हैं। अपने एक साक्षात्कार में वो ये कहना नहीं भूले कि ये गीत उन्हें उनकी प्रेम कहानी की याद दिला देता है। इस गीत को तनिष्क ने गवाया है ऐश किंग से तो आइए सुनते हैं अर्जुन और श्रद्धा कपूर पर अभिनीत ये गाना...ये गीत आपको अपने किसी ऐसे दोस्त की याद जरूर दिला जाएगा  जिसे बारिश से बेहद प्यार हो


चेहरे में तेरे, खुद को मैं ढूँढूँ
आँखों के दर्मियाँ तू अब है इस तरह
ख़्वाबों को भी जगह ना मिले...

ये मौसम की बारिश ये बारिश का पानी
ये पानी की बूँदें तुझे ही तो ढूँढें .....
ये मिलने की ख्वाहिश, ये ख्वाहिश पुरानी
हो पूरी तुझी से.. मेरी ये कहानी

कभी तुझमें उतरूँ, तो साँसों से गुजरूँ
तो आए दिल को राहत.
मैं हूँ बे ठिकाना, पनाह मुझको पाना
हैं तुझमें दे इजाज़त

ना कोई दर्मियाँ, हम दोनों हैं यहाँ
फिर क्यों हैं तू बता फासले
ये मौसम की बारिश... मेरी ये कहानी

ना ना .....ला ला ...

हवाओं से तेरा पता पूछता हूँ
अब तो आजा तू कहीं से
परिंदों की तरह यह दिल है सफ़र में
तू मिला दे ज़िन्दगी से ....
बस इतनी इल्तजा
तू आके इक दफा जो दिल ने ना कहा
जान ले ......

ये मौसम की बारिश... मेरी ये कहानी


वार्षिक संगीतमाला में अब तक

16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Saturday, January 27, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #16 : मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र Mere Rashke Qamar

साल के पच्चीस बेहतरीन गीतों की फेरहिस्त में आज चर्चा उस गीत की जिसे जनता जनार्दन ने पिछले साल हाथों हाथ लिया था । गीत की धुन तो इतनी लोकप्रिय हुई कि नक्कालों ने इसका इस्तेमाल कर जो भी  पैरोडी बनाई  वो भी हिट हो गयी। जी हाँ, बात हो रही है रश्के क़मर की जिसे मूलरूप में कव्वाली के लिए नुसरत फतेह अली खाँ ने संगीतबद्ध किया और गाया था। इसे लिखा था फ़ना बुलंदशहरी ने जिनके पुरखे भले भारत से रहे हों पर उन्होंने अपना काव्य पाकिस्तान में रचा। 

बहुत से लोग इस गीत के मुखड़े का अलग मतलब लगा लेते हैं क्यूँकि "क़मर" और "रश्क" जैसे शब्द उनकी शब्दावली के बाहर के हैं। उनकी सुविधा के लिए बता दूँ कि शायर ने मुखड़े में कहना चाहा है कि तुम्हारी खूबसरती तो ऐसी हैं कि चाँद तक को तुम्हें देख कर जलन होती है। ऐसे में तुमसे नज़रें क्या मिलीं  दिल बाग बाग हो गया। तुम्हें देख के ऐसा लगा मानो आसमान में बिजली सी चमक गयी हो। अब तो जिगर जल सा उठा है पर इस अगन का मज़ा ही कुछ और है ।



मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया 
बर्क़ सी गिर गयी काम ही कर गयी आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया 
जाम में घोल कर हुस्न की मस्तियाँ चाँदनी मुस्कुराई मज़ा आ गया 

चाँद के साए में ऐ मेरे साकिया तू ने ऐसी पिलाई मज़ा आ गया 
नशा शीशे में अंगड़ाई लेने लगा बज़्म ए रिन्दाँ में सागर खनकने लगे 
मैकदे पे बरसने लगी मस्तियाँ जब घटा गिर के छाई मज़ा आ गया 
बेहिजाबाँ जो वो सामने आ गए 
और जवानी जवानी से टकरा गयी  
आँख उनकी लड़ी यूँ मेरी आँख से 
देख कर ये लड़ाई मज़ा आ गया मेरे 
मेरे रश्के क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया

आँख में थी हया हर मुलाक़ात पर 
सुर्ख आरिज़ हुए वस्ल की बात पर  
उसने शर्मा के मेरे सवालात पे  
ऐसे गर्दन झुकाई मज़ा आ गया 
मेरे रश्के क़मर .....मज़ा आ गया  
बर्क़ सी गिर गयी ...मज़ा आ गया 

शेख साहिब का ईमान बिक ही गया 
देख कर हुस्न-ए-साक़ी पिघल ही गया 
आज से पहले ये कितने मगरुर थे 
लुट गयी पारसाई मज़ा आ गया 
ऐ फ़ना शुक्र है आज बाद-ए-फ़ना 
उसने रख ली मेरे प्यार की आबरू 
अपने हाथों से उसने मेरी क़ब्र पर 
चादर-ए-गुल चढ़ाई मज़ा आ गया 
मेरे रश्के क़मर तू ने पहली नज़र जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया

