सोमवार, मार्च 30, 2009

' एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए अपने तीन साल !

पिछले हफ्ते एक शाम मेरे नाम के हिंदी संस्करण ने अपने तीन साल पूरे कर लिये। वैसे जब ब्लागिंग के बारे में मुझे आज से चार साल पहले पता चला तब हिंदी का टंकण ज्ञान नहीं था पर ये विधा मुझे इतनी अच्छी लगी कि मैंने रोमन में ही हिंदी लिखकर अपना पहला ब्लॉग अप्रैल २००५ में बनाया । फिर साथियों द्वारा दिये तकनीकी ज्ञान से मार्च २००६ के आखिर में अपने इस हिंदी चिट्ठे की शुरुआत भी कर दी। हाँ ये जरूर है कि जितना रोमांच इस चिट्ठे की पहली वर्षगाँठ मनाने का था उतना उसके बाद नहीं रहा। शायद पहले के बाद दसवीं वर्षगांठ ही वो रोमांचक अनुभव रहे।



पिछले तीन सालों में जिन विषयों को मैंने अपने लेखन का विषय बनाया था, उनमें से एक सफ़रनामा अब मेरे नए यात्रा चिट्ठे मुसाफ़िर हूँ यारों पर चला गया है। विषय की एकरूपता को ध्यान में रखते हुए अब इस चिट्ठे पर सिर्फ गीत ग़ज़ल, कविताओं, किताबों की बातें ही हुआ करेंगी। अब तक के लेखन में मेरी ये कोशिश रही हे कि जिस विषय पर लिखूँ उसे इस तरह आपके सामने पेश करूँ जिससे उस विषय पर मेरे नज़रिए के आलावा कुछ नई जानकारी आप तक पहुँचे। इस में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ ये तो आप ही बता सकते हैं। वैसे आंकड़ों की बात करूँ तो इस साल नई बात ये हुई कि इस जनवरी में इस चिट्ठे ने एक लाख पेजलोड्स का मुकाम पूरा किया । पिछले तीन सालों में इस चिट्ठे पर ३२० पोस्ट लिखी गई हैं और उन पर अब तक १११७६२ पेज लोड्स यानि प्रति पोस्ट ३५० की औसत से पढ़ी गई है।

ये आँकड़ा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि ये हम चिट्ठाकारों को इंगित करता है कि एग्रीगेटर की नज़रों से गुजरने के बाद विषय वस्तु के आधार पर कितने लोग उस पोस्ट तक पहुँचे। इस चिट्ठे के चौथे साल में इस औसत को बरकरार रख पाया या इसमें वृद्धि कर पाया तो अपना प्रयास सार्थक समझूँगा।

पाठकों की सुविधा के लिए एक जगह लिंक सहित गीतों , ग़जलों, कविताओं की लिंकित सूची तो बना ही दी थी। अब इस क्रम में पुस्तकों, चिट्ठाकारी और अपने अन्य लेखों की सूची बनाने और पुरानी सूचियाँ अपडेट करने का काम चलता रहेगा। इस चिट्ठे को ई-मेल से प्राप्त करने वाले पाठकों मुझे मेल के द्वारा अपने सुझाव या प्रतिक्रियाएँ भेज सकते हैं। आशा है चौथे साल में भी आपका स्नेह और आशीर्वाद इस चिट्ठे के साथ बना रहेगा।

गुरुवार, मार्च 26, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 सरताज गीत : इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला !

आज उपस्थित हूँ वार्षिक संगीतमाला 2008 के सरताज गीत को लेकर। अपनी वार्षिक संगीतमालाओं में मैंने अक्सर उन्हीं गीतों को सरताज गीत का सेहरा पहनाया है जिन्होंने मुझे बुरी तरह उद्वेलित किया है, जिनके प्रभाव से मैं जल्द मुक्त नहीं हो पाया हूँ। इस गीत की आरंभिक धुन मैंने मुंबई त्रासदी के तुरंत बाद NDTV India पर सुनी थी। शुरुआत की धुन में बजता पियानो का टनटनाता स्वर जहाँ हमारी असहायता पर भारी चोट कर रहा था वहीं बाकी का संगीत आँखों को नम करने के लिए काफी था। इस गीत की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस गीत ने सारे देश के लोगों को NDTV के द्वारा चलाए गई मुहिम से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

पर जब आप इस पूरे गीत को सुनते हैं तो उन तमाम लोगों की तसवीर उभरती है जो वक़्त के क्रूर हाथों अपनी हँसती खेलती जिंदगी को अनायास ही खो कर ऐसे शून्य में विलीन हो गए जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता।


'आमिर' फिल्म में ये गीत निर्दोष आमिर के आतंकवादियों के जाल में फँसने के बाद बम विस्फोट में उसकी असमय मृत्यु के बाद बजता है। आखिर क्या चाहता है एक आम आदमी अपनी जिंदगी से..एक ऍसा समाज जहाँ ना कोई नफ़रत की लकीरे हों और ना ही इंसान को इंसान से बाँटती सरहदें। इसीलिए गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य इन भावनाओं को अपने शब्द देते हुए लिखते हैं...

धूप के उजाले से ओस के प्याले से
खुशियाँ मिले हमको
ज्यादा माँगा है कहाँ , सरहदें ना हो जहाँ
दुनिया मिले हमको
पर ख़ुदा खैर कऱ उसके अरमां में
क्यूँ बेवज़ह हो कोई कुर्बां
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हां
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला

ये एक ऍसा प्रश्न है जो हर ऍसी त्रासदी के बाद हमारे दिल के जख़्मों को और हरा कर देता है और जब तक घृणा और नफ़रत फैलाने वाले लोगों को हम अपने समाज से बाहर नहीं कर पाएँगे तब तक ये प्रश्न हमारे लिए अनुत्तरित ही बना रहेगा।

जैसा कि आपको पहले भी बता चुका हूँ कि आमिर फिल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी ने और इस गीत को गाया है शिल्पा राव ने। दरअसल आमिर फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए अमित त्रिवेदी के नाम की सिफारिश शिल्पा राव ने ही की थी। इस साल शिल्पा राव का गाया सबसे लोकप्रिय गीत ख़ुदा जाने.. ही रहा है पर इससे पहले उनका गया वो अजनबी..भी चर्चित हुआ था।



शिल्पा राव एक छोटे से शहर से उपजी कलाकार हैं। और अगर मैं ये कहूँ कि वो शहर मेरे राज्य में स्थित है तो शायद ये तथ्य आप में से कइयों को चौका दे। शिल्पा जमशेदपुर से ताल्लुक रखती हैं और संगीत की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने संगीतज्ञ पिता से ली। शुरुआती दौर में वो छोटे मोटे स्टेज शो किया करती थीं। ऍसी ही एक शो में उनकी मुलाकात शंकर महादेवन से हुई। शंकर के प्रोत्साहन से उन्होंने मुंबई का रुख किया और अब अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित कर रही हैं...

तो चलिए सुनते हैं आमिर फिल्म का ये दिलछूता नग्मा....


इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
गर्दिशों में रहती बहती गुजरती
जिंदगियाँ हैं कितनी
इन में से इक है, तेरी मेरी अगली
कोई इक जैसी अपनी
पर ख़ुदा खैर कर, ऍसा अंजाम किसी रुह को ना दे कभी यहाँ
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हाँ
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला

धूप के उजाले से ओस के प्याले से
खुशियाँ मिले हमको
ज्यादा माँगा है कहाँ , सरहदें ना हो जहाँ
दुनिया मिले हमको
पर ख़ुदा खैर कऱ उसके अरमां में
क्यूँ बेवज़ह हो कोई कुर्बां
गुनचा मुस्कुराता एक वक़्त से पहले
क्यूँ छोड़ चला तेरा ये ज़हां
इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला
इक लौ जिंदगी की मौला




वार्षिक संगीतमाला के समापन के साथ उन सभी पाठकों का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जो इस लंबे सफ़र में साथ बने रहे।

सोमवार, मार्च 23, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 पुनरावलोकन : कौन रहा आपका पिछले साल का सर्वाधिक प्रिय गीत ?

वार्षिक संगीतमाला २००८ में बचा है सिर्फ शिखर पर बैठा सरताज गीत। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा की जाए एक नज़र संगीतमाला के इस संस्करण की बाकी पॉयदानों पर। बतौर संगीतकार ए आर रहमान ने इस साल की संगीतमाला पर अपनी बादशाहत कायम रखी है। जोधा अकबर, युवराज, जाने तू या जाने ना, गज़नी की बदौलत इस संगीतमाला में उनके गीत दस बार बजे। रहमान के आलावा इस साल के अन्य सफल संगीतकारों में विशाल शेखर, सलीम सुलेमान और अमित त्रिवेदी का नाम लिया जा सकता है।

इस साल की संगीतमाला में अमिताभ वर्मा, जयदीप साहनी, अशोक मिश्रा, इरफ़ान सिद्दकी, मयूर सूरी, कौसर मुनीर,अब्बास टॉयरवाला और अन्विता दत्त गुप्तन जैसे नए गीतकारों ने पहली बार अपनी जगह बनाई। इतने सारे प्रतिभाशाली गीतकारों का उभरना फिल्म संगीत के लिए शुभ संकेत है।

वहीं गायक गायिकाओं में विजय प्रकाश, जावेद अली, राशिद अली, श्रीनिवास और शिल्पा राव जैसे नामों ने पहली बार संगीत प्रेमी जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

तो आइए चलें इस साल की वार्षिक संगीतमाला के पुनरावलोकन पर..


वार्षिक संगीतमाला 2008 पुनरावलोकन:


इस श्रृंखला का समापन होगा अगली पोस्ट में सरताज गीत के साथ। पर मैं अपनी पसंद के उस गीत के बारे में बताने से पहले जानना चाहूँगा कि कौन रहा आपका पिछले साल का सर्वाधिक प्रिय गीत ?

गुरुवार, मार्च 19, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 रनर्स अप - कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....

