Monday, December 31, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2018 : हिंदी फिल्मी गीतों में क्या रही आपकी इस साल की पसंद ?

एक शाम मेरे नाम पर वक़्त आ गया है इस साल की वार्षिक संगीतमाला का जिसमें चुने जाएँगे मेरे द्वारा हर साल की तरह इस साल रिलीज़ हुई फिल्मों के मेरे पच्चीस पसंदीदा गीत। इस साल रिलीज़ हुई सारी फिल्मों के गीतों को सुन चुकने के बाद मैंने तो लगभग अपनी राय कायम कर ली है और उसे यहाँ हर साल की तरह से सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत भी करूँगा पर मुझे उत्सुकता है ये जानने की कि इस साल आपने किन गीतों को पसंद किया?

तो बताइए मुझे इस साल के फिल्मी गीतों में अपनी पसंद । आप अधिकतम पच्चीस गीतों की पसंद बता सकते हैं। जिस किसी की पसंद मुझसे सबसे ज्यादा मिलेगी उसे मिलेगा एक शाम मेरे नाम की तरफ से एक छोटा सा तोहफा...। अभी से लेकर 31 दिसंबर तक आप अपनी पसंद मुझे बता सकते हैं इस पोस्ट के कमेंट सेक्शन में। हर एक गीत के बारे में बताते हुए उसका मुखड़ा और फिल्म का नाम अवश्य लिखें। याद रहे गीत 2018 में रिलीज़ हुई फिल्मों से ही होने चाहिए। :)

इस साल करीब एक सौ दस से भी ज्यादा फिल्में रिलीज हुई जिनकी पूरी सूची आप यहाँ देख सकते हैं। 



वर्ष 2017 की संगीतमाला के सितारों की चर्चा अलग से यहाँ पर हुई थी। नए पाठकों को जिन्हें एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं के बारे में जानकारी नहीं है वो पिछली संगीतमालाओं से यहाँ गुजर सकते हैं..

तो ये थी आपकी पसंद

सबसे पहले तो नए साल की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। मैंने आप सबसे अपने पसंदीदा गीतों की सूची माँगी थी। मुझे जितनी भी सूचियों मिली उन सबको अगर मिला दूँ तो आप लोगों ने मिलकर अस्सी से ज्यादा गानों को अपनी पसंदीदा फेरहिस्त में चुना। जितने लोग उतनी ही अलग अलग पसंद। इन अस्सी गीतों में सिर्फ सात ऐसे नग्में थे जो आप में से पाँच या ज्यादा लोगों ने पसंद किए। जिन नग्मों को सबसे ज्यादा आपकी पसंद का साथ मिला वे थे दिलबरो, आज से तेरी, मेरे वतन, चाव लागा, तेरा यार हूँ मैं, कर ले मैदान  फतेह  और मेरा नाम तू।

खुशी की बात ये है कि इनमें से छः इस संगीतमाला का हिस्सा हैं यानी मेरी पसंद में भी शामिल हैं। मेरी सूची के सिर्फ सात नग्मे ऍसे हैं जिसका नाम आप सब में किसी की सूची में भी नज़र नहीं आया। आप सब की पसंद मेरी पसंद से और आपस में कितनी मिली या नहीं मिली इसके लिए एक तालिका बनाई है। आपने जो गीत चुने वो पीले व आसमानी रंग में दिख रहे हैं। जो गीत मेरी सूची में थे उनके लिए पीला और बाकी के लिए आसमानी़ रंग का इस्तेमाल किया है मैंने। संगीतमाला की रोचकता बनाए रखने के लिए मैंने गीतों के नाम वाला कॉलम हटा दिया है। 



