Sunday, September 17, 2017

रस घोलता रवींद्र संगीत : तुमी रोबे नीरोबे Tomi Robe Nirobe

रवींद्र नाथ टैगोर एक कवि, उपन्यासकार, चिंतक तो थे ही, साथ ही एक गीतकार और संगीतकार भी थे। दो हजार से ज्यादा गीतों को लिखना और उनकी धुन तैयार करना इस बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्तित्व का कमाल ही लगता है। उनके समस्त संगीत को रवींद्र संगीत के नाम से जाना जाता रहा है।  यूँ तो रवींद्र संगीत की जड़े बंगाल में रहीं पर बंगाल के लोगों ने इस गायन शैली को बिहार, झारखंड और ओड़ीसा तक पहुँचाने में मदद की। मुझे याद है कि बचपन में पटना का रवींद्र भवन सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। रवींद्र संगीत को पहली बार सुनने का अवसर मुझे वहीं मिला।

रवींद्र संगीत की खासियत रही है कि इन गीतों में वाद्य यंत्रों का कम से कम इस्तेमाल रहा और ज्यादा महत्त्व बोलों और गायिकी को मिला। गुरुवर टैगोर नहीं चाहते थे कि उनकी धुन, उनके नोटेशेन्स के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ की जाए। यही वजह थी कि उनका गीत भले ही तमाम कलाकारों द्वारा क्यूँ ना गाया गया हो सब का गाने का अंदाज एक सा रहता है। पर हाल ही में मेरे एक बंगाली मित्र ने बताया कि विगत कुछ वर्षों से कॉपीराइट अवधि खत्म होने के बाद लोग उनके गीतों को अलग धुनों में पेश कर रहे हैं।



पिछले महीने मुझे टैगोर का रचा ऐसा ही एक गीत सुनने को मिला जिसे मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ नई पीढ़ी के दो उदीयमान गायकों की आवाज़ में जिसमें एक ने तो हाल ही में गायिकी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है तो दूसरा आज के युवाओं का चहेता है और पुराने से लेकर नए गानों को अपनी आवाज़ में ढालने में माहिर है।

इस गाने में जो बांग्ला प्रयुक्त हुई है वो बिल्कुल कठिन नहीं हैं क्यूँकि उसमें ज्यादा संस्कृत से आए शब्द हैं जो हिंदी में उतने ही प्रचलित हैं । फिर भी आप इस संवेदनशील गीत का लुत्फ उठा सकें इसलिए इसका अनुवाद करने की कोशिश की है मैंने।

तुमी रोबे नीरोबे हृदय ममो
निबिरो निभृतो पूर्णिमा निशीथीनी समो

ममो जीबनो जौबनों ममो अखिलो भुबनो
तुमी भोरिबे गौरबे निशीथीनी समो
तुमी रोबे नीरोबे हृदय ममो

जागिबे एकाकी तबो करूणो आखी
तबो अंचोल छाया मोरे रोहिबे ढाकी
ममो दुखो बेदनो ममो सफल स्वपनो
तुमी भोरिबे सौरभे निशीथीनी समो

तुम मेरे हृदय में चुपचाप यूँ ही प्रकाशमान रहोगी जैसे कि पूर्णिमा का चाँद अकेली गहरी रातों में चमकता है। मेरे इस जीवन,इस यौवन और मेरे संसार को तुम अपने गौरव से भर दोगी जैसे कोई रात रोशनी को पाकर चमक उठती है। उन एकाकी रातों में तुम्हारी उन करुणमयी आँखें का स्पर्श मुझे पुलकित करेगा। तुम्हारे आँचल की छाया मेरे सारे दुख, मेरी सारी वेदना को ढक लेगी। मेरे सपनों को तुम वैसे ही सुरभित करोगी जैसे कि कोई महकती हुई रात ।

जीवन में जरूरी नहीं कि हम उन्हीं से संबल प्राप्त करें जो हमारे साथ हों। दूर रहकर भी कुछ व्यक्तित्व मन में ऐसी छाप छोड़ देते हैं कि लगता ही नहीं कि वो हमसे कभी अलग हुए। ये गीत ऐसी ही कुछ भावनाएँ मन में छोड़ जाता है।

तो आइए सुनते हैं सबसे पहले इस गीत को इमोन चक्रवर्ती की आवाज़ में। 29 वर्षीय इस गायिका का नाम सुर्ख्रियों में तब गूँजा जब अपनी पहली ही फिल्म के लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का वर्ष 2017 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। हावड़ा जिले के छोटे से कस्बे में जन्मी इमोन इससे पहले टैगोर के लिखे गीतों को गाती रही हैं। उनकी आवाज़ में एक ठसक है, एक गहराई है जो इस गीत के हर शब्द और उसमें छुपे प्रेम और वेदना को एक साथ उभारती है।


यूँ तो इस गीत को हेमंत कुमार से लेकर शान तक ने आपनी आवाज़ दी है। पर ये सारे गायक बंगाल से ताल्लुक रखते हैं। पर इस फेरहिस्त में जब मैंने सनम पुरी का नाम देखा तो मैं अचंभित रह गया।  हँसी तो फँसी, गोरी तेरे प्यार में, हमशक्ल जैसी फिल्मों में कुछ गीत गुनगुनाने वाले सनम मुख्यतः अपने बैंड के लिए जाने जाते हैं जो नए पुराने गानों को एक अलग अंदाज़ में पिछले कुछ सालों से पेश करता रहा है। यू ट्यूब में सनम का चैनल लाखों लोगों द्वारा सुना जाता है। उन्होंने इस बांग्ला गीत को जिस तरह डूब कर गाया है, बांग्ला उच्चारण को हू बहू पकड़ा है वो निश्चय ही काबिलेतारीफ़ है।

Sunday, September 03, 2017

हसरत की वो 'हसरत' जो कभी पूरी नहीं हुई : तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी Teri Zulfon se Judai to...

सितंबर का महीना हसरत जयपुरी साहब की रुखसती का महीना है। करीब दो दशक गुजर गए उन्हें हमारा साथ छोड़े हुए। फिर भी रेडियो पर आज भी उनके गीतों की फ़रमाइशें  ख़त्म होने का नाम नहीं लेतीं। उनके गीतों को जब देखता हूँ तो मुझे लगता है कि वो आम आदमी के शायर थे जो दिल की बात बड़ी सीधी सी जुबान में कह देते थे। अब बरसात का मौसम है। नायिका को उनके आने का तकाज़ा है और हसरत की कलम चल उठती है कि जिया बेकरार है, आई बहार है आ जा मोरे साजना तेरा इंतजार है।  


इकबाल हुसैन के नाम से जन्मे हसरत, जयपुर के बाशिंदे थे। किशोरावस्था में अपने पहले प्रेम का शिकार हुए और यहीं से शायरी का कीड़ा उनके मन में कुलबुलाने लगा। उनकी पहली प्रेयसी राधा थीं जो बाजू वाले मकान के झरोखों से ताक झाँक करते हुए उनका दिल चुरा ले गयीं। उसी राधा की शान में हसरत साहब ने अपना पहला शेर कहा..

तू झरोखे से जो झांके तो मैं इतना पूछूँ
मेरे महबूब कि तुझे प्यार करूँ या ना करूँ

सन चालीस में जब वे मुंबई आए तो नौकरी की तलाश में बस कंडक्टर बन गए। पर इस उबाऊ सी नौकरी में भी उन्होंने रस ढूँढ ही लिया। ग्यारह रुपये माहवार की नौकरी में भी जब खूबसूरत नाज़नीनें उनकी बस में चढ़तीं तो वे उनके हुस्न से इतने प्रभावित हो जाते कि उनसे टिकट के पैसे माँगना भी उन्हें गवारा ना होता था। वो कहा करते कि वे सारी कन्याएँ उनके लिए प्रेरणा का काम करती थीं जिनकी शान में वो मुशायरों में अपने अशआर गढ़ते थे। ऐसी ही किसी मुशायरे में पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें देखा और फिर उनकी सिफारिश राज कपूर तक पहुँच गई। एक बार जब वो शंकर, जयकिशन, शैलेंद्र की चौकड़ी का हिस्सा बने तो उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।