(शब्दार्थ :   रश्क- ईर्ष्या, बर्क़ - बिजली, क़मर - चाँद, रिंद - शराब पीने वाले,  बेहिज़ाब  - बिना किसी पर्दे के, आरिज़ - गाल, मगरुर - अहंकार, वस्ल - मिलन, फ़ना -मृत्यु )

नुसरत साहब ने इस कव्वाली में अपनी हरक़तें डालकर इसके शब्दों को एक अलग ही मुकाम पे पहुँचा दिया था। इसलिए अगर आप नुसरत प्रेमी हैं तो मैं चाहूँगा कि इस कव्वाली पर आधारित गीत को सुनने के पहले मूल रचना को अवश्य सुनें। फ़ना साहब की शायरी में जो शोखी और रसीलापन है वो जरूर आपके मन में आनंद जगा जाएगा..


फिल्म  बादशाहो के निर्माता भूषण कुमार ने नुसरत की ये गाई ग़ज़ल जब सुनी थी तभी से इसे गीत की शक्ल में किसी फिल्म में डालने का विचार उनके मन में पनपने लगा था। निर्देशक मिलन लूथरा ने जब उन्हें फिल्म में नायक नायिका के पहली बार आमने सामने होने की परिस्थिति बताई तो भूषण को लगा कि  नुसरत साहब की उस कव्वाली को इस्तेमाल करने की ये सही जगह होगी। मिलन ख़ुद नुसरत प्रेमी रहे हैं। मजे की बात ये है कि उनकी पिछली फिल्म कच्चे धागे का संगीत निर्देशन भी नुसरत साहब ने ही किया था और उस फिल्म में भी अजय देवगन मौज़ूद थे। यही वज़ह रही कि भूषण जी का विचार तुरंत स्वीकृत हुआ।

गीत के बोलों को आज के दौर के हिसाब से परिवर्तित करने का दायित्व गीतकार मनोज मुन्तशिर को सौंपा गया। संगीत की बागडोर सँभाली इस साल सब से तेजी से उभरते संगीतकार तनिष्क बागची ने। अगर आपने नुसरत साहब की कव्वाली सुनी होगी तो पाएँगे कि मूल धुन से तनिष्क बागची ने ज़रा भी छेड़ छाड़ नहीं की है। कव्वाली में हारमोनियम के साथ तालियों के स्वाभाविक मेल को उन्होंने यहाँ भी बरक़रार रखा है। जोड़ा है मेंडोलिन को  जो कि इंटरल्यूड्स में  बजता सुनाई देता है। कव्वाली और गीत के बोलों के मिलान आप समझ जाएँगे कि मुखड़े और बर्क़ सी गिर गई वाले अंतरे को छोड़ बाकी के बोल मनोज मुन्तशिर के हैं।

ये अलग बात है कि मनोज अक़्सर कहते रहे हैं कि पुराने गीतों को नया करने का ये चलन उन्हें पसंद नहीं है क्यूँकि इसमें गीतकार और संगीतकार को श्रेय नहीं मिल पाता। बात सही भी है अगर इस गीत को कोई याद करेगा  तो वो सबसे पहले नुसरत और फ़ना का ही नाम लेगा। तो आइए सुनते हैं ये गीत जिसे गाया है राहत फतेह अली खाँ साहब ने

ऐसे लहरा के तू रूबरू आ गयी
धड़कने बेतहाशा तड़पने लगीं
तीर ऐसा लगा दर्द ऐसा जगा
चोट दिल पे वो खायी मज़ा आ गया

मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
जब नज़र से मिलायी मज़ा आ गया
जोश ही जोश में मेरी आगोश में
आके तू जो समायी मज़ा आ गया
मेरे रश्के क़मर .... मज़ा आ गया

रेत ही रेत थी मेरे दिल में भरी 
प्यास ही प्यास थी ज़िन्दगी ये मेरी
आज सेहराओं में इश्क़ के गाँव में
बारिशें घिर के आईँ मज़ा आ गया
मेरे रश्के क़मर  तूने पहली नज़र ...

रांझा हो गए हम फ़ना हो गए ऐसे तू मुस्कुरायी मज़ा आ गया
मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र जब नज़र से मिलायी मज़ा आ गया
बर्क़ सी गिर गयी काम ही कर गयी  आग ऐसी लगायी मज़ा आ गया



चलते चलते ये भी बता दूँ कि आज इस गीत की लोकप्रियता का ये आलम है कि मुखड़े में हास्यास्पद तब्दीलियाँ करने के बावज़ूद मेरे रश्क़ ए क़मर तूने आलू मटर इतना अच्छा बनाया मजा आ गया जैसी पंक्तियाँ भी उतने ही चाव से सुनी जा रही हैं।

वार्षिक संगीतमाला में अब तक

17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है

Wednesday, January 24, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान 17 : चोरी से, चोरी से छुप-छुप के तिनका तिनका, चुन के सपना एक बनाया Sapne Re