अपने नाम के नीचे के पीले खानों को जोड़ेंगे तो पता चल जाएगा कि आपकी पसंद मेरी पसंद से कितनी मिली। पहले तीन नाम जिनकी पसंद मेरी पसंद से सबसे ज्यादा मिली है वो मित्र हैं
  1. अंकित जोशी : ग्यारह गीत (11/25)
  2. मन्टू कुमार    : दस गीत (10/25)
  3. प्रतिमा शरण :  नौ गीत (09/25)
आप सब से अनुरोध है कि अपना पता मेरे फेसबुक के मेसज बॉक्स में भेज दें। एक छोटा सा तोहफा आपके इंतजार में है। :)

इतना तो स्पष्ट है कि कोई गाना किसी को क्यूँ इतना पसंद आता है इसके लिए हर संगीत प्रेमी की अपनी वजहें होती हैं। मैं अपनी वजहों के साथ आज शाम से संगीतमाला में चुने हुए गीतों की शुरुआत करूँगा। इस दौरान आपकी मुलाकात इस साल चमकी कुछ नई प्रतिभाओं से कराने का इरादा है मेरा। आशा है इस सफ़र में आपका साथ बना रहेगा।

Saturday, December 29, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2018 : वो गीत जो संगीतमाला का हिस्सा बनते बनते रह गए So near yet so far.. Part II

वार्षिक संगीतमाला में बात हो रही है फिलहाल वैसे गीतों की जो भले ही प्रथम पच्चीस में अपनी जगह नहीं बना सके पर जिन्होंने चुने हुए गीतों को कड़ी टक्कर दी। इस कड़ी के पहले भाग में मैंने आपको मिलवाया था आठ ऐसे गीतों से जिनमें से सात का मूड रूमानियत भरा था पर आज जिन गीतों की चर्चा मैं आपसे करूँगा उनमें इसके आलावा एक मस्ती भी है जो गीत की रिदम के साथ आपको थिरकने पर मजबूर कर देती है।


आजकल डांस नंबर का मतलब पंजाबी बोली से मिश्रित ऐसे गीतों से हो गया हैं जिसके संगीत तेज बीट्स पर आधारित हो और साथ में रैप का तड़का हो। अगर आपकी पसंद भी ऐसी है तो माफ कीजिएगा ये पोस्ट आपके लिए नहीं है। मेरे लिए तो लोकधुनों की सुरीली तान भी थिरकने का सबब बनती हैं और पाश्चात्य संगीत से सजी धुनें भी। झूमने झुमाने वाली धुनों के के साथ चुहलबाजी करते शब्द हों तो वो मेरे लिए सोने पर सुहागा का काम करते हैं। आज "एक शाम नेरे नाम" पर साल की इस आखिरी पोस्ट में आप की थाली में पाँच अलग अलग जायकों वाले गीतों भरे व्यंजन परोसने का इरादा है। तो क्या इनका स्वाद लेने के लिए तैयार हैं आप?

मस्ती का रंग घोलने के लिए पहला गीत जो मैंने आपके लिए चुना है वो है फिल्म "पटाखा" से। पटाखा दो ऐसी बहनों की कहानी है जो आपस में हमेशा लड़ती झगड़ती रहती हैं। फिल्म में एक परिस्थिति है जिसमें एक दूसरे के बलमा को नीचा दिखाने की दोनों बहनों में होड़ है। विवाह जैसे उत्सवों में आपने देखा होगा कि गाँवों में गाली गाए जाने की परंपरा होती है। गुलज़ार ने गालियो की उस भाषा को थोड़ी सौम्यता बरतते हुए विशाल भारद्वाज की धुन पर एक शरारत भरा गीत रचा है जो रेखा भारद्वाज और सुनिधि चौहान की आवाज़ में चुहल का एक अनूठा रूप प्रस्तुत करता है।

एक तेरो बलमा रे एक मेरो बलमा 
तेरो गुंडों बलमा रे मेरो नेक बलमा 
मैं तो पर्दो में ढांप लूँगी मेरो बलमा 
नंगा घूमेगो गलियों में तेरो बलमा

 