अब प्यार तो हसरत ने किया पर उसके मुकम्मल होने की 'हसरत' रह ही गयी। पर राधा को वो कभी भूले नहीं। उनका सदाबहार गीत ये मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर के कि तुम नाराज ना होना कि तुम मेरी ज़िंदगी हो.. भी राधा को ही समर्पित था। उनका इस गीत के अंतरे में चाँद में दाग और सूरज में आग का हवाला देते हुए अपने महबूब को उनसे भी खूबसूरत बताने का अंदाज़ निराला था।

रोज़मर्रा के जीवन से गीत का मुखड़ा बना लेने  का हुनर भगवान ने उन्हें खूब बख्शा था। कहते हैं कि एक बार शंकर जयकिशन के साथ विदेश में उन्होंने एक महिला को बेहद चमकीली सी ड्रेस में देखा और उनके मुख से बेसाख़्ता  ये जुमला निकला कि बदन पे सितारे लपेटे  हुए ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो.. और फिर तो वो  गीत बना और इतना लोकप्रिय भी हुआ। ऐसे ही उनके बेटे के जन्म पर खुशी खुशी वो कह पड़े कि तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे चश्मेबद्दूर..। बाद में ये पंक्तियाँ  भी एक मशहूर गीत का मुखड़ा  बनीं।

आज उन्हीं हसरत जयपुरी साहब का एक गाना मुझे याद आ रहा है फिल्म जब प्यार किसी से होता है से जो 1961 में रिलीज़ हुई थी। निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन ने अपनी इस पहली फिल्म के सारे गाने रफ़ी और लता से गवाए  थे। फिल्म तो हिट हुई ही थी पर साथ ही इसके गाने जिया हो जिया हो जिया कुछ बोल दो, सौ साल पहले मुझसे तुमसे प्यार था और तेरी जुल्फों से ....... खासे लोकप्रिय हुए थे। 

इन गीतों में मुझे जो सबसे पसंद रहा वो था  तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी..। बड़ा प्यारा लगता था इसे गुनगुनाना। क़ैद के साथ रिहाई का जिक्र होते ही दिल में दर्द वाला तार ख़ुद ब खुद झंकृत हो जाता था और आँखो की छलकती मय वाले  शेर के तो क्या कहने! वैसे तो आपने इस गीत के तीन अशआर सुने होंगे पर एक चौथा भी शेर लिखा था हसरत साहब ने जो फिल्माया नहीं गया।

उन दिनों देव आनंद साहब काफी सजीले नौजवान हुआ करते थे। आशा पारिख जी के साथ उन पर ये गीत फिल्माया गया था। गीत की परिस्थिति कुछ यूँ थी कि एक महफिल सजी है जिसमें अपने साथ हुए धोखे को आशा पारिख एक छोटी सी नज़्म के सहारे नायक के दोहरे चरित्र पर तंज़ कसती हैं और फिर जवाब में देव साहब ये गीत गा उठते हैं। 

तो आइए शंकर जयकिशन की धुन और हसरत साहब की लेखनी के इस गठजोड़ को रफ़ी की आवाज़ में फिर याद कर लेते  हैं आज की इस शाम को...



इस हिरसो-हवस की दुनिया में
अरमान बदलते देखे हैं
धोख़ा है यहाँ, लालच है यहाँ
ईमान बदलते देखे हैं
दौलत के सुनहरे जादू से
ऐ दिल ये तड़पना अच्छा है
चाँदी के खनकते सिक्कों पर
इंसान बदलते देखे  हैं ....



तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी

मैंने क्या ज़ुल्म किया, आप खफ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था, खुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

मेरा हक़ था तेरी आँखों की छलकती मय पर
चीज़ अपनी थी, पराई तो नहीं माँगी थी

क़ैद माँगी थी...

अपने बीमार पे, इतना भी सितम ठीक नहीं
तेरी उल्फ़त में, बुराई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

चाहने वालों को कभी, तूने सितम भी ना दिया
तेरी महफ़िल से, रुसवाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

Thursday, August 10, 2017

चल चल सखि पिया के पास.. Chal Chal Sakhi

शंकर टकर मेरे पसंदीदा संगीतज्ञ हैं। अमेरिका से भारत आ कर बसने वाले इस क्लारिनेट वादक ने जिस तरह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को आत्मसात किया है उसकी विस्तृत चर्चा मैंने उनके एलबम श्रुति बॉक्स के रिलीज़ होते समय की थी। इंटरनेट पर अपने पहले एलबम की सफलता के बाद शंकर तीन साल अपने दूसरे एलबम के लिए काम करते रहे। 2015 में आख़िरकार उनका दूसरा एलबम निकला जिसे उन्होंने Filament के नाम से रिलीज़ किया।

Filament को The Shruti Box की तरह श्रोताओं का प्यार तो नहीं मिला पर इसकी कुछ रचनाएँ जैसे चल चल सखि.... और दिल है नमाज़ी.... काफी सराही गयीं। इस एलबम की मेरा पसंदीदा गीत भी चल चल सखि ही है। शंकर टकर की विशेषता है कि वो अपनी संगीतबद्ध रचनाओं में मँजे हुए कलाकारों के साथ नए उभरते गायकों को भी मौका देते हैं और इस शास्त्रीय बंदिश को निभाने के लिए उन्होंने पंडित जसराज की शिष्या रही अंकिता जोशी को चुना। अंकिता जसराज जी की शिष्या कैसे बनी ये जानना कम दिलचस्प नहीं है।


महाराष्ट्र के नांदेड़ से ताल्लुक रखने वाली अंकिता के परिवार में भक्ति संगीत गाने वालों का अच्छा खासा जमावड़ा था। संगीत की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने मामा लक्ष्मीकांत रामदेव से ली। इसी दौरान उन्होंने पंडित जी को सुना और उनकी गायिकी से वे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने ये निश्चय कर लिया कि अब उनकी ही शरण में जाकर अपनी सांगीतिक प्रतिभा को निखारना है। 

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि दस साल से भी छोटी उम्र में पंडित जसराज के कार्यक्रम को देखते हुए वे लोगों से बचते बचाते स्टेज तक पहुँची और उनसे सीधे जाकर कहा कि मुझे आपसे संगीत सीखना है। पंडित जी ने अंकिता से पूछा कि क्या तुम्हें गाना आता है? अंकिता ने तुरंत जवाब दिया कि उनका गायन सुन सुन कर ही उन्होंने संगीत सीखा है। पंडित जसराज जी ने फिर अंकिता को गवाया और उनकी प्रतिभा और सीखने के इस जज़्बे को देखते हुए अपना शिष्य बना ही लिया। आज अंकिता की गणना देश के उभरते हुए शास्त्रीय गायक के रूप में हो रही है। हालांकि अपनी इस संगीत यात्रा में उन्होंने शास्त्रीय संगीत के आलावा भक्ति संगीत, ग़ज़ल और फ्यूजन से भी परहेज़ नहीं किया है।

शंकर टकर की खासियत है कि शास्त्रीय संगीत के साथ उनका किया गया फ्यूजन उसकी आत्मा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करता। इसलिए उनके रचे एलबम्स को सुनना एक अलग अनुभव ही है। इन गीतों में क्लारिनेट से सँजोए उनके टुकड़ों को सुनना एक अतिरिक्त आनंद दे जाता है। छः मिनट के इस गीत में जब अंकिता अपनी लय में होती हैं तो संगीत मद्धम मद्धम बजता हुआ उनकी सधी हुई गायिकी को पूर्णता प्रदान करता है। तबले के साथ अंकिता की सरगम मन मोहती है।

निराली कार्तिक और पंडित लघुलाल की लिखी इस बंदिश को छोड़ता हुआ गीत ढाई मिनट के बाद एक अलग ही रंग में रँगता है जब अंकिता और शंकर अपने आलाप और वादन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। संगत में तबले पर अमित मिश्रा  का कमाल भी सुनते ही बनता है ।

राधा कृष्ण के प्रेम को उभारती इस बंदिश में राधा के मन में अपने पिया को देखने की विकलता भी है और साथ बिताए पलों की मधुर यादें भी। तो आइए सुनते हैं शास्त्रीय संगीत के साथ क्लारिनेट के इस निराले फ्यूजन को . .