जब किसी उभरती गायिका पर फिल्म बनेगी तो ज़ाहिर है उसको निभाने के लिए अभिनेत्री के साथ उसकी आवाज़ की भी तलाश होगी। सीक्रेट सुपस्टार की स्क्रिप्ट जब अद्वैत चंदन और आमिर ने संगीतकार अमित त्रिवेदी को थमाई तो साथ ही उन्हें एक किशोर  गायिका को  खोजने का दायित्व भी दे दिया जो फिल्म में ज़ायरा वसीम की आवाज़ बन सके।

अमित अपने काम में लग गए। 28 लोगों को बुलाया गया। उनमें सात आठ आवाजें छांटी गयीं और अंततः मेघना की आवाज़ में अमित वो पा गए जो वो चाहते थे। अमित ने उनकी आवाज़ को सहजता से बहता हुआ पाया। एक बार जब आमिर और अद्वैत की स्वीकृति मिल गयी तब जाकर आगे का काम शुरु हुआ। वैसे मेघना हैं कौन ये तो आप जानना चाहेंगे ही।


मेघना ग्यारहवी की छात्रा हैं और मुंबई में पली बढ़ी हैं। उनके पिता उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। पिता ख़ुद गायिकी से जुड़े हैं और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत में परास्नातक हैं। गाजीपुर से मुंबई आकर उन्होंने भी अपने आप को यहाँ स्थापित करने की कोशिश की। कुछ खास मौके नहीं मिले तो संगीत सिखाने में जुट गए। मेघना की माँ एक तबला वादक हैं। इतने भरे पूरे संगीत के माहौल में मेघना नहीं गाती तो आश्चर्य था। हालांकि उनका सफ़र भी इतना आसान नहीं रहा। छठी कक्षा में इंडियन आइडल जूनियर में भाग लेने गयीं पर जल्द ही बाहर हो गयीं। फिर भी संगीत सीखना नहीं छोड़ा। एक मराठी फिल्म में गाने का मौका मिला और फिर उस फिल्म के संगीत निर्देशक ने सीक्रेट सुपरस्टार के लिए उनका नाम अमित त्रिवेदी को सुझाया।

ज़ायरा वसीम और मेघना मिश्रा 

अमित त्रिवेदी ने  मेघना से  इस फिल्म के लिए  पाँच एकल गीत गवाए । टीवी पर मैं कौन हूँ और नचदी फिरा का जोर शोर से प्रचार हुआ और नचदी फिरा के लिए फिल्मफेयर ने उन्हें इस साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका भी घोषित कर दिया। पर उनके गाए गानों में मुझे मेरी प्यारी अम्मी जो हैं और सपने रे ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। मेरी प्यारी अम्मी की जगह तो इसी फिल्म के एक और प्यारे गीत गुदगुदी ने ले ली पर सपने रे ने मेरे दिल में अंत तक अपनी जगह बनाई रखी।

सीक्रेट सुपरस्टार एक ऐसी फिल्म थी जिसके गानों में ही फिल्म की कहानी पलती बढ़ती रही। गीत के बोलों और संगीत पर इसका खासा असर रहा। ये गीत फिल्म में तब आता है जब नायिका अपनी दोस्तों के साथ सफर पर है। साथ में है उसका गिटार। दोस्त जब गाने की फर्माइश करते हैं तो शुरुआत होती है सपने रे की।

क़ौसर मुनीर को एक किशोरी के मन में धीरे धीरे आकार ले रहे सपने को शब्द देने थे । उनकी चुनौती ये भी थी कि वो गीत में  जिस भाषा का प्रयोग करें वो स्कूल की छात्रा की भाषा हो। इसलिए क़ौसर ने मुखड़े में पक्षियों की तरह तिनका तिनका बुन के नवजात सपने को घोंसले में जगह तो दी पर जब उसे छुपाने का वक़्त आया तो डॉयरी और गुथी हुई चोटी को उन्होंने मुनासिब समझा । 

अमित के संगीत में गिटार और ताल वाद्यों का प्रमुखता से उपयोग होता है। यहाँ भी ये वाद्य उपस्थित हैं पर साथ में बाँसुरी का हल्का फुल्का तड़का भी है।

कोई भी बच्चा चाहे किसी का हो हमें कितना प्यारा लगता है। फिर आप बताइए अगर मन में शिशु के रूप में एक सपने का जन्म हो तो उसे आप गलत नज़रों से बचा कर, खूब सहेज कर रखेंगे ना। वैसे भी हम सभी अगर अपने नन्हे सपनों से प्यार नहीं करेंगे तो वो बड़े कैसे होंगे? इस प्यारी सी भावना को ये गीत श्रोताओं के दिलों तक पहुँचाता है। चलिए आज आप भी मिल आइए इस मासूम सपने से..