अंधाधुन एक सस्पेंस थ्रिलर थी। फिल्म की कहानी में तो जो दुविधा थी वो तो थी ही, मुझे तो इस  फिल्म का नाम भी बड़ा अजीब लगा। अगर फिल्म का नाम अंधाधुंध था तो फिर इसे  Andhadhun क्यों लिखा गया और अंधाधुन जैसा कोई शब्द हिंदी में तो है नहीं। चलिए फिल्म की कहानी की तरह ये सस्पेंस भी बना रहे। फिल्म तो ख़ैर काफी सराही गयी, साथ ही अमित त्रिवेदी का संगीत भी पसंद किया गया। आपका तो पता नहीं पर मुझे तो उनके इस गीत से मिलना अच्छा लगा :)



बतौर गायिका ये साल सुनिधि चौहान के लिए शानदार रहा है। अमित त्रिवेदी द्वारा संगीत बद्ध दिव्य कुमार के साथ उनका ये युगल गीत इस साल खूब बजा। पौने दो मिनटों बाद बजने वाला इस गीत का इंटरल्यूड मुझे भी थिरकने पर मजबूर कर गया।


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वैसे इन पाँचों गीतों में से जो गीत पच्चीस गीतों की सूची के सबसे पास था वो था फिल्म पैडमैन का गीत सयानी। एक  लड़की के रजस्वला होने की खुशी को लोकगीतों सी शैली में सजी धुन और मजेदार बोलों से अमित त्रिवेदी और कौसर मुनीर की जोड़ी ने मिलकर एक ऐसा रूप दिया है कि इसे सुनकर तन और मन दोनों तरंगित हुए नहीं रह पाते। ये गीत कुछ यूँ शुरु होता है..

देखो देखो तितली बदल रही रंग 
होते होते होते होते हो रही पतंग 
नयी नयी सी उठे रे मन में उमंग हो.. 
उड़ उड़ जाये हाय सखियों के संग 
लाली लगाई के रंगीली हो गयी 
बिंदिया सजाई के चमकीली हो गयी 
यानी यानी यानी यानी लड़की सयानी हो गयी



   

आज के गीतकारों में अमिताभ भट्टाचार्य एक ऐसे गीतकार हैं जो हर प्रकृति के गीत में अपनी लेखनी का कमाल दिखा जाते हैं। भले ही ठग आफ हिंदुस्तान ने आपके पैसे ठग लिए हों पर अजय अतुल के झुमाने वाले संगीत पर अमिताभ द्वारा  सुरैया के लिए लिखे ये चटपटे बोल एकदम पैसा वसूल हैं। यकीन ना हो ज़रा मुलाहिजा फरमाइए


तू है सौतन मेम की, पाठशाला प्रेम की 
हम अँगूठा छाप इम्तेहान लेगी क्या  
धड़कनों की चाल पे इस कहरवा ताल पे 
ले चुकी आलाप उसपे तान लेगी क्या 
सुरैया जान लेगी क्या  बस कर बस कर यार सुरैया. जान लेगी 

हाय रे, घर सुरैया जान के, सर झुका के आये हो 
दे चुकी है दर्शन अब परसाद देगी क्या 
सबका दिल बहला चुकी, ठुमरियाँ भी गा चुकी 
बाँध के अब साथ में औलाद देगी क्या
सुरैया जान देगी क्या...e

 

मस्ती भरे ये तराने आपको हँसी खुशी के कुछ पल दे गए होंगे ऐसी उम्मीद हैं। अब इस साल मैं आपसे यहीं विदा लेता हूँ। एक शाम मेरे नाम के पाठकों को नए साल की हार्दिक बधाई! अगले साल की शुरुआत होगी साल के पच्चीस चुनिंदा गीतों की विभिन्न कड़ियों के साथ।

Tuesday, December 25, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2018 : वो गीत जो संगीतमाला का हिस्सा बनते बनते रह गए So near yet so far.. Part I