वार्षिक संगीतमाला का ये पिछले ढाई महिने का सफ़र तय कर के आ गए हैं हम वर्ष 2008 के दूसरे नंबर के गीत पर। और ये गीत है फिल्म जोधा अकबर से जिसके संगीत को आस चिट्ठे की साइडबार पर कराई गई वोटिंग में साल के सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए सबसे ज्यादा वोट मिले हैं। जावेद अली का गाया, जावेद अख्तर का लिखा और अल्लाह रक्खा रहमान का संगीतबद्ध ये गीत संगीत, बोलों और गायिकी तीनों ही दृष्टिकोणों से ग़ज़ब का प्रभाव डालता है।


वैसे तो जावेद अख्तर साहब को इस साल का फिल्मफेयर एवार्ड इसी फिल्म के एक और खूबसूरत नग्मे इन लमहों के दामन के लिए मिला है पर इस गीत के बोल भी कमाल के हैं। इस गीत में उन्होंने अकबर और जोधा के बीच के प्रेम और शादी की परिस्थितियों से पैदा तनाव को उभारा है वो गीत की हर पंक्ति में सहज ही महसूस किया जा सकता है।

जिंदगी में मनचाहा हमसफ़र अगर साथ हो तो खुशियाँ कभी बेहद नज़दीक सी महसूस होती हैं। पर उन खुशियों को दिल तक पहुँचने के लिए अपने बीच की अहम की दीवार को गिराना पड़ता है। पूर्वाग्रह मुक्त होना पड़ता है। कई बार हम ये सब जानते बूझते भी अपने को इस दायरे से बाहर नहीं निकाल पाते। और फिर मन मायूसी के दौर से गुज़रने लगता है।

देखिए इन भावनाओं से गुँथे जावेद के शब्दों को जावेद अली ने किस खूबसूरती से अदा किया है और पीछे से रहमान का बहता निर्मल संगीत दिल को गीत में रमने में मजबूर कर देता है।

और अगर जावेद अली आपके लिए नए नाम हों तो उनके बारे में इसी साल की संगीतमाला की ये पोस्ट देखिए....



कहने को जश्न-ऐ-बहारा है
इश्क यह देख के हैरां है
फूल से खुशबू ख़फा ख़फा है गुलशन में
छुपा है कोई रंज फ़िज़ा की चिलमन में
सारे सहमे नज़ारें हैं
सोये सोये वक़्त के धारे हैं
और दिल में खोई खोई सी बातें हैं

कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....
कैसे कहें क्या है सितम
सोचते हैं अब यह हम
कोई कैसे कहे वो हैं या नहीं हमारे
करते तो हैं साथ सफर
फासले हैं फिर भी मगर
जैसे मिलते नहीं किसी दरिया के दो किनारे
पास हैं फिर भी पास नहीं
हमको यह गम रास नहीं
शीशे की इक दीवार है जैसे दरमियां
सारे सहमे नज़ारें हैं.....

कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....
हमने जो था नगमा सुना
दिल ने था उसको चुना
यह दास्तान हमें वक़्त ने कैसी सुनाई
हम जो अगर है गमगीन
वो भी उधर खुश तो नहीं
मुलाकातों में है जैसे घुल सी गई तन्हाई

मिल के भी हम मिलते नहीं
खिल के भी गुल खिलते नहीं
आँखों में है बहारें दिल में खिज़ा
सारे सहमे नज़ारे हैं
सोये सोये वक़्त के धारे हैं......


कहने को जश्न-ऐ-बहारा है....

और

सोमवार, मार्च 16, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 3 : सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है, अब तो प्रजातंत्र है...

वार्षिक संगीतमाला में अब बची है आखिरी की तीन पॉयदान। तीसरी पॉयदान पर गीत वो जिसे आपके सुनने की संभावना कम ही होगी क्यूंकि इस गीत की चर्चा हिंदी चिट्ठा जगत में अब तक तो नहीं हुई है। नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। अब जब की लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो गई है अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया की नज़र इस गीत पर जाए तो इसका इस चुनावी मौसम में अच्छा इस्तेमाल हो सकता है।

नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। दरअसल इस तरह के गीत हिंदी फिल्मों में बेहद कम नज़र आते हैं जबकि आज के सामाजिक राजनीतिक हालातों में ऍसे कई गीतों की जरूरत है जो साठ सालों से चल रहे इस लोकतंत्र के बावजूद पैदा हुई विसंगतियों को रेखांकित कर सकें। पर ऍसे गीत तभी लिखे जाएँगे जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाई जाएँगी।

इस गीत को लिखा है अशोक मिश्रा ने। अशोक मिश्रा को इस तरह के गीत की रचना करने का मौका दिया निर्देशक श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर में ! गीतकार ने गीत के दोनों अंतरे में जो बातें कहीं है वो आज के राजनीतिक हालातों का सच्चा आईना हैं। चाहे वो सत्ता की कभी ना मरने वाली भूख हो या फिर नोटों के बल पर वोटों की ताकत को प्रभावशून्य करने की बात।

संगीतकार शान्तनु मोइत्रा ने लोक धुन का स्वरूप अपनाते हुए इस समूह गान के मुख्य स्वर में कैलाश खेर को चुना जो कि शत प्रतिशत सही और प्रभावी चुनाव रहा। कुल मिलाकर कैलाश की गूंजती आवाज़, प्रभावी बोल और गीत के अनुरूप बनाई गई प्यारी धुन ने इस गीत को वार्षिक संगीतमाला की पहली तीन पॉयदानों में ला खड़ा किया है। तो आइए इस गीत के माध्यम से याद करें प्रजातंत्र के मूल तत्त्वों को और अपने वोट की अहमियत को पहचानते हुए मतदान का संकल्प लें।


आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है

जन के लिए, जन के द्वारा जनता का राज है
प्रजातंत्र सबसे बड़ा, हम सबको नाज़ है
वोट छोटा सा मगर शक्ति में अनंत है
अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

खिल रही थी कली कली, महके थी हर गली
आप कभी साँप हुए, हम हो गए छिपकली
सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

अरे जिसकी लाठी उसकी भैंस आपने बना दिया
हे नोट की खन खन सुना के वोट को गूँगा किया
पार्टी फंड, यज्ञ कुंड घोटाला मंत्र है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है

शुक्रवार, मार्च 13, 2009

दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल : दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है

पिछले साल दिसंबर के पुस्तक मेले में दुष्यंत कुमार जी के बेहद प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह साये में धूप खरीदने का मौका मिला था। अब पुस्तक तो ले ली पर जैसा कि प्रायः होता है पढ़ने का वक़्त नहीं मिला। होली के पूर्व जब अचानक राउरकेला जाना पड़ा तो रास्ते में दुष्यंत जी कई ग़ज़लें पढ़ीं। वैसे तो पूरी पुस्तक ही नायाब ग़ज़लों से अटी पड़ी है पर आज आप सब के साथ उनकी व्यंग्यात्मक लहजे में लिखी गई ये ग़ज़ल बाँटना चाहता हूँ जो हिंदी में ग़ज़ल लेखन का एक उत्कृष्ट नमूना है।

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है


इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है


पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है


दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है


निश्चय ही ये ग़ज़ल हमारे और आपके आसपास के सामाजिक और राजनीतिक हालातों की प्रतिध्वनि करती दिखती है। कितने सहज शब्द और सच्चाई की ओट से चलते ऍसे तीखे व्यंग्य बाण कि मन बस वाह वाह कर उठता है।
इस चिट्ठे पर प्रस्तुत कविताओं की सूची आप यहाँ देख सकते हैं।

सोमवार, मार्च 09, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 4 : अमित त्रिवेदी के साथ कीजिए डींग डाँग डाँग, डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग

भाइयों और बहनों होली की इस पूर्व संध्या भी एक ऍसे सुखद संयोग पर आई है जब मेरी इस संगीतमाला का सबसे मस्तमौला गीत आपको झूमने झुमाने या यों कहिए कि आपको घुमाने के लिए तैयार है। दरअसल इस साल मेरे घर पर जब-जब आमिर फिल्म का ये गीत बजा है मेरे पाँव खुद बा खुद थिरक गए हैं जबकि मुझे नाचना बिल्कुल नहीं आता :)। अगर मैं ये कहूँ कि इस साल के सारे गीतों में सबसे ज्यादा जिस गीत पर मेरे परिवार के सारे सदस्य आनंदित हुए हैं तो ये वही गीत है।

गीतकार अमिताभ ने गीत में लफ्ज़ों का यूँ चुनाव किया है कि उसमें लोकगीतों का सा ठेठपन बरकरार रहे। दरअसल फिल्म की कहानी में ये गीत बैकग्राउंड में आता है जब नायक की जिंदगी की गाड़ी अचानक पटरी से उतर जाती है और वो इस चक्रव्यूह के दलदल में धँसता चला जाता है। अब देखिए अमिताभ का कमाल.. इस परिस्थिति को गली मोहल्ले की भाषा में कैसे व्यक्त करते हैं

अरे चलते चलते हाए हाए
हल्लू हल्लू दाएँ बाएँ हो
अरे देखो आएँ बाएँ साएँ
जिंदगी की झाँए झाँए हो
अरे निकले थे कहाँ को
और किधर को आए
कि चक्कर घुमिओ..