चोरी से, चोरी से छुप-छुप के 
मैंने चोरी से, चोरी से छुप-छुप के 
तिनका तिनका, चुन के सपना एक बनाया 
डोरी से, डोरी से बुन बुन के मैंने डोरी से, 
टुकड़ा टुकड़ा सी के सपना एक बनाया.. 
सपने रे, सपने रे.. सपने मेरे सच 
हो जाना रे हो जाना रे हो जाना रे

आजा डायरी में छुपा दूँ 
आजा तुझको चोटी में बाँधूँ 
कहीं किसी को ना दिख जाए  
सपने रे, सपने रे, सपने मेरे
हाथ तेरा कस के पकड़ लूँ 
साथ साथ तेरे मैं चल दूँ 
डर तुझे ना किसी से लग जाए 
सपने रे, सपने रे, सपने मेरे 
रातों को, रातों को जग जग के मैंने  
तारा तारा, चुन के सपना एक बनाया 
सपने रे, सपने रे सपने मेरे सच हो जाना रे हो जाना रे....




वार्षिक संगीतमाला में अब तक

18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है abdf

Monday, January 22, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #18 : कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी Hai Zaroori

मनोज मुन्तशिर और अमाल मलिक ये दो ऐसे कलाकार हैं जिनके लिखे और रचे गीत युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। मनोज इस साल अपने हॉफ गर्लफ्रेंड के गीत मैं फिर भी तुम को चाहूँगा के लिए काफी उत्साहित दिखे और ये गीत लोकप्रिय भी हुआ। पर उस गीत से कहीं अच्छी मुझे उसके पीछे की नज़्म लगी जिसे मनोज ने 2001 में लिखा था। वहीं अमल मलिक इस साल बद्रीनाथ की दुल्हनिया में रचे अपने गीतों की सफलता पर बेहद खुश थे हालांकि कुल मिलाकर मुझे उस फिल्म का संगीत औसत ही लगा।  



पिछले साल के सारे गीतों को सुनते हुए मुझे इस जोड़ी की कृतियों में सबसे ज्यादा प्रभावित किया नूर के इस गाने ने। ये गाना इस साल ज्यादा बजा भी नहीं पर फिर भी एक बार सुनते ही इसके बोल और संगीत रचना दिल को अंदर तक छू गयी और यही वज़ह है कि साल के पच्चीस शानदार गीतों में ये नग्मा अपनी जगह बना सका है।

नूर एक ऐसे पत्रकार की कहानी थी जो अपने जीवन की परेशानियों से हताश है। अपने लिए समय की कमी, बढ़ते वजन की चिंता, मनचाहा साथी ना मिल पाने का ग़म और  बॉस की उसके काम से नाराजगी उसकी ज़िंदगी को बेढंगा किए जा रहा था। फिर परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि नौकरी और निजी ज़िन्दगी में सब कुछ सही सा लगने लगा। पर उसने जिस शख़्स में अपनी भविष्य की खुशियाँ देखीं वही उसका विश्वास तोड़ कर चला गया। 

मनोज मुन्तशिर को नूर के मानसिक हालातों को गीत में शब्द देने थे और ये काम उन्होंने बखूबी किया। हम कितने भी ज़हीन क्यूँ ना हों किसी का असली चेहरा हमेशा नहीं पढ़ पाते। गलतियाँ हो ही जाती हैं और भावनात्मक ठेस से हम टूट जाते हैं। पर ज़िदगी का मजबूती से सामना करने के लिए टूटना भी जरूरी है। आँसुओं को हमेशा कमजोरी की निशानी नहीं समझना चाहिए। ये बहते हैं तो इनके साथ हमारी मुलायमियत भी बह जाती है। रह जाता है तो हमारा लक्ष्य को बेंधने का संकल्प  इसलिए मनोज लिखते हैं 

कभी कभी लगे यही जो मिलना था मिला वही 
बिखरना भी दुआओं का है ज़रूरी 
किसी के वास्ते कहाँ ज़मीन पे आया आसमान 
ये दूरियाँ रही बस दूरियाँ 
कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
कि पानी पानी अँखियों का अँखियों का होना है ज़रूरी.. 

अमाल मलिक का संगीत इस शब्द प्रधान इस गीत के पीछ धीरे धीरे बहता है। इंटरल्यूडस में गिटार और फिर वायलिन की धुन गीत की मायूसी में गुथी नज़र आती है। पियानों की हल्की धनक भी गीत के साथ चलती है। गीत का अंत सेक्सोफोन और पियानो की जुगलबंदी से होता है।

गीत की मनोभावनाओं को प्रकृति कक्कर अपनी आवाज़ से उभारने में कामयाब रही हैं। मेरी समझ से टुटिया दिल के बाद पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड के लिए गाया सबसे बेहतरीन गीत है। अंतरों में भी मनोज की कलम उतनी ही मजबूती से चलती है। पागल दिल की आसमानी बातों का जिक्र अपना सा लगता है इसीलिए भाता है। आशा  है इस गीत के साथ आप सब भी अपने दिल के तारों को जोड़ पाएँगे।