वार्षिक संगीतमाला में गीतों की उल्टी गिनती शुरु होने में अभी भी एक हफ्ते का वक़्त है। इस एक हफ्ते में आपकी मुलाकात कुछ ऍसे गीतों से करवाना चाहता हूँ जो संगीतमाला के बेहतरीन पच्चीस गीतों मे आते आते रह गए। वैसे भी साल में सौ से अधिक रिलीज़ हई फिल्मों के चार सौ से भी ज्यादा गीतों में से पच्चीस गीत छाँटते वक्त सबसे अधिक मुश्किल आख़िरी की पायदानों के लिए होती है जिसके दावेदार कई नग्मे होते हैं। पिछले साल के मुकाबले ये साल संगीत के लिहाज़ से बेहतर ही रहा है, ऐसा मुझे गीतों को सुनते वक़्त लगा। चुने हुए शुरुआती गीतों की सूची साठ की थी जिसे कतरते कतरते पच्चीस तक लाना पड़ा। फिर भी दस बारह गीत तो जरूर ऐसे रहे जो गायिकी, बोलों और संगीत की दृष्टि से शामिल गीतों को अच्छी टक्कर देते रहे।


इनमें से तो कुछ मेरे बेहद अज़ीज़ हैं और उन पर अलग से भी आलेख लिखने का मेरा इरादा है। तो चलिए शुरुआत करते हैं फिल्म परी के एक गीत से जिसे लिखा अन्विता दत्त ने और धुन बनाई अनुपम राय ने। अनुपम ने गिटार आधारित इस धुन को गवाया नवोदित गायक इशान मित्रा से। अन्विता के गहरे शब्दों को इशान की आवाज़ की मुलायमियत पूरा न्याय करती दिखती है। ये गीत मेरी गीतमाला की आख़िर में बाहर हो गया और इसका मुझे अफसोस भी है पर इस गीत के बोलों के साथ इसका एक और जिक्र एक शाम मेरे नाम पर कभी जरूर होगा इसका विश्वास दिलाता हूँ। तो अन्विता के इन प्यारे शब्दों के साथ फिलहाल तो सुनिए ये पूरा गीत..

दिल के बिछौने जो थे कोरे कोरे 
रंग से खिलने लगे 
ख्वाब के बगीचे धागा धागा चुने
फुर्सत से सिलने लगे 




आतिफ असलम की आवाज़ इस साल ढेर सारे फिल्मी गीतों में गूँजी है और अरिजीत के एकाधिपत्य को इस बार वो तोड़ने में काफी हद तक सफल रहे हैं। लैला मजनूँ के आलावा दास देव में गाया उनका नग्मा सहमी सी धड़कन इस बार पच्चीस गीतों की दौड़ में शामिल नहीं हो पाया। लैला मजनूँ के अन्य गीतों की तुलना में इस गीत के बोल मुझे थोड़े कमज़ोर लगे पर इसकी धुन और पर्दे पर इसका फिल्मांकन इतना अच्छा जरूर है कि इसे एक बार सुना जाए।

 
 Wo Rishta

अंकित तिवारी की चमक आशिकी के बाद फीकी जरूर पड़ी है और इस साल उनका कोई बड़ा एलबम देखने को नहीं मिला पर फिल्म काशी में अभेंद्र कुमार उपाध्याय की जोड़ी के साथ उन्होंने एक बेहद मधुर गीत रचा जो गीतमाला में "मेरी खामोशी" है की तरह एक नज़दीकी दस्तक दे गया।

इक चुटकी रोज़ाना तुम हँसी दे जाना
मुट्ठी भर कुछ साँसे पास में रख जाना
बिन शर्त बाँधे जो हमको 
वो रिश्ता तुम ले आना

अभेंद्र इश्किया गीत लिखने में माहिर हैं और ये गीत उसका एक अच्छा उदहारण है।


रूमानी गीत अगर शास्त्रीयता की चादर ओढ़े हों तो उनका नशा धीरे धीरे चढ़ता है। रेखा भारद्वाज और राशिद खाँ की जोड़ी का वोडका डॉयरीज के लिए गाया ये नग्मा इसी श्रेणी का नग्मा है जिसे लिखा मशहूर शायर आलोक श्रीवास्तव ने। इस गीत को कभी शांत पलों में फुर्सत से सुनिए अच्छा लगेगा..