चल चल सखि पिया के पास
मोरे मन में जल रही दरस की आस

जाओ चुनरी छोड़ो, मोरे नाजुक सी कलियाँ
काहे मटकी फोड़ो, जाओ जी बृज के बसियाँ

चल चल सखि पिया के पास.....दरस की आस

उन बिन मोहे कल नहीं आए
नटवर नटखट निपट निठुर तुम
नाच रयो री रास रचो री

बस मेरे अंग अंग रंग मेरे रंग रंग
नटवर नट खल निपट निठुर तुम
नाच रयो री रास रचो री




Sunday, July 23, 2017

कहाँ से आए बदरा..रोए मन है पगला Kahan Se Aaye Badra ...

मौसम सावन का  है। वर्षा की हल्की हल्की फुहारें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं और काले बादल मेरे शहर में यूँ खूँटा डाले हैं जैसे कह रहे हों कि कभी तो घर से निकलोगे? आज तो तर कर के ही छोड़ेंगे। इसी रिमझिम के बीच टहलते हुए रेडियो से एक सदाबहार नग्मा सुनाई दिया जिसे आख़िर तक सुनते हुए मन ग़मगीन सा हो गया। मैं सोचने लगा। इंसान की फितरत भी अजीब है। अपने आस पास के वातावरण को मूड के हिसाब से कुछ यूँ ढाल लेता है कि सावन, बदरा... जैसे बिंब जो कभी मन को उमंग से भर देते हैं वही हृदय में दर्द का सैलाब भी ले आते हैं।

मैं जिस गीत की बात आपसे कर रहा हूँ वो है अपने ज़माने की बेहद चर्चित फिल्म चश्मे बद्दूर का जो 1981 में बनी थी और खासी सफल भी हुई थी। । मैंने जब छुटपन में ये फिल्म देखी थी तो मिस चमको और तीन दोस्तों की आपरी तकरार के दृश्य ही बहुत दिनों तक मन में जमे रहे थे। इस फिल्म की पटकथा, निर्देशन व अभिनय को जितनी तवज़्जह मिली पर लोगों का उतना ध्यान इसके गीत संगीत रचनेवालों पर नहीं गया। अब संगीतकार राजकमल, गीतकार इंदु जैन और येसूदास का इस गीत में साथ निभाने वाली गायिका हेमंती शुक्ला के नाम तो आज की पीढ़ी के लिए अनसुने ही होंगे।

बतौर संगीतकार राजकमल ने फिल्म सावन को आने दो में अपने दो दशक तक फैले फिल्मी कैरियर का सबसे शानदार काम किया। तबले में प्रवीण राजकमल शास्त्रीय और लोक दोनों तरह के संगीत में समान रूप से पकड़ रखने के लिए जाने जाते थे। चश्मे बद्दूर में उन्होंने दो शास्त्रीय गीतों की रचना की। काली घोड़ी द्वार खड़ी.. और कहाँ से आए बदरा। कहाँ से आए बदरा.. राग मेघ पर आधारित गीत है जिसके लिए येसूदास के साथ राजकमल ने बंगाल की शास्त्रीय गायिका हेमंती शुक्ला की आवाज़ का इस्तेमाल किया।

येसूदास के साथ राजकमल ने जब जब काम किया परिणाम शानदार रहे। येसूदास ने उनके संगीतबद्ध हर नग्मे में आवाज़ की गहराई और खनक से गीत में प्राण फूँक दिए । ये गीत यूँ तो फिल्म में नायिका के अन्तरमन का द्वार खोल रहा है पर येसूदास की उपस्थिति ने इस गीत को लोकप्रियता की बुलंदियों तक पहुँचाया।

येसूदास, इंदु जैन, हेमंती शुक्ला व राजकमल
ये युगल गीत एक मनमोहक आलाप से शुरु होता है और फिर आती है मुखड़े के साथ घुँघरुओं और तबले की सुरीली संगत। गीत में प्रयुक्त इंटरल्यूड्स हों या अंतरे में बोलों के पीछे चलती हल्की बाँसुरी राजकमल के संगीत का जादू हर तरफ दिखाई देता है। रही बात शब्दों की तो इंदु जैन के लिखे शब्द इस गीत की जान हैं। 

आकाश में उमड़ते घुमड़ते काले बादल नायिका के व्यथित हृदय की पीड़ा को किस तरह अश्रुओं के सावन में तब्दील कर देते हैं इसी का संवेदनशील चित्रण किया है इंदु जी ने इस गीत में। उनके गीत में ठेठ हिंदी शब्दों को समावेश है जो कि एक कविता के रूप में बहते चले जाते हैं। इस गीत का उनका आखिरी अंतरा मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं जिसमें वो कहती हैं..उतरे मेघ हिया पर छाये ...निर्दय झोंके अगन बढ़ाये...बरसे है अँखियों से सावन...रोए मन है पगला...कहाँ से आये बदरा..

ये बड़े अफ़सोस की ही बात हे कि इतनी प्रतिभावान गीतकार होते हुए भी इंदु जैन का फिल्मी कैरियर सई परांजपे की फिल्मों कथा, स्पर्श और चश्मे बद्दूर में ही सिमट कर रह गया। हिंदी फिल्म संगीत में भले ही उन्होंने एक छोटी पारी खेली हो पर साहित्य के क्षेत्र में इंदु जी ने बतौर कवयित्री कुछ न कुछ टकराएगा जरूर, कितनी अवधि, आसपास राग, यहाँ कुछ हुआ तो था, चूमो एक लहर है कविता, हवा की मोहताज क्यों रहूँ जैसे कई कविता संग्रह के ज़रिए अपना महती योगदान दिया। दूरदर्शन और रेडियो से भी वो जीवन पर्यन्त जुड़ी रहीं। 72 वर्ष की आयु में सन 2008 में उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया।

तो आइए सुनें येसूदास और हेमंती की आवाज़ में ये गीत..

कहाँ से आए बदरा हो..
घुलता जाए कजरा
कहाँ से आए बदरा ...

पलकों के सतरंगे दीपक
बन बैठे आँसू की झालर
मोती का अनमोलक हीरा
मिट्टी में जा फिसला

कहाँ से आए बदरा हो..घुलता जाए कजरा
कहाँ से आए बदरा ...

नींद पिया के संग सिधारी
सपनों की सूखी फुलवारी
अमृत होठों तक आते ही
जैसे विष में बदला

कहाँ से आए बदरा हो..
घुलता जाए कजरा
कहाँ से आए बदरा ...

उतरे मेघ हिया पर छाये
निर्दय झोंके अगन बढ़ाये
बरसे है अँखियों से सावन
रोए मन है पगला
कहाँ से आये बदरा..

Friday, July 07, 2017

शाम: दो मनःस्थितियाँ - धर्मवीर भारती Shaam : Do Manahsthitiyan by Dharamvir Bharati

धर्मवीर भारती को किशोरावस्था तक अपनी प्रिय पत्रिका धर्मयुग का संपादक भर जानता रहा। गुनाहों का देवता और सूरज का सातवाँ घोड़ा तो बहुत बाद में ही पढ़ा। सूरज का सातवाँ घोड़ा पढ़ते हुए ही उनकी एक खूबसूरत कविता से भी रूबरू हुआ जो इसी नाम की एक फिल्म में गीत बन कर भी उभरी। गीत के बोल थे ये शामें सब की सब शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं.. 

शाम का पहर बड़ा अजीब सा है। दोस्तों का साथ रहे तो कितना जीवंत हो उठता है और अकेले हों तो कब अनायास ही मन में उदासी के बादल एकदम से छितरा जाएँ पता ही नहीं चलता। फिर तो हवा के झोकों के साथ अतीत की स्मृतियाँ मन को गीला करती ही रहती हैं। धर्मवीर भारती को भी लगता है शाम से बड़ा लगाव था। पर जब जब उन्होंने दिन के सबसे खूबसूरत पहर पर कविताएँ लिखीं उनमें ज़िंदगी से खोए लोगों का ही पता मिला। उनके ना होने की तड़प मिली।


अब भारती जी की इसी कविता को लीजिए मायूसी के इस माहौल में डूबी शाम में वो उम्मीद कर रहे हैं एक ऐसे अजनबी की जो शायद जीवन को नई दिशा दे जाए। पर वक़्त के साथ उनकी ये आस भी आस ही रह जाती है। अजनबी तो नहीं आते पर किसी के साथ बिताए वे पल की यादें पीड़ा बन कर रह रह उभरती है। 

कविता की अंतिम पंक्तियों में भारती जी जीवन का अमिट सत्य बयान कर जाते हैं। जीवन में कई लोग आते हैं जिनसे हमारा मन का रिश्ता जुड़ जाता है। उनके साथ बीता वक़्त मन को तृप्त कर जाता है। पर यही लगाव, प्रेम उनके जुदा होने से दिल में नासूर की तरह उभरता है। हमें विचलित कर देता है। शायद शाम के समय जब हम अपने सबसे ज्यादा करीब होते हैं हमारा दिल अपने बंद किवाड़ खोलता है और भारती  जी जैसा कवि हृदय तब कुछ ऐसा महसूस करता है...