कभी कभी लगे यही 
जो होना था हुआ वही 
बदलना भी हवाओं का है ज़रूरी

कभी कभी लगे यही जो मिलना था मिला वही 
बिखरना भी दुआओं का है ज़रूरी 
किसी के वास्ते कहाँ ज़मीन पे आया आसमान 
ये दूरियाँ रही बस दूरियाँ 
कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
कि पानी पानी अंखियों का अंखियों का होना है ज़रूरी.. 
रह गयी आरज़ू एक अधूरी के 
कि कभी कभी ऐसा भी, ऐसा भी होना है ज़रूरी

नासमझ थे हम जो ये भी ना समझे 
वक़्त आने पर सब बदलते हैं 
मंजिलें क्या हैं और रास्ते क्या हैं 
लोग पल भर में यहाँ रब बदलते हैं 
किसी के वास्ते कहाँ किनारे आये कश्तियाँ 
ये दूरियाँ रही बस दूरियाँ 
कि चोरी चोरी  है ज़रूरी 

मुस्कुराने के कितने बहाने थे 
फिर भी आँखों ने क्यूँ नमी चुन ली 
दिल की बातें तो सब आसमानी थी 
हम ही पागल थे इस दिल की जो सुन ली 
किसी के वास्ते कहाँ मिली है रात से सुबह 
कि दूरियाँ रही बस दूरियाँ 
कि चोरी चोरी .... है ज़रूरी

Saturday, January 20, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #19 : नज़्म नज़्म.. त्रुटिपूर्ण भाषा की मार सहती एक मधुर धुन ! Nazm Nazm

वार्षिक संगीतमाला की 19 वीं पायदान पर गाना वो जो मेरे आरंभिक आकलन के बाद सुनते सुनते कई सीढ़ियाँ नीचे की ओर लुढ़का है। पर अब भी अगर ये मेरी गीतमाला में शामिल  है तो उसकी वज़ह है इसके मुखड़े का शानदार भाव और इसकी धुन की मधुरता। ये गीत है फिल्म 'बरेली की बर्फी' का जिसे रचा है अर्को ने।


अर्को प्रावो मुखर्जी के गीतों से मेरा प्यार और दुत्कार वाला रिश्ता रहा है। बतौर संगीतकार वो मुझे बेहद प्रभावित करते हैं। उनके शायराना हृदय के खूबसूरत भाव  रह रह कर उनके गीतों में झलकते हैं। पर भाषा पर पकड़ न होने के कारण वो एक गीतकार की भूमिका में खरे नहीं उतरते और ये बात वो जितनी जल्द समझ लें उतना अच्छा। 

अब बरेली की बर्फी के इस गीत को लीजिए। कितना रूमानी ख्याल था मुखड़े में कि मेरी प्रेयसी एक नज़्म की तरह मेरे होठों पर ठहर जाए और मैं उसकी आँखों में  मैं एक ख़्वाब बनकर जाग जाऊँ। वाह भई वाह! अर्को इस मुखड़े के लिए तो आप शाबासी के हकदार हैं पर ये क्या आपने तो नज़्म का लिंग ही बदल दिया। अरे नज़्म की बातें करते हुए कम से कम गुलज़ार की इन पंक्तियों को याद कर लेते तो मुखड़े में ऐसी गलती नहीं करते 

नज़्म उलझी हुई है सीने में 
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर 
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह 
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं 

कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम 
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है 
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

इसलिए आपको कहना चाहिए था
तू नज़्म नज़्म सी मेरे होंठो पे ठहर जा 
मैं ख्वाब ख्वाब सा तेरी आँखों में जागूँ रे 

लिंग की ये गलतियाँ इत्र सा (सी) और तेरे (तेरी) कुर्बत और मेरे (मेरी) साँसों में भी बरक़रार रहती हैं और गीत सुनने के आनंद को उसी तरह बाधित करती हैं जैसे चावल में कंकड़। मुझे समझ नहीं आता कि इतनी गलतियाँ  निर्देशिका और उनकी पूरी टीम को नज़र कैसे नहीं आई? गायक के तो उसे पकड़ने का सवाल ही नहीं उठता क्यूंकि इस गीत की लिखने और संगीतबद्ध करने के साथ गाने की भी जिम्मेदारी अर्को ने सँभाली थी। 

फिर भी गीत की गिटार प्रधान धुन ऐसी है जो तुरंत ज़हन में बस जाती है और आपको मुखड़े को गुनगुनाने पर विवश कर देती है। अर्को के रचे इंटरल्यूड्स कर्णप्रिय हैं। गीत का फिल्मांकन नायक नायिका के बीच एक ओर खिलती दोस्ती और दूसरी ओर पनपते प्यार के छोटे छोटे पलों को अच्छी तरह पकड़ता है इसलिए इसे देखना भी मन को रूमानियत से भर देता है। तो आइए सुने ये गीत इस उम्मीद के साथ कि अर्को ऐसी गलतियों से बाज आएँगे।