दूसरी ओर संगीतकार अमित त्रिवेदी ने राजस्थानी लोक धुन के साथ ताल वाद्यों का इतना बेहतरीन संयोजन किया है कि हर इंटरल्यूड में खुद झूमने के साथ औरों को भी झुमाने का मन करता है। अमित ने खुद इस गीत को अपनी आवाज़ दी है। आमिर फिल्म के इस गीत में अमित और अमिताभ की इस जोड़ी की प्रयोगधर्मिता की जितनी तारीफ की जाए कम होगी।

पर ये जोड़ी क्या अचानक ही हिंदी फिल्म संगीत के पर्दे पर उभर कर आ गई? नहीं ये अमित के दस वर्षों के कठिन संघर्ष का फल है जिसने फिल्म आमिर और अब डेव डी के माध्यम से उन्हें अपनी पहचान बनाने का मौका दिया है।

यूँ तो १५ वर्ष की उम्र से ही अमित को संगीत के प्रति रुचि बढ़ गई थी, पर उनका ये प्रेम तब मूर्त रूप ले सका जब कॉलेज से निकलने के बाद उन्होंने ओम नामक संगीत बैंड बनाया। १९‍ - २० साल की उम्र से ही अमित ने टीवी सीरियल, नाटकों आदि के लिए पार्श्व संगीत देने से लेकर विज्ञापन की धुनें बनाई और यहाँ तक कि डांडिया शो के आर्केस्ट्रा में भी काम किया। टाइम्स म्यूजिक ने इस समूह की प्रतिभा को पहचाना और अमित त्रिवेदी का पहला एलबम बाजार में आया। पर ठीक से प्रचार और प्रमोशन ना होने की वज़हों से उनलका ये प्रयास लोगों की नज़रों में नहीं आ पाया। खैर इनकी मित्र और नवोदित गायिका शिल्पा राव की सिफारिश से इन्हें अनुराग कश्यप ने डेव डी के लि॓ए अनुबंधित किया पर उसका काम बीच में ही रुक गया पर अनुराग ने तब इन्हें आमिर दिलवा दी और इस पहली फिल्म में ही उन्होंने अपनी हुनर का लोहा सनसे मनवा लिया।

अब होली के इस माहौल में इस गीत से आपकी दूरी और नहीं बढ़ाऊँगा। बस प्लेयर आन कीजिए, अपनी चिंताओं को दूर झटकिए और बस घूमिए और झूमिए।


डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग
डींग डाँग डाँग
डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग
डींग डाँग डाँग

अरे चलते चलते हाए हाए
हल्लू हल्लू दाएँ बाएँ हो
अरे देखो आएँ बाएँ साएँ
जिंदगी की झाँए झाँए हो
अरे निकले थे कहाँ को
और किधर को आए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना
कोई समझाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
अरे घुमियो रे, हाए घुमियो, रे घुमियो चक्कर घुमियो
हाए हाए घुमियो रे घुमियो घुमियो रे घुमियो चक्कर घुमियो

ले कूटी किस्मत की फूटी मटकी

रे फूटी....
दौड़न लागी तो चिटकी
खेल कबड्डी लागा
खेल कबड्डी लागा
भूल के दुनियादारी यारा खेल कबड्डी लागा
नींद खुली तो जागा
नींद खुली जो हाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना
कोई समझाए कि चक्कर घुमियो
अरे घुमियो रे हाए घुमियो, रे घुमियो चक्कर घुमियो
हाए हाए घुमियो घुमियो घुमियो घुमियो चक्कर घुमियो
डींग डाँग डाँग डींग डाँग डाँग टिड़िंग टिंग

चिकोटी वक़्त ने काटी ऐसी चिकोटी
खुन्नस में तेरी सटकी
छींक मारे लागा, छींक मारे लागा
झाड़ा सच को धूल उड़ी तो
छींक मारे लागा
नींद खुली तो जागा
नींद खुली जो हाए
कि चक्कर घुमियो
कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर कि चक्कर
पल्ले कुछ पड़े ना...............




आशा है होली की मस्ती के साथ इस गीत ने भी आप सबको आनंदित किया होगा। एक शाम मेरे नाम के तमाम पाठकों को होली की ढ़े सारी शुकानाएँ !

शुक्रवार, मार्च 06, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 5 - विजय प्रकाश की मन मोहती शास्त्रीय प्रस्तुति लट उलझी सुलझा जा बालम...

इस साल की संगीतमाला अब अपने अंतिम चरण में पहुँच गई है। आखिरी पाँच पायदानों पर विराजमान गीतों में काफी विविधता है । कहीं मेलोडी की बहार है तो कहीं दिल को झकझोर देने वाले शब्द। कहीं नुक्कड़ गीतों की झलक है तो कही लोक संगीत और आज के संगीत का अद्भुत मिश्रण है।


पर पाँचवी पॉयदान का गीत तो इन सबसे अलग है। राग भीमपलासी पर आधारित इस गीत को संगीतकार ए आर रहमान ने सिंथिसाइजर की पार्श्व धुन के साथ मिश्रित किया है। इस गीत की धुन और गायक विजय प्रकाश का उत्कृष्ट शास्त्रीय गायन आपको गीत के साथ बहा ले जाता है। गीत की एकमात्र कमज़ोरी इसकी लंबाई है जो केवल 3 मिनट ग्यारह सेकेंड की है। जैसे ही इस गीत से अपने को आत्मसात पाता हूँ ये गीत खत्म हो जाता है। काश! रहमान गुलज़ार के लिखे इस गीत में एक अंतरा और बढ़वा लेते तो सोने पर सुहागा होता।


पर इससे पहले कि आप युवराज फिल्म के इस गीत को सुनें कुछ बातें गायक विजय प्रकाश के बारे में। विजय प्रकाश कर्नाटक से आते हैं और जी टीवी पर आने वाले कार्यक्रम सा रे गा मा की उपज है। १९९९ में सा रे गा मा प्रतियोगिता में ये फाइनल तक पहुँचे थे। अपनी आवाज़ की गुणवत्ता के हिसाब से विजय को उतने गीत नहीं मिले जितने मिलने चाहिए थे पर इस गीत की सफलता के बाद शायद हिंदी फिल्म जगत में उनका सितारा और बुलंद हो। वैसे एक बात बतानी यहाँ लाजिमी होगी की स्लमडॉग मिलयनियर के गीत के लिए रहमान ने जिन चार गायकों को अनुबंधित किया था उनमें विजय प्रकाश एक थे। हालांकि अंत में सुखविंदर ने इस गीत को गाया पर गीत में हाई पिच पर जय हो का उद्घोष विजय ने किया है।

गीत तूम तनना... के आकर्षित करने वाले लूप से शुरु होता है और फिर विजय अपनी शास्त्रीय गायन का हुनर बखूबी दिखाते हैं। ऍसे गीतों में बोल सुरों के उतार चढ़ाव के लिए सिर्फ सेतु का काम करते हैं...




लट उलझी सुलझा जा बालम
माथे की बिंदिया
बिखर गई है
अपने हाथ सजा जा बालम
लट उलझी
मनमोहिनी
मनमोहिनी मोरे मन भाए..
मनमोहिनी मन भाए..




वार्षिक संगीतमाला 2008 में अब तक :

मंगलवार, मार्च 03, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 6 - कुछ कम रौशन है रोशनी..कुछ कम गीली हैं बारिशें

वार्षिक संगीतमाला 2008 में लग गया था बेक्र जिस वज़ह से मेरी ये गाड़ी पॉयदान संख्या 7 पर रुकी हुई थी। और इसी बीच हिंदी फिल्म संगीत ने वो मुकाम तय किया जो अब तक हमें कभी नहीं मिला था। तो सबसे पहले ए आर रहमान और गुलज़ार की जोड़ी को आस्कर एवार्ड मिलने के लिए एक बड़ा सा जय हो ! ये इस बात को पुख्ता करता है कि भले ही हम अपने फिल्म संगीत के स्वर्णिम अतीत को पीछे छोड़ आए हों पर नया संगीत भी असीम संभावनाओं से भरा है और इससे बिलकुल नाउम्मीदी सही नहीं है।

तो चलें इस संगीतमाला की आखिर की छः सीढ़ियों का सफ़र तय करें कुछ अद्भुत गीतों के साथ। छठी पायदान पर एक ऐसे कलाकार हैं जो एक नामी संगीतकार जोड़ी का अहम हिस्सा तो हैं ही, वे गाते भी हैं और अपनी चमकदार चाँद के साथ दिखते भी बड़े खूब हैं। पर हुजूर अभी इनकी खूबियाँ खत्म नहीं हुई हैं। छठी पायदान के इस गीत को लिखा भी इन्होंने ही है। जी हाँ ये हैं विशाल ददलानी और मेरी संगीतमाला की छठी पायदान पर गीत वो जिसे फिल्म दोस्ताना में आवाज़ दी है शान ने...


गर जिंदगी की जद्दोज़हद में अगर आप उबे हुए हों तो निश्चय ही ये गीत आपके लिए मरहम का काम करेंगा। पियानों के प्यारे से आरंभिक नोट्स , शान की मखमली आवाज़ और गिरती मनःस्थिति में मन को सहलाते विशाल के शब्द इस गीत के मेरे दिल में जगह बनाने की मुख्य वज़हें रहीं हैं। तो आइए सुनें ये गीत जो एक शाम मेरे नाम पर प्रस्तुत किया जाने वाला १०० वाँ गीत भी है

कुछ कम रौशन है रोशनी
कुछ कम गीली हैं बारिशें
थम सा गया है ये वक्त ऍसे
तेरे लिए ही ठहरा हो जैसे

कुछ कम रौशन है रोशनी....
क्यूँ मेरी साँस भी कुछ भींगी सी है
दूरियों से हुई नज़दीकी सी है
जाने क्या ये बात है हर सुबह अब रात है
कुछ कम रौशन है रोशनी.....

फूल महके नहीं कुछ गुमसुम से हैं
जैसे रूठे हुए, कुछ ये तुमसे हैं
खुशबुएँ ढल गईं, साथ तुम अब जो नहीं
कुछ कम रौशन है रोशनी........






और इससे पहले कि आगे बढ़ें एक नज़र उन गीतों पर जो इस साल की संगीतमाला की शोभा बढ़ा चुके हैं।



वार्षिक संगीतमाला 2008 में अब तक :


रविवार, मार्च 01, 2009

जब सेल (SAIL) ने मिलाया दो चिट्ठाकारों को : एक मुलाकात ' पारुल ' के साथ भाग - २

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कैसे नेट पर पारुल जी से मेरा परिचय हुआ और सेल परिवार का सदस्य होना किस तरह हमारी मुलाकात का सबब बना। अब आगे पढ़ें...