 (1)

शाम है, मैं उदास हूँ शायद
अजनबी लोग अभी कुछ आएँ
देखिए अनछुए हुए सम्पुट
कौन मोती सहेजकर लाएँ
कौन जाने कि लौटती बेला
कौन-से तार कहाँ छू जाए!

बात कुछ और छेड़िए तब तक
हो दवा ताकि बेकली की भी
द्वार कुछ बन्द, कुछ खुला रखिए
ताकि आहट मिले गली की भी!

देखिए आज कौन आता है
कौन-सी बात नयी कह जाए
या कि बाहर से लौट जाता है
देहरी पर निशान रह जाए
देखिए ये लहर डुबोये, या
सिर्फ़ तटरेख छू के बह जाए!

कूल पर कुछ प्रवाल छूट जाएँ
या लहर सिर्फ़ फेनवाली हो
अधखिले फूल-सी विनत अंजुली
कौन जाने कि सिर्फ़ खाली हो?




(2)

वक़्त अब बीत गया बादल भी
क्या उदास रंग ले आए
देखिए कुछ हुई है आहट-सी
कौन है? तुम? चलो भले आए!

अजनबी लौट चुके द्वारे से
दर्द फिर लौटकर चले आए
क्या अजब है पुकारिए जितना
अजनबी कौन भला आता है
एक है दर्द वही अपना है
लौट हर बार चला आता है!

अनखिले गीत सब उसी के हैं
अनकही बात भी उसी की है
अनउगे दिन सब उसी के हैं
अनहुई रात भी उसी की है
जीत पहले-पहल मिली थी जो
आखिरी मात भी उसी की है!

एक-सा स्वाद छोड़ जाती है
ज़िन्दगी तृप्त भी व प्यासी भी
लोग आए गए बराबर हैं
शाम गहरा गई, उदासी भी! 


सम्पुट : दोनों हथेलियों को मिलाने और टेढ़ा करने से बना हुआ गड्ढा जिसमें भरकर कुछ दिया या लिया जाता है, प्रवाल : कोरल, कूल : किनारा


तो आइए सुनिए इस कविता के भावों तक पहुँचने की मेरी एक कोशिश..
 

Thursday, June 22, 2017

मैकदे बंद करे लाख ज़माने वाले.. शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले Maikade Band Kare

बाहर बारिश की झमाझम है और मन भी थोड़ा रिमझिम सा हो रहा है तो सोच रहा हूँ कि क्यूँ ना आज आपको हरिहरण साहब की गायी वो हल्की फुल्की पर बेहद मधुर ग़ज़ल सुनाऊँ जिसके कुछ अशआर कुछ दिनों से मन में तरलता सी घोल रहे हैं।


हरिहरण ने ये ग़ज़ल अपने एलबम काश में वर्ष 2000 में रिकार्ड की थी। 'काश' उस समय तक के हरिहरण के एलबमों से थोड़ी भिन्नता लिए जरूर था। सामान्यतः हरिहरण ग़ज़लों में हमेशा से अपनी शास्त्रीयता के लिए जाने जाते रहे हैं। ग़ज़ल में परंपरागत रूप से इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रों जैसे हारमोनियम, सारंगी और तबले के साथ हरिहरण का आलाप आपने भी कई ग़ज़लों में सुना होगा। पर जगजीत सिंह की तरह ही वक़्त के साथ उन्होंने भी कई एलबमों में नए नए प्रयोग करने की कोशिश की। जनवरी 1999 से इस एलबम की तैयारी शुरु हुई पर इसे बनने में पूरा एक साल लग गया। बकौल हरिहरण

"मुझे इस एलबम को पूरा रिकार्ड करने में इतना समय इसलिए लगा क्यूँकि इन ग़ज़लों को मैं उस आवाज़ व संगीत के साथ पेश करना चाहता था जो वर्षों से मेरे मन में रच बस रही थी। आप इसे आज के प्रचलित वाद्यों के साथ कविता और ठेठ गायिकी का मिश्रण मान सकते हैं।"

हरिहरण ने अपने इस प्रयोग को तब Urdu Blues की संज्ञा दी थी। अब ये एलबम उस वक़्त सराहा तो गया था पर इतना भी नहीं कि इसे हरिहरण के सर्वोत्तम एलबमों में आँका जा सके। इसका एक कारण हरिहरण की चुनी हुई कुछ ग़ज़लों में शब्दों की गहराई का ना होना भी था।

ख़ैर एलबम की कुछ पसंदीदा ग़ज़लों में एक थी मैकदे बंद करे लाख जमाने वाले. जिसे मैं आज आपको सुनवाने जा रहा  हूँ। गिटार और बांसुरी के साथ उस्ताद रईस खान का सितार मन को तब चंचल कर देता है जब  ग़ज़ल के मतले में हरिहरण की आवाज़ कुछ ये कहती सुनाई पड़ती है

मैकदे बंद करे लाख ज़माने  वाले
शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले

सच ही तो है , जिसने भी हुस्न और  शोखियों का स्वाद उनकी आँखों के पैमाने से पिया है उसे भला मयखाने जाने की क्या जरूरत?

मतले के बाद का शेर  सुनकर तो बस आह ही उभरती है, कोई पुरानी कसक याद दिला ही जाता है ये नामुराद शेर

काश मुझको भी लगा ले तू कभी सीने से
मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाले

ग़ज़ल का अगला शेर सुनने के पहले आप घटम और सितार की मधुर जुगलबंदी सुन सकते हैं। वैसे इस एलबम में ड्रम्स या घटम जैसे ताल वाद्यों को बजाया  था मशहूर ड्रमर शिवमणि ने ।

हम यकीं आप के वादे पे भला कैसे करें
आप हरगिज़ नहीं हैं वादा निभाने वाले

इस ग़ज़ल को किसने लिखा ये ठीक ठीक पता कर पाना मुश्किल है। कुछ लोग इसे ताज भोपाली की ग़ज़ल बताते हैं। पर हरिहरण साहब ने एक जगह जरूर ये कहा था कि मैंने इस एलबम में ताहिर फ़राज़, मुन्नवर मासूम, मुजफ्फर वारसी, वाली असी, कैफ़ भोपाली, शहरयार और क़ैसर उल जाफ़री की ग़ज़लें ली थीं। अब इनमें से जिन जनाब की भी ये ग़ज़ल हो आख़िरी शेर में सादी जुबां में ज़िदगी की एक हकीक़त ये कह कर बयाँ की है कि

अपने ऐबों पर नज़र जिनकी नहीं होती है
आईना उनको दिखाते हैं ज़माने वाले

तो आइए इस बरसाती मौसम में आप भी मेरे साथ इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाइए...

Sunday, June 11, 2017

अम्बर की एक पाक सुराही : आख़िर क्यूँ था कुफ्र चाँदनी का घूँट पीना? Amber Ki Ek Paak Surahi

कुछ गीत बेहद गूढ़ होते हैं। जल्दी समझ नहीं आते। फिर भी उनकी धुन, उनके शब्दों में कुछ ऐसा होता है कि वो बेहद अच्छे लगते हैं।  जब जब चाँद और चाँदनी को लेकर कुछ लिखने का मन हुआ मेरे ज़हन में अमृता प्रीतम की लिखी हुई ये पंक्तियाँ सबसे पहले आती रहीं अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठा कर, घूंट चाँदनी पी है हमने। सन 1975 में आई फिल्म कादंबरी  के इस गीत का मुखड़ा अपने लाजवाब रूपकों और मधुर धुन की वज़ह से हमेशा मेरा प्रिय रहा। पर इस गीत से मेरा नाता इन शब्दों के साथ साथ रुक सा जाता था क्यूँकि मुझे ये समझ नहीं आता था कि  आसमान की सुराही से मेंघों के प्याले में चाँदनी भर उसे चखने का इतना खूबसूरत ख़्याल आख़िर कुफ्र यानि पाप कैसे हो सकता है? तब मुझे ना इस बात की जानकारी थी कि कादम्बरी अमृता जी के उपन्यास धरती सागर और सीपियाँ पर आधारित है और ना ही मैंने कादम्बरी फिल्म देखी थी।

कुछ दिनों पहले इस किताब का अंश हाथ लगा तो पता चला कि किताब में ये गीत कविता की शक़्ल में था और कविता के शब्द कुछ यूँ थे..