तू नज़्म नज़्म सा (सी) मेरे होंठो पे ठहर जा 
मैं ख्वाब ख्वाब सा तेरी आँखों में जागूँ रे 
तू इश्क़ इश्क़ सा मेरे रूह में आ के बस जा 
जिस ओर तेरी शहनाई उस ओर मैं भागूँ रे 

हाथ थाम ले पिया करते हैं वादा 
अब से तू आरजू तू ही है इरादा 
मेरा नाम ले पिया मैं तेरी रुबाई 
तेरे ही तो पीछे-पीछे बरसात आई, बरसात आई 

तू इत्र इत्र सा (सी) मेरे (मेरी) साँसों में बिखर जा 
मैं फ़कीर तेरे (तेरी) कुर्बत का तुझसे तू माँगूँ रे 
तू इश्क इश्क सा मेरे रूह में आ के बस जा 
जिस ओर तेरी शहनाई उस ओर मैं भागूँ रे 

मेरे दिल के लिफाफे में तेरा ख़त है जाणिया 
तेरा ख़त है जाणिया .. 
नाचीज़ ने कैसे पा ली किस्मत ये जाणिया वे 
तू नज़्म नज़्म सा (सीमेरे होंठो पे ठहर जा। 

Friday, January 19, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान 20 :मीर-ए-कारवाँ Meer e Kaarwan

एक हफ्ते के विराम के बाद वार्षिक संगीतमाला का कारवाँ फिर चल पड़ा है साल के बचे हुए बीस शानदार गीतों के सफ़र पर  संगीतमाला की बीसवीं पायदान पर गीत वो जिसे लिखा नवोदित गीतकार अधीश वर्मा ने, धुन बनाई संगीतकार रोचक कोहली ने और जिसमें आवाज़े दीं नीति मोहन व अमित मिश्रा ने । जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ फिल्म लखनऊ सेंट्रल के गीत मीर ए कारवाँ की।

चंडीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले रोचक कोहली का सितारा पहली बार आयुष्मान के साथ रचे उनके गीत पानी दा रंग के साथ चमका था। आरंभिक कुछ सालों में आयुष्मान के साथ अपना फिल्म संगीत की शुरुआत करने वाले रोचक कोहली इस साल नाम शबाना, करीब करीब सिंगल और लखनऊ सेंट्रल से बतौर संगीतकार अपनी व्यक्तिगत पैठ बनाते दिखे। चाहे विकी डोनर का पानी दा रंग हो या हवाईज़ादा कासपना है निजाम का ,रोचक की गिटार पर महारत देखते ही बनती है।


मीर ए कारवाँ में भी मुखड़े के पहले  गिटार के साथ तबले का अद्भुत मेल श्रोताओं का ध्यान एक बार ही में आकर्षित कर लेता है। गिटार और तबले की ये संगत ऐसी है जिसे बार बार सुनने का मन  होता है और रोचक इसीलिए उसका प्रयोग इंटरल्यूड्स में भी करते हैं। ये कहना लाजिमी होगा कि संगीत का ये टुकड़ा इस गीत की सिग्नेचर ट्यून बन कर उभरा है। रोचक कोहली ने अधीश की मदद से इस गीत को सूफियत का जामा पहनाने की कोशिश की है। पर गीत के कुछ हिस्से "मितवा" की याद दिला देते हैं जिससे बचा जा सकता था।

फिल्म के गीतकार अधीश वर्मा का फिल्मों के लिए लिखा गया दूसरा गीत है। इससे पहले वे रोचक के साथ बैंक चोर  का एक गीत लिख चुके थे। मीर ए कारवाँ एक ऐसा गीत है जो फिल्म की कहानी में ज़िंदगी की अलग अलग राहों से भटकते हुए किरदारों को संगीत के माध्यम से जोड़ता है। जेल की सलाखों में बंद इन किरदारों को एक नयी मंज़िल की तलाश है।

अधीश ने गीत में मीर-ए-कारवाँ का जुमला उछाला है। दरअसल सफ़र में साथ चलने वाले समूह के नेता को ही 'मीर-ए-कारवाँ' कहा जाता  है। पर अधीश ने इस गीत में कहना चाहा है कि जब हम जीवन की जटिल राहों में अकेले ही संघर्ष करते हैं तो हमारी उम्मीद की किरण, हमारे सफ़र का मसीहा यानि हमारा मीर ए कारवाँ बस एक ऊपर वाला होता है। अधीश इसी मीर ए कारवाँ से अपने किरदारों (जो जीवन की इस गहरी स्याह रात से होकर गुज़र रहे हैं ) के लिए नए उजाले की दुआ करते हैं। 

बहार क्यूँ तेरे दर ना आती.. वाले अंतरे में अधीश किरदारों की अपने आस पास की परिस्थितियों से उपजी हताशा को बखूबी रेखांकित करते हैं। नीति मोहन की आवाज़ मुझे हमेशा से प्यारी लगती रही है। इस गीत में उनका अमित मिश्रा  ने भी बखूबी साथ दिया  है तो आइए सुनें इन दोनों के स्वर में फिल्म लखनऊ सेंट्रल का ये गाना...