सखि री पिया को, जो मैं ना देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ
वो जिनमें उनकी ही रोशनी हो
कहीं से ला दो वैसी अँखियाँ


 

इस साल गीतों में सबसे ज्यादा भगवान शिव की चर्चा हुई। फिल्म काशी और केदारनाथ में उनकी महिमा को गीत के बोलों में बाँधा गया पर अमिताभ भट्टाचार्य ने केदारनाथ में जो गीत लिखा उसे साल के सबसे बेहतरीन भक्ति गीत में शामिल करना चाहिए ऐसी मेरी राय है। 


इस साल नए संगीतकारों, गीतकारों और गायक गायिकाओं की बाढ़ सी आई दिखी। जितनी छोटे बजट की फिल्में थीं उनमें से ज्यादातर की कमान अनसुने नामों के हाथ थी। पुरुष गायकों में सोनू निगम, जावेद अली और केके को चुनिंदा गीतों से संतोष करना पड़ा। ऍसे में केके की आवाज़ को फिल्म जलेबी के इस गीत में सुनना अच्छा लगा।


इस साल भी अगर किसी गायक को सबसे ज्यादा मौके मिले तो वे अरिजीत सिंह थे। अरिजीत एक गुणी गायक हैं पर उनकी आवाज़ का इस्तेमाल बहुतेरे गीतों में एक ही तरह से हो रहा है। आज वो युवाओं की चाहत हैं तो हर फिल्म का रूमानी गीत ज्यादातर उनकी झोली में गिरता है। संगीतकार उन्हें जो धुने दे रहे हैं वो उसी बँधे बँधाए ढर्रे पर चलती हैं जिन्हें सुनकर आपको शायद ही लगे कि आपने कुछ नया सुना। गीतमाला में मैंने उन गीतों को तरजीह देने की कोशिश की जिन्होंने संगीत रचते कुछ नया सृजन करने की कोशिश की। यही वज़ह रही कि अरिजीत के बहुत सारे गीत आख़िरी सूची से बाहर हो गए। ये अंत तक था पर बेहतर गीतों की वज़ह से इसे भी  अंत में बाहर छिटकना पड़ा।

 
गुलज़ार मेरे प्रिय गीतकार रहे हैं। इस साल भी उन्होंने पटाखा, राजी और सूरमा जैसी फिल्मी के लिए अपनी कलम चलाई है। सूरमा का ये गीत कुछ हिस्सों में मुझे बेहतरीन लगता है और कुछ हिस्सों में पहले की धुनों का दोहराव नज़र आता है।

गिन के देख बदन पे नील दिए हैं इश्क़ ने 
पड़े जो हाथ में छाले छील दिए हैं इश्क़ ने ...
याद आ जाये तो तेरा नाम ले के झूम लूँ 
शाम आ जाए तो उठ के चाँद का माथा चूम लूँ...

 जैसी पंक्तियाँ से गुलज़ार मन को बाग बाग कर देते हैं। ज़ाहिर है ते गीत भी संगीतमाला में दाखिल होने के बेहद करीब था।


आज तो जो गीत मैंने आपको सुनाए उनमें ज्यादा का रंग रूमानी था। संगीतमाला से थोड़ी दूरी पर छूटने वाले गीतों की अगली कड़ी वैसे गीतों की होगी जिसमें होगा मस्ती का रंग.. :).

Friday, December 21, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2018 की तैयारियाँ और एक नज़र पिछली संगीतमालाओं पर...