अम्बर की एक पाक सुराही,
बादल का एक जाम उठा कर
घूँट चाँदनी पी है हमने

हमने आज यह दुनिया बेची
और एक दिन खरीद के लाए
बात कुफ़्र की की है हमने

सपनो का एक थान बुना था
गज एक कपडा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी है हमने

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएं
माँग के अपनी मौत के हाथों
यह जो ज़िन्दगी ली है हमने

कुफ्र की बात यहाँ भी थी। यानि ऐसा पाप जिसे ऊपरवाला करने की इजाज़त नहीं देता। कविता को गीत में पिरोते हुए अमृता ने काफी परिवर्तन किए थे पर मूल भाव वही था। गीतों के बोलों के इस रहस्य को समझने के लिए फिल्म देखी और तब अमृता के बोलों की गहराई तक पहुँचने का रास्ता मिल पाया...


फिल्म का मुख्य किरदार चेतना का है जो बालपन से अपने साथी अमित के प्रेम में गिरफ्तार हो जाती है। अमित भी चेतना को चाहता है पर उसके माथे पर नाजायज़ औलाद का एक तमगा लगा है। वो सोचता है कि उसकी माँ ने उसके लिए जो दुख सहे हैं उनकी भरपाई वो बिना पत्नी और माँ में अपना प्रेम विभाजित किए हुए ही कर सकता है। चेतना अमित के निर्णय को स्वीकार कर  लेती है पर उसे लगता है कि उसका अस्तित्व अमित की छाया के बिना अधूरा है। वो अमित के साथ नहीं रह सकती तो क्या हुआ वो उसके अंश के साथ तो जीवन जी ही सकती है। इसके लिए वो अपने मन के साथ ही अपना तन भी हिचकते नायक को न्योछावर कर देती है। चेतना के लिए ये अर्पण चाँदनी के घूँट को पी लेना जैसा निर्मल है पर समाज के संस्कारों के पैमाने में तो एक कुफ्र ही है ना। इसलिए अमृता गीत के मुखड़े में लिखती हैं..

अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठा कर
घूंट चाँदनी पी है हमने, बात कुफ़्र की, की है हमने

पर ये मिलन जिस नए बीज को जन्म देगा उसके लिए समाज के तंज़ तो चेतना को जीवन पर्यन्त सुनने को मिलेंगे। शायद यही कर्ज है या जीवन भर की फाँस जिसमें लटकते हुए अपने प्रेम की पवित्रता की गवाही देनी है उसे

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएँ,
मांग के अपनी मौत के हाथों
उम्र की सूली सी है हमने,
बात कुफ़्र की, की है हमने
अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठा कर...

अमृता की नायिका दूसरे अंतरे मे दार्शनिकता का लबादा ओढ़ लेती हैं और कहती है कि प्यार तो जिससे होना है होकर ही रहता है। हम लाख चाहें हमारा वश कब चलता है अपने मन पर? जिस दिन से मैंने इस संसार में कदम रखा है उसी दिन से ये दिल उस की अमानत हो चुका था। फिर मैंने तो बस उसका सामान उसे सौंपा भर है। अगर चाँदनी जैसे शीतल व  स्निग्ध प्रेम का रसपान करना जुर्म है तो हुआ करे।

अपना इसमे कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है
रोज़-ए-अज़ल से उसकी अमानत,
उसको वही तो दी है हमने,
बात कुफ़्र की, की है हमने
अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठा कर..


इस प्यारे से गीत का संगीत संयोजन किया था मशहूर सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ साहब ने। अपने पूरे जीवन में उन्होंने तीन बार ही फिल्मों में संगीत संयोजन किया। कादंबरी में दिया उनका संगीत हिन्दी फिल्मों के लिए पहला और आख़िरी था। इसके पहले वे सत्यजीत रे की फिल्म जलसा घर और अंग्रेजी फिल्म गुरु के लिए संगीत दे चुके थे।

गीत सुनते वक़्त विलायत खाँ साहब के मुखड़े के पहले के संगीत संयोजन पर जरूर ध्यान दीजिएगा। संतूर से गीत की शुरुआत होती है और फिर गिटार के साथ सितार के समावेश के बीच आशा जी की मधुर आवाज़ में आलाप उभरता है। इंटरल्यूड में गिटार का साथ बाँसुरी देती है।  इस गीत से जुड़े सारे वादक अपने अपने क्षेत्र के दिग्गज रहे हैं। संतूर बाँसुरी पर शिव हरि की जोड़ी तो गिटार पर खूद भूपेंद्र और इन सब के बीच आशा जी की खनकती बेमिसाल आवाज़ सोने में सुहागा का काम करती है।

वैसे चलते चलते आपको एक और रिकार्डिंग भी दिखा दी जाए जिसमें  यही गीत जी टीवी के सारेगामा कार्यक्रम में सोनू निगम जजों के समक्ष गाते हुए दिख जाएँगे।

Wednesday, May 31, 2017

खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...बूँदों को धरती पर साज एक बजाने दे Khul Ke Muskura Le Tu

कई बार आप सब ने गौर किया होगा। रोजमर्रा की जिंदगी भले ही कितने तनावों से गुज़र रही हो, किसी से हँसी खुशी दो बातें कर लेने से मन हल्का हो जाता है। थोड़ी सी मुस्कुराहट मन में छाए अवसाद को कुछ देर के लिए ही सही, दूर भगा तो डालती ही है। पर दिक्कत तब होती है जब ऐसे क्षणों में आप बिलकुल अकेले होते हैं। बात करें तो किससे , मुस्कुराहट लाएँ तो कैसे ?

पर सच मानिए अगर ऍसे हालात से आप सचमुच गुजरते हैं तो भी किसी का साथ हर वक़्त आपके साथ रहता है। बस अपनी दिल की अँधेरी कोठरी से बाहर झाँकने भर की जरूरत है। जी हाँ, मेरा इशारा आपके चारों ओर फैली उस प्रकृति की ओर है जिसमें विधाता ने जीवन के सारे रंग समाहित किए हैं।

चाहे वो फुदकती चिड़िया का आपके बगीचे में बड़े करीने से दाना चुनना हो...

या फिर बाग की वो तितली जो फूलों के आस पास इस तरह मँडरा रही हो मानो कह रही हो..अरे अब तो पूरी तरह खिलो, नया बसंत आने को है और अभी तक तुम अपनी पंखुड़ियां सिकोड़े बैठे हो ?


या वो सनसनाती हवा जिसका स्पर्श एक सिहरन के साथ मीठी गुदगुदी का अहसास आपके मन में भर रहा हो....


या फिर झील का स्थिर जल जो हृदय में गंभीरता ला रहा हो...


या उफनती नदी की शोखी जो मन में शरारत भर रही हो..


या बारिश की बूदें जो पुरानी यादों को फिर से गीला कर रहीं हों...