...खाने के साथ बातें ब्लागिंग की ओर मुड़ गईं । कुमार साहब ने शायद मेरे आने से पहले मुसाफ़िर हूँ यारों की मेरी हाल की पोस्ट पढ़ी थी इसलिए पूछ बैठे कि क्या मेरा घर सासाराम में है? मैंने कहा नहीं वो तो बचपन में वहाँ कुछ दिन रहना हुआ था इसलिए वहाँ से जुड़ी यादों के बारे में लिखा था। पारुल जी ने इसी बीच मुझे सूचना दी कि प्रत्यक्षा जी से उनकी बात हुई है और उन्होंने मुझे 'हैलो' कहा है। प्रत्यक्षा जी के उत्कृष्ट लेखन की बात चली। हाल ही में उनकी एक कहानी 'आहा जिंदगी' में नज़र आई तो काफी अच्छा लगा। मुझे झारखंड की मिट्टी से जुड़े उनके सजीव शब्दचित्र याद आ गए जिसमें यहाँ की बोली और संस्कृति को उन्होंने बखूबी उतारा था।
बात लेखकों की हो रही थी तो ये प्रश्न आया कि बतौर पाठक हम किसी लेखक की कृति में उसके जीवन को क्यूँ ढूँढते हैं ? क्या ये सही नहीं कि किसी लेखक की सबसे अच्छी कृतियाँ कहीं ना कहीं उसके अपने अनुभवों से निकली होती हैं। इस संदर्भ में मैंने अहमद फराज़ की ग़ज़ल रंजिश ही सही.. का हवाला दिया और उसके पीछे फ़राज़ की प्रेरणा की कथा सुनाई।

फिर बातें गुलज़ार, मुक्त छंद की कविताओं और हिंदी किताबों से होती हुईं गाँधीजी पर लिखी गई हाल की प्रविष्टियों तक जा पहुँची। कुमार साहब खुद तो ब्लागिंग के लिए समय नहीं निकाल पाते पर ब्लॉग्स नियमित रूप से पढ़ते हैं। भगवान ऐसी पुण्यात्माओं की संख्या में सतत वृद्धि करे! :)
गाँधीजी के बारे में हम दोनों के विचारों में एकरूपता थी। उनके व्यक्तित्व में अच्छाइयों के साथ कमियाँ भी थीं पर देश के लिए उनके निजी जीवन से ज्यादा महत्त्वपूर्ण उनका सामाजिक और राजनीतिक जीवन रहा। इस संबंध में Freedom at Midnight का जिक्र हुआ जो कुमार साहब और मेरी बेहद प्रिय पुस्तक रही है और जिसने गाँधी के बारे में हमारी धारणाओं को एक नई दिशा दी है।

बात चिट्ठाकारों की होने लगीं। अफ़लातून की बोकारा यात्रा की बात हुई और कुमार साहब ने उन्हें अपनी राजनीतिक विचारधारा के प्रति समर्पित पाया। मैंने भी उन्हें बताया कि कैसे सपरिवार बनारस में उनके घर पर धावा बोला था। दरअसल चिट्ठाकारों की आभासी दुनिया कई बार वास्तविक जिंदगी से मिल जाती है और हाल ही में इससे जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा हाथ लगा जो मैंने वहाँ शेयर किया। सोचा इस प्रकरण से पैदा हुए हल्के फुल्के क्षणों को आपसे भी बाँटता चलूँ :)
अब कुछ दिन पहले शुकुल जी नैनीताल ट्रेनिंग पर गए थे। उनके ट्रेनिंग प्रोग्राम के एक फैकलटी जो कविता शायरी में दिलचस्पी रखते हैं को मेरे किसी लेख की लिंक मिली। उन्हें उत्सुकता हुई कि ये कौन सी विधा है जिसमें लोग अपने आप को इस तरह व्यक्त कर रहे हैं। उन्हें बताया गया कि ये ब्लागिंग है श्रीमान। तुरंत उनका माथा ठनका बोले अरे तब तो ये बड़ी खतरनाक चीज है भाई हमारी क्लास में भी एक 'अनूप शुक्ल' था। दिन में कक्षा में उँघता था और सुना है रात में यही ब्लागिंग वागिंग किया करता था।:)

पारुल जी ने कहा कि उनके रिजर्व रहने वाले स्वाभाव को ब्लॉगिंग ने बहुत हद तक बदला है। उनका मानना है कि अब वो पहले से अधिक बात करने लगीं हैं। पारुल ने बात आगे बढ़ाई तो फौलोवर्स की प्रकृति, टिप्पणी के प्रकार, चिट्ठाकारों का वर्गीकरण, तथाकथित आत्ममुग्ध लोगों की जमात, ई-मेल में आते अनचाहे संदेशों की परेशानी, मूल पोस्ट से बिलकुल मेल ना खाती टिप्पणियाँ तरह तरह के मुद्दे गपशप का हिस्सा बनते गए। हम दोनों इस बात पर एक मत थे कि विवादों से दूर रहकर अगर हम अपनी रचनात्मकता को बनाए रखने में पूरा ध्यान लगाएँ, तो वही सही मायने में व्यक्तिगत तौर पर और सारे हिंदी चिट्ठाजगत के लिए बेहतर रहेगा। कुमार साहब इस दौरान शांति से हमारी बातचीत सुनते रहे।

बात फिर संगीत की ओर बढ़ी तो उन्होंने बताया कि डा.मृदुल कीर्ति के लिए हाल ही में जाकर उन्होंने कानपुर में पतांजलियोग के काव्यानुवाद की रिकार्डिंग की है। सुन कर बड़ी खुशी हुई। आशा है डा.कीर्ति जल्द ही इसे बड़े पैमाने पर रिलीज भी करेंगी। वैसे पारुल जी की अद्भुत गायन प्रतिभा से तो हम सभी शुरुआत से ही क़ायल हैं और अगर इस पोस्ट को पढ़ने वालो् में से कोई उनकी आवाज़ से अपरिचित है तो उनके लिए राँची की ब्लागर मीट में गाया एक छोटा सा टुकड़ा पेश है।


अगर आप ये समझ बैठे हों कि पारुल के पूरे परिवार की गीत संगीत से रुचि है तो आपने विल्कुल सही समझा है :) कुमार साहब भी गाने में अभिरुचि रखते हैं और बच्चे भी गाना सुनने में अभी से रुचि लेने लगे हैं। कहते हैं कि अगर लंबी ड्राइव पर जाना हो और ये युगल जोड़ी पीछे बैठी हो तो फिर म्यूजिक सिस्टम की जरूरत नहीं। पूरे रास्ते ये नान स्टॉप अपने गायन से आपका मनोरंजन करते रहेंगे। अब उस रात तो गपशप में ही इतना समय निकल गया कि मैं इस जोड़ी से कोई गीत नहीं सुन सका। वैसे भी रात के बारह बज चुके थे। कुमार जी को रात दो बजे अपने संयंत्र का एक चक्कर लगाना था और बीच बीच में वो फोन लगाकर कार्यस्थल में हो रही गतिविधियों की जानकारी ले रहे थे। सो मध्य रात्रि के आस पास मैं वापस अपने गेस्ट हाउस की ओर रवाना हो गया।

जब मैं रात सवा बारह बजे बोकारो निवास पहुँचा तो सारे गेट बंद हो चुके थे। ड्यूटी पर तैनात पहरेदार हमारे भद्र पुरुष होने पर शंका प्रकट करने लगा। अब हम कैसे बताते कि सेल के कर्मचारी होने के साथ हम ब्लॉगर भी हैं और अभी अपने दायित्वों का निर्वाह कर लौटे हैं। अंततः कुमार साहब की सिफारिश के बाद मुझे अंदर घुसने की इज़ाजत मिली और फिर मुलाकात का वादा ले कर हम विदा हुए ।



इस चिट्ठे पर इनसे भी मिलिए


शनिवार, फ़रवरी 28, 2009

जब सेल (SAIL) ने मिलाया दो चिट्ठाकारों को : एक मुलाकात ' पारुल ' के साथ भाग - १

हिंदी चिट्ठा जगत की दुनिया में जब भी किसी चिट्ठाकार से मिला हूँ, अपने संस्मरणों को आपके साथ साझा किया है। इसी कड़ी में आज की ये पोस्ट समर्पित है साथी चिट्ठाकार कवयित्री ,गायिका और गुलज़ार प्रेमी पारुल जी और उनके श्रीमान और हमारे सहकर्मी कुमार साहब को।

पारुल जी से मेरी आभासी जान पहचान सोशल नेटवर्किंग साइट आरकुट (Orkut) के माध्यम से हुई थी। दरअसल वहाँ गुलज़ार प्रेमियों के फोरम में बारहा जाना होता था और वहीं पारुल की बेहतरीन गुलजारिश कविताएँ पहली बार पढ़ने को मिलती रहतीं थीं। कुछ महिनों बाद मन हुआ कि देखें कि आरकुट पर मेरी प्रिय लेखिका आशापूर्णा देवी के प्रशंसकों की क्या फेरहिस्त है। संयोग था कि इस बार पहले पृष्ठ पर पारुल की प्रोफाइल आई और एक नई बात ये पता चली कि फिलहाल वो झारखंड में रहती हैं। उनके बारे में उत्सुकता बढ़ी, फिर कुछ स्क्रैपों का आदान प्रदान हुआ और इन्होंने मुझे अपनी मित्र सूची में शामिल कर लिया। तब 'परिचर्चा' के काव्य मंच का भार मेरे कंधों पर था और हमारी कोशिश थी कि अधिक से अधिक हिंदी में लिखने वाले स्तरीय कवियों को उस मंच से जोड़ें। पारुल को भी वहाँ आने का आमंत्रण दिया पर शायद समयाभाव के कारण वो वहाँ भाग नहीं ले सकीं। ये बात २००६ के उतरार्ध की थी उसके बाद उनसे कुछ खास संपर्क नहीं रहा। पर अगस्त २००७ में जब उन्होंने अपना चिट्ठा शुरु किया तब जाकर उनसे पहली बार नेट पर बात हुई ।

जैसे ही उन्होंने अपने शहर का नाम बोकारो बताया तो मुझे लगा कि कहीं इनके पतिदेव मेरी तरह सेल (SAIL) के कार्मिक तो नहीं। मेरा अनुमान सही निकला और खुशी हुई कि तब तो जरूर कभी ना कभी उनसे मिलना हो पाएगा क्योंकि कार्यालय के दौरों पर अक्सर मुझे अपने इस्पात संयंत्रों का दौरा करना पड़ता है। पर पिछले साल बोकारो के दौरे कम ही लगे और जब लगे भी तो एक ही दिन में वापस भी आ जाना था। इसलिए भेंट करने का मौका हाथ नहीं आया।. पर इस साल फरवरी के प्रारंभ में तीन दिनों के लिए बोकारो जाने का कार्यक्रम बना तो लगा कि इस बार उनसे मुलाकात की जा सकती है। पारुल जी को पहले ही दिन जाकर सूचना दे दी कि मैं बोकारो में आ गया हूँ। अब दिक्कत ये थी कि मेरा काम हर दिन छः बजे शाम को खत्म होता था और उसी वक़्त से उनकी आर्ट आफ लीविंग (Art of Living) की कक्षाएँ शुरु होती थीं।