ओ बंदेया ओ बंदेया
ओ बंदेया ओ बंदेया
ओ बंदेया ओ बंदेया

तेरी मंज़िलें हुईं गुमशुदा
फिर भी रास्ता है तेरा मेहेरबां
ओ मीर-ए-कारवाँ 
तेरी राहों पे रवाँ
कि मेरे नसीबों में
हो कोई तो दुआ
ओ मीर-ए-कारवाँ
ले चल मुझे वहाँ
ये रात बने जहाँ सुबह
मीर-ए-कारवाँ, ओ मीर-ए-कारवाँ

ओ बस कर दिल अब बस कर भी
हो बस कर दिल अब बस कर भी
उस राह मुझे जाना ही नहीं
पल दो पल का साथ सफ़र फिर
होगी जुदा रहगुज़र
नदिया थाम के जो बहते रहे
मिलते हैं वो किनारे कहाँ

ओ मीर-ए-कारवाँ, तेरी राहों पे रवाँ...

बहार क्यूँ तेरे दर ना आती
है क्या भरम जो नज़र दिखाती
अब और कितनी ये रात बाक़ी
है रात बाक़ी, ये रात बाक़ी
निगल ना जायें तुझे ये साये
गले में घुटती हैं सर्द आहें
बता ओ बंदे क्यूँ मात खाये
क्यूँ मात खाये रे

लागे ना दिल अब लागे नहीं
लागे ना दिल अब लागे नहीं
मेरे पैरों तले निकली जो ज़मीं
इस बस्ती में था मेरा घर
उसे किस की लगी फिर नज़र
वो जो सपनों का था काफ़िला
ऐसा झुलसा की अब है धुआँ

ओ मीर-ए-कारवाँ, तेरी राहों पे रवाँ...
चल अकेला राही, चल चल अकेला राही
हाफ़िज़ तेरा इलाही, हाफ़िज़ तेरा इलाही



वार्षिक संगीतमाला में अब तक


21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है 

Thursday, January 11, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान 21 : गुदगुदी , गुदगुदी करने लगा है हर नज़ारा Gudgudi

वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं सीढ़ी पर गाना है फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार का। जग्गा जासूस की तरह ही सीक्रेट सुपरस्टार भी पिछले साल की एक म्यूजिकल थी। अमित त्रिवेदी पूरे एलबम के संगीत संयोजन में प्रीतम जैसा तो कमाल नहीं दिखा सके फिर भी उन्होंने एक अलग तरह के विषय पर बनाई फिल्म में कौसर मुनीर के शब्दों को अपनी धुनों से मधुर बनाने की अच्छी कोशिश जरूर की है।


गीतमाला में इस फिल्म का जो पहला गीत शामिल हुआ है वो है "गुदगुदी" जिसे गाया है सुनिधि चौहान ने। अमित त्रिवेदी को फिल्मों में ज्यादातर गाने ऐसे मिले हैं जो फिल्म की कहानी से पूरी तरह गुथे होते हैं। ये गीत भी इसी प्रकृति का है। कहानी एक किशोरी की है जो प्रतिभावान है, गायिका बनना चाहती है पर घर की बंदिशों ने उसकी बाहरी दुनिया तक पहुँचने की हसरत को नाउम्मीदी में बदल दिया है। ऐसे में जब उसकी माँ एक लैपटाप ले आती हैं तो इंटरनेट के माध्यम से उसे खुशियों का खजाना सा मिल जाता है क्यूँकि अब वो यू ट्यूब के माध्यम से अपने गाने रिकार्ड को दुनिया को सुना सकती है।

अगर हम मन से प्रसन्न हो ना तो छोटी से छोटी बात में खुशी ढूँढ लेते हैं। गीतकार कौसर मुनीर मन के इसी भाव को "गुदगुदी" के रूपक में बाँधा है। अक्सर आप किसी के प्यारे दोस्त के बारे में बात करें तो उसके प्रफुल्लित चेहरे को देख कर कहते हैं क्यूँ उसका जिक्र सुनकर दिल में गुदगुदी हुई ना?

यहाँ हमारी ये किशोर नायिका तो ख़ैर इतनी खुश है कि माँ का लाड़, छोटे भाई की तकरार और सहपाठी का प्यार सब मन में गुदगुदी ही जगा रहा है। तभी तो कौसर उनकी आवाज़ बनकर लिखती हैं..