हम जितने तरह के भावों से अपनी जिंदगी में डूबते उतराते हैं, सब के सब तो हैं इस प्रकृति में किसी ना किसी रूप में...मतलब ये कि अपने आस पास की फ़िज़ा को जितना ही महसूस करेंगे, अपने दर्द, अपने अकेलेपन को उतना ही दूर छिटकता पाएँगे।

कुछ ऍसी ही बातें प्रसून जोशी ने अपने इस गीत में करनी चाही हैं  फिल्म फिर मिलेंगे से लिया गया है। ये एक ऐसे युवती की कहानी है जिसे अचानक पता चलता है कि वो AIDS वॉयरस से संक्रमित है। प्रसून की लेखनी इस गीत में उसके इर्द गिर्द की ढहती दुनिया के बीच उजाले की किरण तलाशने निकलती है। मुझे हमेशा जानने का मन करता था कि इस गीत को लिखते हुए प्रसून के मन में क्या भाव रहे होगे। मुझे अपनी जिज्ञासा का उत्तर उनकी किताब धूप के सिक्के पढ़ते वक़्त मिला जहाँ उन्होंने इस गीत के बारे में लिखा..
"दुख और दर्द तो प्रकट हैं, पर मैं उन्हें उम्मीद के समक्ष बौना दिखाना चाहता था। यह ऐसा नहीं था कि कोई निराशा के अँधेरों में हो और उसे बलपूर्वक सूरज की रोशनी के सामने खड़ा कर दिया जाए। यहाँ भाव था हौले से मनाने का। यह कहने का कि देखो वह झरोखे से आती धूप की किरणें कितनी सुंदर दिखती हैंन? यह वैसे ही था कि आप दर्द से गुजर रहे व्यक्ति के गले में हाथ डालकर, धीरे से पूरी संवेदनशीलता के साथ उन छोटी छोटी मगर खूबसूरत बातों की ओर उसका ध्यान ले चलें, जिसे देख उसके मन में उम्मीद को गले लगाने की चाह जागे।"

मुझे ये गीत बेहद बेहद पसंद है और  प्रसून के काव्यात्मक गीतों में ये मुझे सबसे बेहतरीन लगता है। इसे बड़ी संवेदनशीलता से गाया है बाम्बे जयश्री ने और इसकी धुन बनाई  है शंकर एहसान और लॉ॓ए ने जो कमाल की है।




खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे
बूँदों को धरती पर साज एक बजाने दे
हवाएँ कह रही हैं आजा झूमें ज़रा
गगन के गाल को चल, जा के छू लें ज़रा

झील एक आदत है तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है, तेरे संग बहती है
उतार ग़म के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में, गुदगुदी मचाने दे
खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...


बाँसुरी की खिड़कियों पे सुर ये  क्यूँ ठिठकते हैं
आँख के समंदर क्यूँ बेवजह छलकते हैं
तितलियाँ ये कहती हैं अब वसंत आने दे
जंगलों के मौसम को बस्तियों में छाने दे
खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे...

खूबसूरत बोल और बेहतरीन संगीत के इस संगम को कभी फुर्सत के क्षणों में सुनें, आशा है ये गीत आपको भी पसंद आएगा।

Monday, May 22, 2017

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में.. आइए सुनें नूर साहब की पूरी ग़ज़ल Aag Hai, Pani Hai, Mitti Hai, Hawa Hai Mujh Mein . by Krishna Bihari Noor

बहुत सारी पसंदीदा ग़ज़लें होती हैं जिनके तीन चार अशआर डॉयरी के पन्नों पर नोट कर हम उन्हें पूरा मान लेते हैं। बरसों वहीं अशआर हमारे ज़हन में रह रह कर उठते और पलते रहते हैं। ऐसे में जब उसी ग़ज़ल के चंद और अशआर अचानक से सामने आ जाते हैं तो लगता है कि बैठे बिठाए कोई सौगात मिल गयी हो। लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले शायर  कृष्ण बिहारी नूर की इस मशहूर ग़ज़ल के पाँच शेर बरसों से मेरे पास थे पर कल उनसे जुड़ी एक किताब पढ़ते हुए ग़ज़ल के चंद शेर और हाथ लगे तो सोचा आप तक उनकी ये पूरी कृति पहुँचा दूँ।



इस ग़ज़ल से जुड़े एक किस्से का जिक्र कन्हैयालाल नंदन जी ने अपने एक आलेख में किया है। तब नंदन जी मुंबई में पत्र पत्रकारिता से जुड़े काम के सिलसिले में पदस्थापित थे। नूर साहब एक मुशायरे के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे और नवी मुंबई के वासी में ठहरे थे जो कि मुख्य शहर से काफी दूर का इलाका है। उन्होंने नंदन जी को फोन कर कहा कि वो उनसे मिलना चाहते हैं। कन्हैयालाल नंदन को यही लगा कि इतनी दूर से ख़ुद फोन कर मिलने की बात कर रहा है तो जरूर इसे मुझसे कोई काम होगा। पर डेढ़ घंटे बाद जब नूर हाज़िर हुए तो उनसे उनके आने का उद्देश्य जान कर नंदन आश्चर्यचकित रह गए। नूर साहब का कहना था कि बस एक नई ग़ज़ल लिखी है वही आप जैसे संवेदनशील श्रोता को सुनाना चाहता था। वो ग़जल यही ग़ज़ल थी जिसका जिक्र मैंने आज आपसे छेड़ा है।

तो चलिए देखते हैं कि आख़िर क्या कहना चाहा था कृष्ण बिहारी नूर ने अपनी इस ग़ज़ल में...

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ये शरीर प्रकृति के पंच तत्वों से निर्मित है और भगवान का वास हर जगह है। यानि अपने अंदर भी अगर हम पवित्र मन से झांकें तो वहाँ परमात्मा जरूर दिखेंगे। कृष्ण बिहारी नूर ने इस सोच को अपने मतले में ढालते हुए लिखा कि

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में


नूर साहब की ये विशेषता थी कि वो अपनी शायरी में सूफ़ियत के साथ मोहब्बत का रंग बड़े सलीके  से घोला करते थे। अब अगले शेर में वो परमपिता या अपने महबूब से मुख़ातिब हैं इसका फैसला तो आप ही कीजिए। पर जो भी है इस मोहब्बत का आलम ये है कि इसने उन्हें  अपने आप से जुदा कर दिया है। अब तो उसका इख्तियार उनके ज़हन पर हो गया है 

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में
मुझको मुझसे अलग करके छुपा है मुझ में


ऐसे अगर आपको चाहने वाला आपकी हर छोटी छोटी बात को आत्मसात करते हुए आपके अंतर्मन को टटोलने की कोशिश करने लगे तो फिर अपने हाल के बारे में आप भी कह उठेंगे कि 

मेरा ये हाल उघड़ती हुई परतें जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूँढ रहा है मुझ में


ये तो मुझे पूरी ग़ज़ल में सबसे कमाल का शेर लगता है। कितनी तरह के अच्छे बुरे अहसासों, विराधाभासों से दिल जूझता रहता है। ठीक मौसम की बदलती रंगत की तरह। ये अहसास कभी सुकून के पल ले आते हैं तो कभी बेहिसाब बेचैनी। इन बदलती भावनाओं के बीच दिल की फ़िज़ा जो रंग बिखेरती है उन्हें शब्दों में बयाँ करना आसान है क्या?

जितने मौसम हैं वो सब जैसे कहीं मिल जाएँ
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में


आप मेरे करीब भी नहीं आएँ, दूर से ही मेरे बारे में कोई राय बना लें तो इसमें मेरा क्या कुसूर? मेरे सच्चे दिल की पुकार और व्यक्तित्व की चमक को महसूस करने के लिए आपको मेरे संग कुछ वक़्त तो ज़ाया करना ही पड़ेगा।

वो ही महसूस करेगा जो मुख़ातिब होगा
ऐसे अनदेखे उजाले की सदा है मुझमें


मैंने तो सोचा था कि उनकी नज़दीकियाँ पूरे जिस्म में एक ख़ुमारी सी ले आती हैं। पर मैं नहीं जानता था कि उनके लिए मेरा प्रेम एक नशा नहीं जो चढ़ के उतर जाएगा। वो तो मेरे शरीर के हर कोने में दौड़ते लहू की भांति मेरी नस नस में है जो  मेरी साँस थमने से ही रुकेगा।

नशा-ए-मय की तरह समझा था क़ुरबत उसकी
वो तो मानिंद ए लहू दौड़ रहा है मुझमें


आईने की भी अपनी सीमाएँ हैं। वो बस आपका बाहरी रूप रंग ही दिखा पाता है। आपके अंदर का अक़्स उसकी पहुँच से कोसों दूर है।

आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में

टोंक देता है, कदम जब भी ग़लत उठता है
ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर'
मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझ में


ये तो थे ग़ज़ल के पूरे शेर। नूर साहब की आवाज़ में जब ये ग़ज़ल नहीं मिली तो मैंने सोचा क्यूँ ना इसे अपनी आवाज़ में ही रिकार्ड कर लूँ। तो ये रही नूर साहब की भावनाओं तक अपनी आवाज़ से पहुँचने की मेरी कोशिश।

Sunday, May 07, 2017

मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया .. है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया

नब्बे के दशक में हरिहरण फिल्म संगीत और ग़ज़ल गायिकी में एक सितारे की तरह चमके थे। इस दौरान उनकी ग़ज़लों के कई एलबम आए  जिनमें से एक था 1992 में रिलीज़ हुआ हाज़िर। इस एलबम की पहली ग़ज़ल (जो सबसे लोकप्रिय हुई थी) का मतला कुछ यूँ था मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया ..है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया

ये उन दिनों की बात थी जब इंजीनियरिंग कॉलेज के चार साल पूरे होने आए थे और इश्क़ था कि हमारी ज़िदगानी से मुँह छुपाए घूम रहा था। ऐसे में इस ग़ज़ल के मतले को मन ही मन मैं कुछ यूँ गुनगुनाने को मज़बूर हो गया था।
मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, किया किया ना किया
है तो ये रोज़ का लफड़ा, लिया लिया ना लिया 😁


सच तो ये था कि उन दिनों भी कहकशाँ व गालिब जैसे जगजीत के एलबमों का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोल रहा था। हरिहरण की गायिकी लुभाती तो थी पर जगजीत की आवाज़ का मैं कुछ ज्यादा ही मुरीद था। उस वक्त दूरदर्शन पर भी नियमित रूप से हरिहरण के कार्यक्रम आया करते थे। मुझे याद है कि ऐसे ही एक महफिल में उन्होंने एक प्यारे से गीत को अपनी आवाज़ दी थी जिसके बोल थे मेरी साँसों में बसी है, तेरे दामन की महक, जैसे फूलों में उतर आई हो उपवन की महक। कभी इस गीत की रिकार्डिंग हाँ लगी तो जरूर आपसे साझा करूँगा।

प्रियंका बार्वे
तो फिर अचानक ही इतने सालों बाद मुझे हरिहरण की याद कहाँ से आ गयी। हुआ यूँ कि कुछ दिनों पहले मराठी फिल्मों की प्रतिभावान गायिका प्रियंका बार्वे की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनने को मिल गयी। प्रियंका ने बिना किसी संगीत के शुरुआत के तीन अशआर गा कर मन में मिठास सी घोल दी। सच तो ये है कि कुछ ग़ज़लें बिना संगीत के आभूषण के सुनी जाएँ तो ज्यादा आनंद देती हैं और मेरे ख़्याल से ये एक ऐसी ही ग़ज़ल है।


पुणे के संगीतज्ञों के परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्रियंका ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपनी दादी मालती पांडे बार्वे से ली। फिलहाल प्रियंका का इरादा गायिकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में उतरने का भी है। पिछले साल वे फिरोज़ खान द्वारा निर्देशित नाटक मुगल ए आज़म में अनारकली के रूप में नज़र आयीं। प्रियंका की इस प्रस्तुति को सुन कर ऐसा लगा कि उन्हें मराठी के आलावा हिंदी फिल्मों और ग़ज़लों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरना चाहिए।

इस ग़ज़ल को लिखा है ब्रिटेन में रहने वाले उर्दू के नामचीन शायर डा. सफ़ी हसन ने। आपको जान कर अचरज होगा कि पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले और फिलहाल बर्मिंघम में बसे सफ़ी साहब पेशे से एक वैज्ञानिक हैं। कितना खूबसूरत मतला लिखा था सफ़ी साहब ने। जिसे इश्क़ का रोग लग गया उसकी तो हर साँस ही गिरवी हो जाती है। फिर उसका जीना क्या और मरना क्या?

मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया
है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया 

सफ़ी साहब आगे फर्माते हैं कि अगर दर्द से पूरा शरीर ही छलनी हो तो दिल को रफ़ू कर के कौन सी ठंडक मिलने वाली है?

बदन ही आज अगर तार-तार है मेरा
तो एक चाक-ए-ग़रेबाँ, सिया सिया ना सिया

और इसकी तो बात ही क्या ! पसंदीदा शेर है मेरा इस ग़ज़ल का। जनाब सफ़ी हसन यहाँ कहते हैं की भले ही उनका नाम मेरे होठों पर नहीं आया पर क्या कभी उन्हें अपने ख्यालों से दूर  कर पाया हूँ?

ये और बात के तू हर रह-ए-ख़याल मे है
कि तेरा नाम जुबाँ से, लिया लिया ना लिया

मेरे ही नाम पे आया है जाम महफ़िल मे
ये और बात के मै ने, पिया पिया ना पिया

ये हाल-ए-दिल है 'सफ़ी' मैं तो सोचता ही नही
कि क्यों किसी ने सहारा, दिया दिया ना दिया

वैसे चलते चलते हरिहरण की आवाज़ में पूरी ग़ज़ल भी सुनते जाइए। तबले पे हरिहरण जी का साथ दे रहे हैं मशहूर वादक ज़ाकिर हुसैन ।

Friday, April 28, 2017

विनोद खन्ना : वे पाँच नग्मे जो मुझे उनकी सदा याद दिलाएँगे.. Vinod Khanna 1946 -2017

विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं रहे। सोशल मीडिया पर कुछ हफ्ते पहले उनकी बीमारी की हालत में ली गयी तस्वीर उनके चाहने वालों को गहरा धक्का दे गयी थी। लोगों के मन में हमेशा उनके बाँके छबीले नौजवान हीरो की छवि तैरती रही भले ही उन्होंने उम्र  के इस पड़ाव में चरित्र अभिनेता का चोला पहन लिया था। उन पर फिल्माए कुछ गीत हमेशा किसी ना किसी वज़ह से मुझे याद रहे। आज उन्हीं चंद गीतों के माध्यम से उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियाँ ताजा करना चाहता हूँ।



उस वक्त सारी फिल्में मैं अपने परिवार के साथ सिनेमा हॉल में देखा करता था। विनोद खन्ना की फिल्मों की बात करूँ तो बचपन में मैंने  मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथोनी और कुर्बानी देखी थी। यानि तब तक विलेन से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले विनोद देश के चहेते हीरो बन चुके थे।

उस दौर में जब अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, शत्रुघ्न व संजीव कुमार जैसे नायकों का बोलबाला था, आकर्षक कद काठी पर मीठी सी मुस्कुराहट लिए  विनोद बिल्कुल अलग से दिखते थे। मुकद्दर का सिकंदर और अमर अकबर एंथोनी में तो अमिताभ इस क़दर छाए रहे कि विनोद का किरदार मेरी स्मृतियों में स्थायी रूप ना ले सका। पर कुर्बानी में फिरोज खान के साथ उनका रोल खासा लोकप्रिय हुआ। कुबुक कुबुक और तुझपे कुरबाँ मेरी जान से ज्यादा जो गीत लंबे समय तक यादों में शामिल रहा वो था जीनत अमान के साथ विनोद खन्ना पर फिल्माया नग्मा। जिसके बोल कुछ यूँ थे हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे.. अगर आपने इसे सुना भी हो तो मनहर उधास की आवाज़ में इसे फिर सुन लीजिए..


विनोद खन्ना के कैरियर के इस दौर में बहुत सारी  फिल्में हिट हुयीं पर  उनमें ज़्यादातर में एक से ज्यादा हीरो थे। ये वो दौर था जब उन्हें उतनी सही कहानियाँ नहीं मिल पायीं जिसके वो हक़दार थे। फिर भी गुलज़ार ने उन्हें जो  मौके मेरे अपने (1971), अचानक (1973) और मीरा  (1979) में दिए, उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया। फिल्म मेरे अपने में  किशोर दा का गाया  गीत जिसे विनोद जी ने अभिनीत किया था, बरसों मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के एकाकी दिनों का साथी रहा

कोई होता जिसको अपना
हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर भी होता
लेकिन कोई मेरा अपना



अपने कैरियर के चढ़ाव पर ओशो की शरण में संन्यास लेकर विनोद खन्ना ने अपने प्रशंसकों को चौंका दिया था। मेरे पिता भी ओशो से खासे प्रभावित थे और उनकी लगभग हर किताब उनकी अलमारी की शोभा  बढ़ाया करती थी। इसलिए अख़बार में जब भी विनोद के संन्यासी जीवन की ख़बरें आतीं मैं उन्हें चाव से पढ़ता।अमेरिका जाने के पहले उन्होंने गुलज़ार की फिल्म मीरा की थी। गुलज़ार से वो तब कहा करते थे कि मेरा तो मन मीरा का किरदार निभाने को करता है क्यूँकि मैं उसकी भक्ति को अपने भगवान से जोड़ कर देख सकता हूँ। ये उनकी अगाध श्रद्धा का ही परिचायक था कि उन्होंने ओशो के आश्रम में माली से लेकर टॉयलट साफ करने तक के काम किए। वो वापस क्यूँ लौटे ये तो कहना मुश्किल है। क्या गुरु से उनका मोह भंग हुआ या फिर आर्थिक परेशानियाँ इस पर तो अब क़यास ही लगाए जा सकते हैं।