अगली सुबह जब कार्यालय की ओर निकल रहा था तो उनका फोन आया। पारुल जी ने पूछा रात में आने में तकलीफ़ तो नहीं है ? मैंने मन ही मन सोचा हमारे जैसे गप्पियों को काहे की तकलीफ, जिनको होनी है वो तो मिलने के बाद समझ ही जाएँगी :)। प्रकट में मैंने कहा कि ना जी ना कॉलेज के ज़माने से निशाचरी रहे हैं और अब तो मुई इस ब्लॉगिंग की वज़ह से हर रात ही अपनी सुबह होती है और असली सुबह के दर्शन तो कभी कभार होते हैं।

रात के नौ बजे पारुल जी के पतिदेव कार लेकर बोकारो निवास के पास हाज़िर थे। साथ में पारुल जी का मासूम सा छोटा बेटा भी था। पारुल जी का घर कार से बस मिनटों के रास्ते पर था। घर के सामने की छोटी सी खूबसूरत बगिया पार कर हम घर में घुसे और बातों का सिलसिला शुरु हो गया। वैसे भी मंदी के इस ज़माने में जब भी किसी प्लांट वाले से मिलते हैं तो पहला सवाल उत्पादन और विक्रय आदेशों के आज के हालात के बारे में जरूर होता है। मैंने कुमार साहब से कहा कि एक ब्लॉगर ने ये खबर पेश की है सेल वाले अपनी गोल्डन जुबली के दौरान अपने कर्मचारियों को एक टन सोना दे रहे हैं और देखिए तुरंत वहाँ टिप्पणी भी आ गई कि देखो ये लोग मंदी के ज़माने में क्या चाँदी काट रहे हैं। अब उन्हें क्या पता सेल के इस विशाल परिवार में ये प्रति कर्मचारी ८ ग्राम के बराबर होती है। वैसे अभी तक हमने उस का भी मुँह नहीं देखा।

बातचीत अभी दस मिनट हुई थी कि पारुल ने कहा कि पहले भोजन कर लेते हैं हम सब ने तुरंत चाउमिन और पनीर चिली पर हाथ साफ किया। अब ब्लॉगरी मन का क्या कहें, इधर नए नए पिता बने यूनुस ने कुछ दिनों पहले आभा जी की तहरी का भोग लगाने के पहले विभिन्न कोणों से तसवीर छपवा कर हम सब का जी जलाया था। खाने से पहले खयाल आया लगे हाथ हम भी पारुल की चाउमिन का बोर्ड लगाकर तसवीर छाप देते हैं फिर वो समझेंगे कि ऍसा करने से दूसरों पर क्या बीतती है। पर पारुल जी ठहरी संकोची प्राणी। पहले से ही चेता रखा था कि कैमरे का प्रयोग मत करना तो हम यूनुस से बदला लेने की आस मन में ही दबा के रह गए।



पुनःश्च इस पोस्ट में चाउमिन वाली बात पर पारुल जी ने प्रतिक्रिया स्वरूप ये चित्र भेजा है । देखें और आनंद लें




खाने के साथ बातें ब्लागिंग की ओर मुड़ गईं । अगले दो तीन घंटे हमने चिट्ठाजगत से जुड़े लोगों के बारे में गपशप में बिताये। किसके बारे में क्या बातें हुईं ये पढ़िए यहाँ इस अगले भाग में....

इस चिट्ठे पर इनसे भी मिलिए


गुरुवार, फ़रवरी 26, 2009

राँची ब्लागर्स मीट 22 फरवरी 2009 : जो देखा, जो कहा-सुना और जो महसूस किया..

पिछले एक हफ़्ते से घर परिवार में शादी के समारोह की वज़ह से राँची के बाहर रहा। बीच में एक दिन कोलकाता से राँची हिंदी ब्लॉगर मीट (Ranchi Hindi Blogger's Meet) में भाग लेने आया और उसी दिन शाम को फिर पटना रवाना होना पड़ा। आज वापस आया और प्रतिभागियों की रपट पढ़ी। कुछ सकरात्मक, कुछ व्यंग्यात्मक तो कुछ नकरात्मक! सच कहूँ तो अपनी अनुभूतियों को इन सबके बीच पा रहा हूँ।

शैलेश ने जब इस ब्लॉगर मीट का सुझाव दिया था तो हमारे मन में यही था कि सारे ब्लॉगर बंधु मिलकर ही इसका प्रायोजन करेंगे। पर शैलेश का ख्याल था कि प्रायोजक मिलने से कार्यक्रम के संचालन में सुविधा होगी तो क्यूँ ना इस बारे में कुछ प्रयास कर के देखा जाए। फिर अपने परिश्रमी व्यक्तित्व के अनुरूप उसने सभी प्रतिभागियों से ई -मेल से संपर्क किया और डा. भारती कश्यप जी ने आगे आकर आयोजन का जिम्मा लिया।


आयोजन की सबसे बड़ी सफलता राँची और इसके आस पास की जगहों से आए ब्लॉगरों का मिल पाना था। कम से कम पिछले एक साल में जो पत्रकार बंधु और अन्य लोग चिट्ठाकारी से जुड़े हैं उनसे मिलने के लिए हमें एक बढ़िया मंच मिला जिसके लिए शैलेश और भारती जी के हम सभी आभारी हैं।

इस कार्यक्रम की रूपरेखा को बनाने के पहले शैलेश, मीत और मैंने मिलकर जो विचार विमर्श किया था उसके तहत हम इस निर्णय पर पहुँचे थे कि कार्यक्रम के मूलतः तीन हिस्से रहेंगे

  1. पहले हिस्से में हिंदी टाइपिंग और ब्लॉगिंग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी
  2. दूसरे हिस्से में हिंदी ब्लॉगिंग के विकास से जुड़े घटनाक्रमों के साथ हिंदी ब्लागिंग के मजबूत सामूहिक खंभों की बात की जाएगी।
  3. और फिर समय के हिसाब से सारे ब्लॉगर ब्लागिंग से जुड़े अपने अनुभव साझा करेंगे और फिर मुख्य अतिथियों से उनके विचार सुने जाएँगे।

पहले हिस्से का बीड़ा शैलेश के कंधों पर था और उन्होंने ये बखूबी उठाया। उन्होंने अपनी बात यूनीकोड से शुरु की और फिर हिंदी टाइपिग के औज़ारों से बारे में विस्तार से बताया जो निश्चय ही उपस्थित प्रतिभागियों के लिए उपयोगी रही होगी। शैलेश हिंदी में ब्लॉग बनाने का डेमो भी दिखाने वाले थे पर समयाभाव की वज़ह से उन्हें अपना प्रेजेन्टेशन बीच में ही रोकना पड़ा।

दूसरे हिस्से के बारे में शिव जी को बोलना है ऍसा शैलेश और मीत ने बताया था पर शिव जी ही को इसके बारे में अनिभिज्ञता थी तो वो जिम्मा घनश्याम जी ने मुझे सौंपा। दरअसल हिंदी ब्लागिंग की नींव साझा प्रयासों की बुनियाद पर पड़ी है और इसीलिए मैंने जीतू भाई, अनूप शुक्ल और अन्य साथियों के अथक प्रयासों का जिक्र किया जिसकी वज़ह से नारद जैसा एग्रगेटर बना। हिंदी चिट्ठों को एकसूत्र में पिरोने वाले एग्रग्रेटरों की इस परंपरा को आगे चलकर ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत ने और परिष्कृत और संशोधित ढंग से बढ़ाया। पत्रकारों को चिट्ठाकारी की ओर उन्मुख करने में अविनाश और उनके सामूहिक चिट्ठे मोहल्ला का ज़िक्र भी हुआ।



हिंदी ब्लागिंग में नए प्रवेशार्थियों से मैंने लेखन में विषय वस्तु पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की बात कही। एग्रगेटर से जुड़ना ब्लागिंग के शुरुआती दौर में आपकी पहचान बढ़ाता है और शुरुआती ट्रॉफिक भी लाता है पर इस संख्या मे अधिकाधिक बढ़ोत्री सर्च इंजन से पहुँचने वाले पाठक ही ला सकते हैं। इसलिए एक सफल ब्लॉग लेखक का काम अपनी प्रभावी विषयवस्तु के बल पर इन पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है। इसी संदर्भ में हिट काउंटर और ई-मेल सब्सक्रिप्शन जैसे टूल्स के महत्त्व के बारे में भी मैंने विस्तार से चर्चा की।

इसी बीच घनश्याम जी ने भी अपने अनुभवों को हम सब से साझा किया। उन्होंने बताया कि हरिवंश जी पर लिखे लेखों को चिट्ठे पर प्रकाशित करने के बाद खुद हरिवंश जी ने उन्हें फोन किया और उन्हें पत्रकारिता से जुड़ी अन्य हस्तियों के बारे में लिखने के लिए प्रेरित किया। भोजनकाल के दौरान कई ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जो हिंदी में चिट्ठा बनाने में उत्सुक थे। इस दौरान राजीव उर्फ भूतनाथ जी को भी मैंने खोज निकाला और उनका सभी से परिचय कराया। राँचीहल्ला से जुड़े नदीम अख्तर और मोनिका गुप्ता से भी भोजन के दौरान परिचय हुआ।



भोजन के पश्चात राँचीहल्ला के संचालक और पत्रकार नदीम अख्तर ने सामूहिक ब्लॉग की विस्तृत संभावनाओं पर चर्चा की। संगीता पुरी ने अपने चिट्ठे के माध्यम से ज्योतिष को विज्ञान के करीब लाने की बात कही। रंजना सिंह ने कहा कि अगर हिंदी में विविध विषयों पर सुरुचिपूर्ण लेखन से अपनी भावी पीढ़ी को हम कुछ दे पाए तो ये एक बड़ी बात होगी। फिर प्रभात गोपाल झा, अभिषेक मिश्र और लवली कुमारी ने अपने चिट्ठों के बारे में हमें बताया। घड़ी की सुइयाँ दो से आगे की ओर खिसक रही थीं और कार्यक्रम में कुछ सरसता की कमी महसूस हो ही रही थी कि श्यामल सुमन ने अपनी एक बेहतरीन ग़ज़ल पेश की जिसे सुनकर सब वाह-वाह कर उठे। कुछ शेरों की बानगी देखिए ...