अभी अभी आँखों ने सीखा मटकना
अभी अभी दाँतों ने सीखा चमकना
लगता है जैसे अभी अभी इस दिल ने
सीखा दिल से हँसना

अभी अभी बालों ने सीखा है खुलना
अभी अभी दागों ने सीखा है धुलना
लगता है जैसे अभी अभी इस दिल ने
सीखा दिल से हँसना

गुदगुदी , गुदगुदी करने लगी बिंदियाँ
गुदगुदी , गुदगुदी करने लगी चोटियाँ
गुदगुदी , गुदगुदी करने लगा है हर नज़ारा

गुदगुदी , गुदगुदी करने लगी तितलियाँ
गुदगुदी , गुदगुदी करने लगी चिड़ियाँ
गुदगुदी , गुदगुदी करने लगा है हर नज़ारा

अमित त्रिवेदी ने गीत के इंटरल्यूड्स में मैंडोलिन और सैक्सोफोन के मधुर टुकड़े डाले हैं। बीच बीच में कोरस भी गीत में नया जोश सा भरता है। गीत के मस्ती और शोखी के मूड को सुनिधि ने अपनी धारदार गायिकी से जीवंत कर दिया है।  हफ्ते भर पहले वो वास्तविक जीवन में माँ भी बनी है। उम्मीद है कि इस गीत के साथ ही नया साल उनकी ज़िंदगी को खुशियों से भर दे। तो आइए सुनते हैं उनकी आवाज़ में  इस प्यारे से गीत को..


Tuesday, January 09, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान 22 : संगमरमर के बँगले बनाता है, दिल अकबर का पोता है

फिल्मों गीतों में गालियों को मुखड़ों में इस्तेमाल करने का रिवाज़ नया नहीं है। दरअसल गीतों में उनका प्रयोग  कुछ इस तरह से हुआ है कि अव्वल तो वो गालियाँ रही नहीं बल्कि एक तरह की उलाहना बन गयीं हैं। मजे की बात है कि गीतकारों की सारी खुंदस मुए इस दिल पर ही उतरी है। दिल बदमाश भी है (बदमाश दिल तो ठग है बड़ा..सिंघम)और बदतमीज़ भी ( बदतमीज़ दिल YZHD)। गुलज़ार साहब तो एक स्तर और बढ़ गए और उसे 'कमीना' ही बना दिया। पर इस कमीने दिल पर क्या खूब कहा था उन्होंने..    

क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले
इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले
रात दिन गिले...
मेरी आरज़ू कमीनी, मेरे ख्वाब भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने..

इसलिए जब जग्गा जासूस में अमिताभ भट्टाचार्य ने इस दिल को 'उल्लू के पठ्ठे' की संज्ञा दे दी तो लगा कि इस बेचारे दिल को ना जाने आगे और कितने बुरे दिन देखने हैं। कसूर भी क्या जाना ना हो जहाँ वहीं जाता है..फूटी तक़दीर आज़माता है। अब बात भले सही हो पर ज़िंदगी में जो कुछ भी अच्छा है वो तो इसी दिल की बदौलत है। भले ये काबू में नहीं रहता, दिमाग से लड़ झगड़ कर हमसे उल्टी सीधी हरक़ते  करवा लेता है पर ये तो उन लहरों की तरह है जो अगर तट पर उथल पुथल ना मचाएँ तो शरीर रूपी सागर बिल्कुल बेजान हो जाए।



वैसे सच बताऊँ तो  इस गाने ने मेरा ध्यान अपनी ओर गाली वाली हुक लाइन से नहीं बल्कि प्रील्यूड में प्रीतम के गिटार के शानदार संयोजन की वज़ह से आकर्षित किया था। प्रीतम ने इस गीत में इलेक्ट्रिक और एकॉस्टिक गिटार के आलावा फ्लोमेनको गिटार का इस्तेमाल किया जो स्पेन से प्रचलन में आया।फ्लोमेनको गिटार का ऊपरी सिरा परंपरागत गिटार से थोड़ा पतला होता है। स्पेनिश नृत्य में पैरों की थाप के बीच तेज आवाज़ की जरूरत होती है जो इस गिटार के आधार को रोजवुड जैसी मजबूत लकड़ी से बनाए जाने से उत्पन्न की जा सकती है। 

इस गीत को अपनी आवाज़ दी है अरिजीत सिंह और निकिता गाँधी ने और गीत के मूड के साथ उनकी गायिकी जँची भी है। गीत में अमिताभ ने दिल की शान में कुछ मजेदार पंक्तियाँ रची हैं। मिसाल के तौर पर संगमरमर के बँगले बनाता है, दिल अकबर का पोता है या फिर आजकल के प्रेम के परिपेक्ष्य में उनका कहना जैसे आता है चुटकी में जाता है दिल सौ सौ का छुट्टा है। अमिताभ की मस्तिष्क की इस उर्वरता को देख मन मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता।

पर्दे पर चेहरे पर शून्यता का भाव लिए  हुए रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ ने जो रोबोट सदृश लटके झटके किये हैं वो भी दर्शकों का दिल लुभाते हैं। तो आइए इस गीत की मस्ती के साथ मन को थोड़ा आनंदमय कर लें ...


और हाँ अगर वीडियो देख के आप के मन में ये सवाल उठ रहा हो कि ये किस देश में फिल्माया गया तो बता दूँ कि रणवीर कैटरीना का ये गाना उत्तर अफ्रीका के देश मोरक्को में शूट हुआ था।😊
 

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