पाँच साल के इस  लंबे इंटरवल के बाद फिर बतौर नायक फिल्मों में आने लगे। 1989 में उन्होंने ॠषि कपूर व श्रीदेवी  के साथ फिल्म चाँदनी में एक प्यारा सा किरदार निभाया और उन पर फिल्माया ये नग्मा बरसों बेवज़ह आँखें नम करता रहा। बारिश की छनछनाहट के बीच सुरेश वाडकर की डूबती आवाज़..मन तब गुम हो जाता था इस गीत में

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है




कॉलेज के ज़माने में जितना समय किशोर, जगजीत और गुलज़ार को सुनने में लगाया उतना पढ़ने में भी लगाया हो इस पर विश्वास तो नहीं होता। शायद लगाया भी हो...पढ़ाई तो भूल भी गयी पर जो वक़्त इनके साथ गुजरा वो हमेशा हमेशा के लिए दिल पे नक़्श हो गया।

अपनी दूसरी पारी में गुलज़ार निर्देशित सिर्फ एक फिल्म की वो थी लेकिन। उस दौर के अभिनेताओं में संजीव कुमार मेरी पहली पसंद थे। देखने वाली बात है कि गुलज़ार ने संजीव कुमार के साथ तो काफी काम किया ही, विनोद को भी कम मौके नहीं दिये। विनोद खन्ना में अपने अन्तर्मन को तलाश करने का जो भाव रहा उसे गुलज़ार ने बारहा टटोलने की कोशिश की।  गुलज़ार ने विनोद के अभिनय का वो स्वरूप उभारा जिनसे उनके चाहने वाले अनजान ही रहे हैं। फिल्म लेकिन में ही एक गीत था सुरमयी शाम इस तरह आए साँस लेते हैं जिस तरह साए। सुरेश वाडकर का गाया गीत मेरे लिए क्यूँ खास रहा है उसके बारे में यहाँ मैने लिखा है। गीत का वीडियो यू ट्यूब पर तो है पर शेयर करने के लिए उपलब्ध नहीं है। आज विनोद जी की यादों में इस गीत को  भी  शामिल कीजिएगा।

कोई आहट नहीं बदन की कोई
फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं
वक़्त जाता सुनाई देता है
तेरा साया दिखाई देता है
जैसे खुशबू नज़र से छू जाए
साँस लेते हैं जिस तरह साए


जगजीत की आवाज़ और गुलज़ार के बोलों के साथ सिनेमा के रुपहले पर्दे पर विनोद खन्ना 2002 में फिल्म लीला में नज़र आए । इस फिल्म के तमाम नग्मे शानदार थे पर कल अचानक उनके चले जाने से उस गीत की ये पंक्तियाँ बार बार मन को गीला कर रही थीं..

जाग के काटी सारी रैना
नैनों में कल ओस गिरी थी

क्या पता था कि उनका हँसता मुस्कुराता चेहरा यूँ अचानक ही दृष्टिपटल से ओझल हो जाएगा।



बिंदास, खुशमिजाज़, दोस्तों की कद्र और हमेशा मदद करने वाले विनोद खन्ना को ये दुनिया एक छैल छबीले हीरो के रूप में हमेशा याद रखेगी। विनोद खन्ना से जुड़ी आपकी भी कुछ व्यक्तिगत यादे हैं तो जरूर बाँटें..

Sunday, April 23, 2017

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए : सचिन दा व मजरूह की जुगलबंदी का कमाल Chand Phir Nikla

1957 में एस डी बर्मन साहब की तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। प्यासा, पेइंग गेस्ट और नौ दौ ग्यारह। हिट तो ये तीनों फिल्में रहीं। पर इनमें गुरुदत्त की प्यासा हर लिहाज़ से अलहदा फिल्म थी। फिल्म का संगीत भी उतना ही चला। फिल्म के गीतकार थे साहिर लुधियानवी। अक्सर जब गीतकार संगीतकार मिलकर इस तरह की सफल फिल्में देते हैं तो उनकी जोड़ी और पुख्ता हो जाती है  पर सचिन दा की उसी साल रिलीज़ फिल्मों में साहिर का नाम नदारद था और उनकी जगह ले ली थी मजरूह सुल्तानपुरी ने।

सचिन दा और साहिर की अनबन की पीछे उनके अहम का टकराव था। साहिर को एक बार ओ पी नैयर ने एक फिल्मी पार्टी में ये कहते सुना था कि मैंने ही सचिन दा को बनाया है। ज़ाहिर है साहिर के मन में ये बात रही होगी कि गीतकार के रूप में उनका योगदान संगीतकार से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि प्यासा के निर्माण के दौरान वे अपना पारिश्रमिक सचिन दा से एक रुपये ज्यादा रखने पर अड़े रहे। शायद उनके इस रवैये से सचिन दा खुश नहीं थे।

सचिन दा की मजरूह के साथ आत्मीयता थी। इसलिए जब पेइंग गेस्ट में गीतकार को चुनने का वक़्त आया तो उन्होंने मजरूह को बुला लिया। सचिन दा मजरूह को मुजरू कह कर बुलाते थे। चाय, काफी और पान के साथ दोनों की घंटों सिटिंग चलती। सचिन दा धुन रचते और बोलों से धुन का तालमेल बिठाते। कभी कभी तो एक ही गीत के लिए दस या बीस धुनें बनती। ये सिलसिला तब तक चलता जब तक सचिन दा खुद संतुष्ट नहीं हो जाते। अगर कहीं दिक्कत होती तो मुजरू को बोल बदलने को कहते।


पेइंग गेस्ट के लिए सचिन दा ने एक बेहद मधुर धुन  बनाई थी जिस पर मजरूह ने मुखड़ा दिया था चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए। विरह की भावना से ओतप्रोत इस गीत में जिस तरह मजरूह ने चाँद जैसे बिम्ब का प्रयोग किया था वो इस गीत को अनुपम बना देता है।

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए
जला फिर मेरा दिल, करुँ क्या मैं हाय
चाँद फिर निकला …


पर मुझे इस गीत की सबसे दिल को छूती पंक्ति वो लगती है जब मजरूह पहले अंतरे में कहते हैं

ये रात कहती है वो दिन गये तेरे
ये जानता है दिल के तुम नहीं मेरे

खड़ी मैं हूँ फिर भी निगाहें बिछाये
मैं क्या करूँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


रात के साथ दिन के इस सहज मेल से अच्छे दिन चले जाने का जो भाव पैदा किया मजरूह ने उसका जवाब नहीं।
 
सुलगते सीने से धुँआ सा उठता है
लो अब चले आओ के दम घुटता हैं
जला गये तन को बहारों के साये
मैं क्या करुँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


मजरूह अपने साक्षात्कारों में अक्सर कहा करते थे कि सचिन दा को ज्यादा साज़ और साज़िंद पसंद नहीं थे। वे  अक्सर कोशिश करते कि कम से कम वाद्य यंत्रों से काम चलाया जाए। शंकर जयकिशन से उलट आर्केस्ट्रा के प्रयोग से वो दूर रहना पसंद करते थे। सचिन दा का मानना था कि गाने पर अगर ज्यादा  जेवर चढ़ेगा तो गाना तो फिर दिखेगा ही नहीं। प्रील्यूड व इंटरल्यूड्स को छोड़ दें तो इस गीत में लता की आवाज़ के साथ घटम के आलावा कोई ध्वनि नहीं आती। पर मजरूह के बोल और सचिन दा की मेलोडी इतनी जबरदस्त थी कि वहाँ  संगीत का आभाव ज़रा भी नहीं खटकता। यही वजह है कि ये गीत छः दशकों बाद भी हम सबके दिलों पर अपनी गिरफ्त बनाए हुए है।

फिल्म में देव आनंद की प्रतीक्षा करती नूतन के गीत को भावों को अपनी भाव भंगिमा से जोड़ा है कि लता की आवाज़ का दर्द पर्दे पर भी बखूबी उभर आता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..
 

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