दुख ही दुख जीवन का सच है, लोग कहते हैं यही।
दुख में भी सुख की झलक को, ढ़ूँढ़ना अच्छा लगा।।

हैं अधिक तन चूर थककर, खुशबू से तर कुछ बदन।
इत्र से बेहतर पसीना, सूँघना अच्छा लगा।।


कब हमारे, चाँदनी के बीच बदली आ गयी।
कुछ पलों तक चाँद का भी, रूठना अच्छा लगा।।

फिर आई पारुल की बारी और हम सब की फरमाइश पर उन्होंने अपनी चिरपरिचित खूबसूरत आवाज़ में पहले एक ग़ज़ल और फिर एक गीत गाकर सुनाया। उनका गाया गीत तो मैं अगली पोस्ट में सुनवाउँगा पर मीत जी ने इस अवसर पर जो ग़ज़ल पेश की वो पेश-ए-खिदमत है.



क़ायदे से सम्मानित अतिथियों को ब्लॉगरों की बातें सुनने के बाद ब्लागिंग के बारे में अपनी सोच ज़ाहिर करनी चाहिए थी पर हुआ इसका उल्टा। कार्यक्रम की शुरुआत राँची के वरिष्ठ पत्रकार एवम मुख्य अतिथि बलबीर दत्त (जो राँची एक्सप्रेस के प्रधान संपादक हैं) ने करते हुए चिट्ठे को डॉयरी लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला बताया और ये भी कहा कि यहाँ वो बात भी की जा सकती है जो पेशेगत प्रतिबद्धताओं की वज़ह से नहीं की जा सकती। खैर यहाँ तक तो ठीक रहा लेकिन जब दैनिक आज के संपादक ने चिट्ठाकारी को संपादक के नाम पत्र का अंतरजालीय एक्सटेंशन बताया तो बात बिल्कुल हजम नहीं हुई। अगर भिन्न भिन्न विषयों पर लिखने बाले चिट्ठाकारों की बातों को सुनने में इन लोगों ने कुछ समय और लगाया गया होता तो ब्लागिंग के बारे में उनकी सोच का दायरा जरूर बढ़ता। ब्लागिंग मीट को राँची के सभी अखबारों प्रभात खबर, राँची एक्सप्रेस, हिदुस्तान, टाइम्स आफ इंडिया और टेलीग्राफ ने कवर किया पर शायद ही इनमें से कोई हिंदी ब्लागिंग की संभावनाओं, इसके विस्तार पर ढ़ंग से चर्चा कर सका। खैर चूंकि ये सम्मेलन अपने आप में हिंदी ब्लागिंग के प्रति पहली पहल है, हमें इन बिंदुओं से सीख लेते हुए आगे का मुकाम तय करना होगा।



(बाएँ से मैं यानि मनीष,शिव जी, रंजना जी व उनकी बेटी, शैलेश,संगीता पुरी जी,श्यामल सुमन और राजीव)

चाय की चुस्कियाँ लेने के बाद जब साँयकाल में हमने एक दूसरे से विदा ली तो इस बात का संतोष सब के चेहरे पर था कि इस अपनी तरह के पहले आयोजन की वज़ह से हम सब एक दूसरे से रूबरू हो पाए।



कार्यक्रम की आयोजिका डा. भारती कश्यप



प्रभात भाई की ताकीद थी कि मेरा हँसता मुस्कुराता फोटो जरूर होना चाहिए तो लीजिए हो गई आपकी ख्वाहिश पूरी :)


शैलेश और मीत

चाय तो खत्म हो गई पर बातें ज़ारी रहीं। शिव और रंजना जी


शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009

आइए चलें २२ फरवरी को राँची, पूर्वी भारत के हिंदी चिट्ठाकारों के सम्मेलन में शिरकत करने..

पिछले तीन वर्षों में चिट्ठाकारिता यानि ब्लागिंग की बदौलत मेरा राँची, बनारस, दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और बोकारो में चिट्ठाकारों से मिलना जुलना होता रहा है। दो साल पहले जब दिल्ली में हिन्द युग्म के नियंत्रक शैलेश से पहली बार मुलाकात हुई थी तो ये बात हुई थी कि हिंदी चिट्ठाकारों के बीच ऍसी मुलाक़ात छोटे शहरों में भी होनी चाहिए। पर उस वक़्त राँची क्या झारखंड में हिंदी ब्लागिंग करने वाले साथी नहीं थे। जो यहाँ के थे भी वो झारखंड से निकल कर देश के अलग अलग हिस्सों में रहते हुए ब्लॉगिंग कर रहे थे, इसलिए यहाँ कोई ब्लॉगर मीट कराने की सोचना दूर की कौड़ी थी।
पिछले एक डेढ़ वर्ष में स्थिति बदली जरूर है। देश के इस पूर्वी इलाके में बिहार, झारखंड से लेकर बंगाल तक ऍसे हिंदी ब्लॉगरों की संख्या में इज़ाफ़ा आया है जिन्होंने हिंदी ब्लॉग जगत में सकारात्मक उपस्थिति दर्ज कराई है। आज जहाँ शिव कुमार मिश्रा के व्यंग्यात्मक लेखन को चाव से पढ़ा जाता है तो वहीं बोकारो की संगीता पुरी ने गत्यात्मक ज्योतिष जैसा नया विषय चुनकर चिट्ठाकारिता के नए आयाम प्रस्तुत किए हैं। जमशेदपुर की रंजना सिंह साहित्यिक लेखन के साथ आध्यात्मिकता की बाते कर रही हैं तो लवली कंप्यूटर ज्ञान से लेकर भुजंग ज्ञान तक बाँट रही हैं। बोकारो की पारुल और कोलकाता के मीत जहाँ अपनी कविताओं के साथ पॉडकास्टिंग की विधा से अपनी सुरीली आवाज़ को आपके पास पहुँचा रहे हैं वहीं राँची के पत्रकारों ने भी अब राँची हल्ला के नाम से सामुदायिक चिट्ठा खोल दिया है जो हिंदी ब्लागिंग में रुचि रखने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। और अंत में अपनी बात करूँ तो आपका ये नाचीज बंदा अच्छे संगीत और साहित्य को इस चिट्ठे के माध्यम से आप तक पहुँचाने के लिए पिछले तीन सालों से कटिबद्ध है और अब हिंदी ब्लागिंग में यात्रा लेखन को समर्पित नए चिट्ठे मुसाफ़िर हूँ यारों का आगाज़ कर चुका है।

इसलिए जब शैलेश ने २२ फरवरी राँची में इस क्षेत्र के सभी ब्लागरों की मीट (Hindi Blogger's Meet at Ranchi ) बुलाने की योजना का खुलासा किया तो मुझे बेहद खुशी हुई। भिन्न भिन्न तबकों और पेशों से जुड़े लोगों का एक जगह मिलना निश्चय ही हिंदी ब्लागिंग के प्रति आम जनों की रुचि को बढ़ाएगा। हम सभी एक मंच से ब्लागिंग के प्रति अपने रचनात्मक अनुभवों को साझा करने का प्रयास करेंगे। इस कार्यक्रम का संयोजन कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम श्रीवास्तव (09798765568) और कश्यप मेमोरियल आई हास्पिटल, राँची की निदेशिका डा. भारती कश्यप ने कार्यक्रम के आयोजन का जिम्मा लिया है। आशा है पूर्वी भारत में रहने वाले तमाम हिंदी ब्लॉगर इस मीट में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराकर इस आयोजन को सफल बनाएँगे। कार्यक्रम की रूपरेखा माननीय अतिथियों और प्रतिभागियों के बारे में आप यहाँ भी देख सकते हैं



स्थान : कश्यप आई मेमोरियल हॉस्पिटल , सभागार कक्ष, राँची
तिथि : 22.2.2009
समय : ग्यारह बजे से
यहाँ पहुँचने के लिए इस नक़्शे का प्रयोग करें...



तो कर दीजिए आने की तैयारियाँ शुरु राँची में आपका स्वागत है !

गुरुवार, फ़रवरी 19, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 :पायदान संख्या 7 - आइए डूबें श्रेया और राहत के साथ मेलोडी की दुनिया में !

वार्षिक संगीतमाला की सातवीं पॉयदान पर भी मेलोडी उसी तरह बह रही है जैसी पिछली पॉयदान पर थी अंतर सिर्फ इतना कि पिछली सीढ़ी पर जहाँ रूप कुमार राठौड़ सुरों की गंगा बहा रहे थे वहीं आज की इस पॉयदान पर कोकिल कंठी श्रेया घोषाल विराजमान है।
सा रे गा मा जैसे म्यूजिकल टैलंट हंट (Musical Talent Hunt) की उपज श्रेया को गाने का पहला मौका संजय लीला भंसाली ने देवदास में दिया था और उसके बाद इस प्रतिभाशाली गायिका ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा है। सिंह इज किंग के इस युगल गीत में श्रेया का साथ दिया हैं जनाब राहत फतेह अली खाँ साहब ने। श्रेया की मीठी रूमानी आवाज़ के पार्श्व से जब राहत जी की बुलंद आवाज़ उभरती है तो इन दोनों आवाजों का संगम एक समां बाँध देता है जिसकी तासीर घंटों ज़ेहन में विद्यमान रहती है।

प्रीतम यूँ तो धुनों की चोरी के लिए बदनाम हैं पर हर साल वो कुछ ऍसी जबरदस्त धुनें भी देते हैं जिससे आश्चर्य होता है कि इतने प्रतिभाशाली होने के बावज़ूद धुन बनाने के लिए बारहा इन्हें inspired क्यूँ होना पड़ता है ? इस गीत के बोल लिखे हैं मयूर सूरी ने जो एक नवोदित गीतकार के साथ साथ संवाद लेखन का भी काम करते हैं। मयूर और प्रीतम की जोड़ी ने इससे पहले भी फिल्म प्यार के साइड एफेक्ट्स में एक कमाल का गीत जाने क्या चाहे मन बावरा... दिया था जो मुझे प्रीतम की सबसे दिलअजीज़ रचना लगती है।
तो आइए डालें इस गीत के बोलों पर एक नज़र और सुनें ये प्रेम से ओतप्रोत ये गीत...



दिल खो गया, हो गया किसी का...
अब रास्ता मिल गया खुशी का...
आँखों में है ख्वाब सा किसी का...
अब रास्ता मिल गया खुशी का...
रिश्ता नया रब्बा, दिल छू रहा है
खींचे मुझे कोई डोर तेरी ओर
तेरी ओर, तेरी ओर, तेरी ओर हाय रब्बा
तेरी ओर, तेरी ओर, तेरी ओर...
तेरी ओर, तेरी ओर, तेरी ओर हाय रब्बा
तेरी ओर, तेरी ओर, तेरी ओर ....

खुलती फिजाएँ खुलती घटाएँ ...
सर पे नया है आसमां .......
चारों दिशाएँ , हँसके बुलाएँ ...
वो सब हुये हैं मेहरबा......

हमें तो यही रब्बा , कसम से पता है
दिल पे नहीं कोई जोर, कोई जोर...
तेरी ओर,.......

इक हीर थी और, था एक रांझा ....
कह्ते हैं मेरे गाँव में ...
सच्चा हो दिल तो सौ मुश्किलें हो....
झुकता नसीबा पाँव में .....
आँचल तेरा रब्बा फलक़ बन गया है
अब इसका नहीं कोई ओर कोई छोर
तेरी ओर..................दिल खो.....

मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 8 :रूप कुमार राठौड़ की मखमली आवाज़ जो दिखाती है रब का रास्ता...

वार्षिक संगीतमाला २००८ में डेढ़ महिने का सफ़र पूरा कर हम सब आ चुके हैं आठवीं पॉयदान पर। और इस पॉयदान पर गीत उस फिल्म का जिसे लोकप्रियता में एक शाम मेरे नाम के हिंदी और रोमन संस्करणों के पाठकों ने कुल मिलाकर अबतक सबसे ज्यादा वोट दिए हैं। जी हाँ इस संगीतमाला की आठवीं पॉयदान पर फिल्म रब ने बना दी जोड़ी का वो गीत जिसे लिखा जयदीप साहनी ने, धुन बनाई सलीम सुलेमान ने और अपनी मखमली आवाज़ से निखारा रूप कुमार राठौड़ ने..


रूप कुमार राठौड़ एक ऍसे गायक हैं जिन्हें बतौर पार्श्व गायक , चुनिंदा गीत ही मिलते हैं पर उसमें वे वो प्रभाव पैदा करते हैं जो सालों साल मन से नहीं निकल पाता। अब वो चाहे बार्डर का गीत संदेशे आते हों हो या अनवर का मौला मेरे मौला। और पिछले साल मनोरमा फिल्म का गीत तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना, दे ना सकूँ में उनके लगाए बेहतरीन ऊँचे सुर, उस गीत को मेरी संगीतमाला की छठी पॉयदान तक ले गए थे।

क्या आप जानते हैं कि इतनी सधी आवाज़ के मालिक रूप कुमार राठौड़ ने संगीत का ये सफ़र एक गायक के तौर पर नहीं बल्कि तबला वादक की हैसियत से शुरु किया था? अस्सी के दशक की शुरुआत में जब ग़जलों का स्वर्णिम काल चल रहा था तब रूप कुमार राठौड़ सारे मशहूर गज़ल गायकों के चहेते तबला वादक थे। बाद में जब पत्नी सोनाली राठौड़ ने उनसे गाने के लिए प्रेरित किया तो वो गायिकी के क्षेत्र में आ गए।

रूप कुमार राठौड़ का परिवार संगीतिक विभूतियों से भरा पड़ा है। पिता पंडित चतुर्भुज राठौड़ खुद एक शास्त्रीय गायक थे। बड़े भाई श्रवण एक मशहूर संगीतकार रहे जिन्होंने नदीम के साथ मिलकर नब्बे के दशक में कई हिट फिल्में दीं और छोटे भाई विनोद भी पार्श्व गायक हैं।

अगर इस गीत को रूप साहब की आवाज़ में सुनकर आप गीत की भावपूर्ण मेलोडी से अभिभूत हो जाते हैं तो उसका श्रेय गीतकार और संगीतकार की जोड़ी को भी जाता है। जयदीप साहनी के लिए इस तरह के गीत को रचना एक अलग अनुभव था। अपने प्यार को अपना अराध्य मानने का ख्याल भारतीय संस्कृति में कोई नया नहीं है पर आजकल इस परिकल्पना को लेकर बनाए गए गीतों की तादाद बेहद कम रह गई है। जयदीप के लिए मुश्किल ये थी कि वो खुद भी इस तरह की सोच से मुतास्सिर नहीं थे फिर भी उन्होंने कहानी की माँग के हिसाब से इस विचार को अपने बोलों में ढाला और जो परिणाम निकला वो तो आप देख ही रहे हैं। जयदीप खुद अपने प्रयास से बेहद संतुष्ट हैं और कहते हैं कि
"अपनी सोच की चारदीवारी में जो गीतकार बँध के रह गया वो अलग अलग पटकथाओं के अनुरूप गीतों की रचना कैसे कर पाएगा?"

चलिए बातें तो आज बहुत हो गईं अब सुनते हैं ये बेहद प्यारा सा नग्मा


तू ही तो जन्नत मेरी, तू ही मेरा जूनून
तू ही तो मन्नत मेरी, तू ही रूह का सुकून
तू ही अँखियों की ठंडक, तू ही दिल की है दस्तक
और कुछ ना जानूँ, मैं बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ
सज़दे सर झुकता है, यारा मैं क्या करुँ

कैसी है ये दूरी, कैसी मजबूरी
मैंने नज़रों से तुझे छू लिया
कभी तेरी खुशबू, कभी तेरी बातें
बिन माँगे ये जहां पा लिया
तू ही दिल की है रौनक, तू ही जन्मों की दौलत
और कुछ ना जानूँ, बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ...

छम छम आए, मुझे तरसाए
तेरा साया छेड़ के चूमता..
तू जो मुस्काए, तू जो शरमाये
जैसे मेरा है ख़ुदा झूमता..
तू मेरी है बरक़त, तू ही मेरी इबादत
और कुछ ना जानूँ, बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ ...

और पर्दे पर शाहरुख अनुष्का की जोड़ी पर फिल्माए इस मधुर गीत की झलक आप यहाँ देख सकते हैं

गुरुवार, फ़रवरी 12, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 9 : मेरी माँ..प्यारी माँ..मम्मा कैलाश खेर का दिल छूता गीत !

दसविदानिया (Dasvidaniya)! है ना अज़ीब नाम एक भारतीय फिल्म के लिए। निर्देशक सुशांत शाह ने अपनी फिल्म के लिए इस रशियन जुमले का इस्तेमाल किया जिसका अर्थ होता है goodbye यानि अलविदा! खैर, अभी वार्षिक संगीतमाला २००८ को अलविदा कहने में तो काफी वक़्त बाकी है पर आज बारी है प्रथम दस पायदानों में से
नौवीं पायदान की, जहाँ इसी फिल्म से लिया गया वो गीत है जिसमें व्यक्त की गई भावनाओं को हम सब अपनी माँ के लिए महसूस करते हैं।




एक आम आदमी के किरदार में विनय पाठक का काम इस फिल्म में तो बेहतरीन है ही साथ ही कैलाश खेर का दिया संगीत भी मन को लुभाता है। कैलाश ने इस गीत की पूरी धुन में गिटार का प्रमुखता से प्रयोग किया है जो बोलों के साथ सरसता से घुलता नज़र आता है। कैलाश खेर के रचित गीतों की खासियत है कि उनमें ज्यादा कविताई नहीं होती.. वे सहज भाषा का प्रयोग करते हैं । पर जब यही सीधे सच्चे बोल उनके स्वर में उभरते हैं तो दिल का कोना कोना गीत की भावनाओं से पिघलता प्रतीत होता है। उनकी आवाज़ में एक दिव्यता है जो उनके गाए गीतों को एक अलग ही मुकाम पर ले जाती है। मुझे कैलाश जी की इस अंतरे की अदायगी सबसे बेहतरीन लगती है जब वो गाते हैं ...

दुनिया में जीने से ज्यादा उलझन है माँ
तू है अमर का ज़हां
तू गुस्सा करती है, बड़ा अच्छा लगता है
तू कान पकड़ती है बड़ी जोर से लगता है
मेरी माँ..प्यारी माँ..मम्मा


.....बचपन की ढ़ेर सारी यादें एक साथ आँखों के सामने घूम जाती हैं। तो आप भी सुनिए ना ये गीत। खुद बा खुद माँ की ममतामयी छवि आपकी आँखों के सामने आ जाएगी...

माँ मेरी माँ
प्यारी माँ..मम्मा
हो माँ..प्यारी माँ..मम्मा
हाथों की लकीरें बदल जाएँगी
गम की ये जंजीरें पिघल जाएँगी
हो खुदा पे भी असर, तू दुआओं का है घर
मेरी माँ..प्यारी माँ..मम्मा


बिगड़ी किस्मत भी सँवर जाएगी
जिंदगी तराने खुशी के गाएगी
तेरे होते किसका डर , तू दुआओं का है घर
माँ मेरी माँ...प्यारी माँ..मम्मा


यूँ तो मैं सबसे न्यारा हूँ
तेरा माँ मैं दुलारा हूँ
दुनिया में जीने से ज्यादा उलझन है माँ
तू है अमर का ज़हां
तू गुस्सा करती है, बड़ा अच्छा लगता है
तू कान पकड़ती है बड़ी जोर से लगता है
मेरी माँ..प्यारी माँ..मम्मा


हाथों की लकीरें बदल जाएँगी,
ग़म की ये जंजीरें पिघल जाएँगी
हो ख़ुदा पे भी असर, तू दुआओं का है घर
माँ मेरी माँ...प्यारी माँ..मम्मा


विनय पाठक पर फिल्माए इस गीत को आप यू ट्यूब पर भी देख सकते हैं..

सोमवार, फ़रवरी 09, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 10 : ख्वाज़ा मेरे ख्वाज़ा सुनिए ये सूफियाना कव्वाली और इसकी बेहतरीन धुन

कार्यालय के दौरों ने वार्षिक संगीतमाला की गति मंथर कर दी है। बोकारो से लौटकर अब भिलाई की ओर प्रस्थान कर रहा हूँ पर जाने के पहले आपको इस संगीतमाला की पॉयदान की ये सूफ़ी कव्वाली और इसकी निराली धुन जरूर सुनवाते जाऊँगा। पिछली पोस्ट में फिल्म आमिर के गीत ने जो सूफ़ियाना माहौल रचा था, वो इस पायदान पर भी बरक़रार है। जोधा अकबर के इस सूफ़ी कलाम को संगीतबद्ध किया रहमान और गाया भी रहमान ने।


दरअसल इस गीत से मेरा जुड़ाव इसकी पिक्चराइजेशन देखने के बाद हुआ। उसके बाद जब मैंने इस सूफ़ी क्ववाली का इनस्ट्रूमेंटल वर्सन सुना मन ऐसी शांति और सुकून में डूब गया कि इस धुन को बार बार सुनने की इच्छा होती रही। फिर पिछले साल के बड़े हिस्से तक ये धुन मेरी मोबाइल की रिंग टोन बनी रही। अल्लाह रक्खा रहमान को लोग यूँ ही संगीत समीक्षक जीनियस की उपाधि नहीं देते। क्या धुन बनाई है उन्होंने !




इस धुन को उन्होंने वुडविंड श्रेणी के वाद्य oboe का बखूबी इस्तेमाल किया है जो बहुत हद तक क्लारिनेट से मिलता जुलता वाद्य यंत्र है सिवाए इसके कि इसमें माउथपीस नहीं होता। इस वाद्य यंत्र के बारे में विस्तार से जानना चाहते हों तो यहाँ देखें ।अगर ये गीत मेरी इस गीतमाला के प्रथम दस में जगह पा सका है तो इसके पीछे इस धुन का बहुत बड़ा हाथ है।

अब धुन तो आपने सुन ली अब जरा इसके बोलों पर ज़रा गौर फरमाएँ । इसे दोहराते हुए आपका मन भी उस ऊपरवाले की खिदमत में झुक जाएगा।



ख्वाज़ा जी.. ख्वाज़ा
या गरीबनवाज़ या गरीबनवाज़ या गरीबनवाज़
या मोइनुद्दीन या मोइनुद्दीन या मोइनुद्दीन
या ख्वाज़ा जी या ख्वाज़ा जी...

ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा
दिल में समा जा
शाहों का शाह तू
अली का दुलारा

ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा
दिल में समा जा
बेकसों की तक़दीर
तूने है सँवारी
ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा

तेरे दरबार में ख़्वाजा
नूर तो है देखा
तेरे दरबार में ख़्वाजा
सर झुकाते हैं औलिया
तू है हिमलवली ख़्वाजा
रुतबा है न्यारा
चाहने से तुझको ख़्वाजा जी
मुस्तफ़ा को पाया
ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा

मेरे पीर का सदक़ा मेरे पीर का सदक़ा
है मेरे पीर का सदका
तेरा दामन है थामा
ख़्वाजा जी.... टली हर बला हमारी
छाया है ख़ुमार तेरा
जितना भी रश्क़ करें बेशक तो कम हैं ऍ मेरे ख़्वाजा
तेरे कदमों को मेरे रहनुमा नहीं छोड़ना गवारा
ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा


गुरुवार, फ़रवरी 05, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 11 : हाँ रहम हाँ रहम फरमाए ख़ुदा...'आमिर' का एक प्यारा सूफ़ियाना नग्मा

वार्षिक संगीतमाला के एक महिने से चल रहे सफ़र में अब तक आप मेरे साथ गीत संख्या २५ से लेकर १२ तक का सफ़र तय कर चुके हैं। अब तक आपने कभी उदासी तो कभी मुस्कुराहट के रंगों से भरे गीत सुनें। पर आज ११ वीं पायदान पर चढ़ा है माहौल सूफी संगीत का। और एक रोचक तथ्य ये कि इस पॉयदान के संगीतकार, गीतकार और सारे गायकों के लिए मेरी किसी भी संगीतमाला में ये पहली इन्ट्री है।

ग्यारहवीं पायदान का ये गीत है फिल्म आमिर से। इसके संगीतकार हैं अमित त्रिवेदी और गीतकार हैं अमिताभ। इस गीत को अपनी आवाज़ दी है अमित त्रिवेदी, मुर्तजा कादिर और अमिताभ की तिकड़ी ने।
आमिर का संगीत मुझे अद्भुत लगता है । विभिन्न प्रकार के ताल वाद्यों (Percussion instruments) का प्रयोग अमित ने ताली की संगत के साथ जिस तरह किया है वो मुझे मंत्रमुग्ध कर देता है। मज़े की बात ये है कि २९ वर्षीय अमित त्रिवेदी को इस गीत की धुन तब दिमाग में आई जब वो एक 20-20 मैच देखने के लिए दोस्तों की प्रतीक्षा करते हुए सैंडविच खाने की योजना बना रहे थे। अमित त्रिवेदी के बारे में विस्तार से चर्चा होगी पर उसके लिए आपको कुछ और पॉयदानों तक प्रतीक्षा करनी होगी।

अमिताभ के बोल गीत के मूड के अनुरूप सूफियाना रंग से रँगे दिखते हैं। अब इस अंतरे को देखें ...हमारे जीवन की सारी डोरियाँ ऊपरवाले के हाथ में हैं इस सीधी सच्ची बात को अमिताभ ने बड़ी खूबसूरती से यहाँ पेश किया है।

सोने चमक में सिक्के खनक में
मिलता नहीं मिलता नहीं
धूल के ज़र्रों में, ढूँढे कोई तो
मिलता वहीं मिलता वहीं
क्या मजाल तेरी मर्जी के आगे बंदों की चल जाएगी

ताने जो उँगली तू, कठपुतली की चाल बदल जाएगी... जाएगी

गीत के अंत तक पहुँचने तक गीत की धुन, बोल और गायिकी तीनों मिलकर ऍसा असर डालते हैं कि मन इसे गुनगुनाए बिना रह नहीं पाता। तो चलिए सुनते हैं मन को शांत करता ये सूफ़ियाना नग्मा


आनी जानी है कहानी
बुलबुले सी है जिंदगानी
बनती कभी बिगड़ती
तेज हवा से लड़ती भिड़ती
हाँ रहम हाँ रहम फरमाए ख़ुदा
महफूज़ हर कदम करना ऐ ख़ुदा
ऐ ख़ुदा....

साँसों की सूखी डोर अनूठी
जल जाएगी जल जाएगी
बंद जो लाए थे हाथ की मुट्ठी
खुल जाएगी खुल जाएगी
क्या गुमान करें काया ये उजली
मिट्टी में मिल जाएगी
चाहें जितनी शमाए रोशन कर लें, धूप तो ढ़ल जाएगी... जाएगी
हाँ रहम हाँ रहम फरमाए ख़ुदा...

सोने चमक में सिक्के खनक में
मिलता नहीं मिलता नहीं
धूल के ज़र्रों में, ढूँढे कोई तो
मिलता वहीं मिलता वहीं
क्या मजाल तेरी मर्जी के आगे बंदों की चल जाएगी
ताने जो उँगली तू, कठपुतली की चाल बदल जाएगी... जाएगी
हाँ रहम हाँ रहम फरमाए ख़ुदा...

मंगलवार, फ़रवरी 03, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 12 : जिंदगी जिंदगी क्या कमी रह गई, आँख की कोर में, क्यूँ नमी रह गई ?

वार्षिक संगीतमाला की बारहवीं पॉयदान पर गीत वो जिसे गाया एक केमिकल इंजीनियर ने, धुन बनाई रहमान ने और गीत के बोल लिखे गुलज़ार ने। फिल्म का नाम तो आप पहचान ही गए होंगे जी हाँ युवराज । रही बात गायक की तो ये कोई नए नवेले गायक नहीं। सबसे पहले मैं इनकी आवाज़ का क़ायल हुआ था फिल्म दिल चाहता है के गीत कैसी है ये रुत की जिसमें.. से । फिर लगान के गीत मितवा में उदित नारायण का इन्होंने बखूबी साथ दिया था। इसके आलावा सपने और Earth 1947 के गीतों को ये अपनी आवाज़ दे चुके हैं।


ये हैं श्रीनिवास ! कनार्टक संगीत में दक्ष इस गायक को अपने सपने को पूरा करने में दस साल लग गए। तो क्या था इनका सपना? श्रीनिवास का सपना था इलयराजा के संगीत निर्देशन में गाना गाना। पर इनका शौक जब तक अंजाम तक पहुँचता तब तक रोज़ी रोटी का ज़रिया भी तो ढूँढना था। सो टेक्सटाइल उद्योग में नौकरी कर ली पर संगीत से अपना नाता नहीं तोड़ा। और बदकिस्मती ये कि जब पहली बार इलइराजा ने गाने का मौका देना चाहा तो गले में संक्रमण के चलते वो मौका गवाँ बैठे। पर जहाँ प्रतिभा हो वहाँ मौके तो मिलेंगे ही । श्रीनिवास ने अपने अगले मौके का भरपूर उपयोग किया और तमिल फिल्म उद्योग की जानी पहचानी आवाज़ बन बैठे।

ए आर रहमान की खासियत है कि वो नए प्रतिभावान चेहरों को हिंदी फिल्म जगत में मौके देते रहते हैं। आपको याद होगा कि फिल्म गुरु में तेरे बिना तेरे बिना बेसुवादी रतियाँ में उन्होंने चिन्मयी को मौका दिया था और इस साल जावेद अली, राशिद अली और इस गीत में श्रीनिवास को अपना हुनर दिखाने का उन्होंने मौका दिया है।

जब भी युवराज का ये गीत सुनता हूँ तो श्रीनिवास की आवाज़ की खनक और स्पष्टता सीधे दिल में उतर जाती है। तो आइए सुनें एकाकीपन के लमहों को बयाँ करता ये उदास नग्मा



जिंदगी जिंदगी क्या कमी रह गई
आँख की कोर में, क्यूँ नमी रह गई
तू कहाँ खो गई..........
तू कहाँ खो गई, कोई आया नहीं
दोपहर हो गई, कोई आया नहीं
जिंदगी जिंदगी...

दिन आए दिन जाए,
सदियाँ भी गिन आए, सदियाँ रे....
तनहाई लिपटी है
लिपटी है साँसों की रस्सियाँ रे
तेरे बिना बड़ी प्यासी हैं
तेरे बिना हैं प्यासी रे
नैनों की दो सखियाँ रे
तनहा रे.. मैं तनहा रे
जिंदगी जिंदगी क्या कमी रह गई....

सुबह का कोहरा है
शाम की धूल है तनहाई
रात भी ज़र्द है
दर्द ही दर्द है रुसवाई
कैसे कटें साँसें उलझी हैं
रातें बड़ी झुलसी झुलसी हैं
नैना कोरी सदियाँ रे, तनहा रे
जिंदगी जिंदगी क्या कमी रह गई....



और ये है इस गीत का वीडिओ यू ट्यूब पर

 

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