नया  साल आ चुका है और एक शाम मेरे नाम पर वार्षिक संगीतमालाओं के लिए साल भर के पच्चीस बेहतरीन गीत चुनने की क़वायद ज़ारी है। दिसंबर से ही एक बोझ सा आ जाता है मन में कि क्या पच्चीस गीतों की फेरहिस्त आसानी से पूरी हो पाएगी। पर हर साल प्रदर्शित हुई लगभग सौ से ज़्यादा फिल्मों के गीतों से गुजरता हूँ तो कभी कभी गीतों के अटपटेपन से मन में कोफ्त सी हो जाती है पर जैसे जैसे गीतों को चुनने की प्रक्रिया अपने आख़िरी चरण में पहुँचती है अच्छे गीतों को सुनकर सारा कष्ट काफूर हो जाता  है और चुनने लायक गीतों की संख्या पच्चीस से भी अधिक होने लगती है। फिर समस्या आती है कि किसे छोड़ूँ और किसे रखूँ?

जैसा कि मैं पहले भी इस चिट्ठे पर कह चुका हूँ कि वार्षिक संगीतमालाएँ मेरे लिए नए संगीत में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उसको आप तक संजों लाने की कोशिश मात्र है। बचपन से रेडिओ सीलोन की अमीन सयानी की बिनाका और फिर विविधभारती पर नाम बदल कर आने वाली सिबाका गीतमाला सुनता रहा। उसका असर इतना था कि जब 2005 के आरंभ में अपने रोमन हिंदी ब्लॉग की शुरुआत की तो मन में एक ख्वाहिश थी कि अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के गीतों को पेश करूँ।

तो आइए एक नज़र डालें पिछली  संगीतमालाओं की तरफ। मैंने अपनी पहली संगीतमाला की शुरुआत 2004  के दस बेहतरीन गानों से की जिसे 2005 में 25 गानों तक कर दिया। 2006 में जब खालिस हिंदी ब्लागिंग में उतरा तो ये सिलसिला इस ब्लॉग पर भी चालू किया। इस साल मैंने पिछली सारी संगीतमालाओं में बजने वाले गीतों को एक जगह इकठ्ठा कर दिया है ताकि नए पाठकों को भी इस सिलसिले (जो अपने 15 वें साल से गुजर रहा है) की जानकारी हो सके। गर आपको किसी साल विशेष से जुड़े गीत संबंधित आलेख तक पहुँचना है तो उस साल की सूची देखिए और गीत मिलने से उससे जुड़ी लिंक पर क्लिक कीजिए। आप संबंधित आलेख तक पहुँच जाएँगे। 

वार्षिक संगीतमाला 2017


वार्षिक संगीतमाला  2016 


1. चन्ना मेरेया Channa Mereya
2. इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है गुम है गुम है Ikk Kudi
3. जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya
4. पश्मीना धागों के संग कोई आज बुने ख़्वाब Pashmina
5. बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है   Hanikaarak Bapu
6. होने दो बतियाँ, होने दो बतियाँ   Hone Do Batiyan
7.  क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'?  Kyun Re..
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9.   जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

वार्षिक संगीतमाला 2015




वार्षिक संगीतमाला 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013


 वार्षिक संगीतमाला 2013 संगीत के सितारे

वार्षिक संगीतमाला 2012 

संगीतकारों की बात करूँ तो ये साल प्रीतम के नाम रहा। बर्फी के संगीत ने ये साबित कर दिया कि प्रीतम हमेशा 'inspired' नहीं होते और कभी कभी उनके संगीत से भी 'inspired' हुआ जा सकता है। ऐजेंट विनोद फिल्म चाहे जैसी रही हो वहाँ भी प्रीतम का दिया संगीत श्रोताओं को खूब रुचा। Cocktail के गीतों ने भी झूमने पर मजबूर किया। अमित त्रिवेदी ने भी इस साल इश्क़ज़ादे, इंग्लिश विंग्लिश और अइया के लिए कुछ खूबसूरत और कुछ झूमने वाले नग्मे दिए। अजय अतुल का अग्निपथ के लिए किया गया काम शानदार था। नवोदित संगीतकार स्नेहा खानवलकर ने GOW-I और GOW-II में जिस तरह एक बँधे बँधाए दर्रे से हटकर एक नए किस्म के संगीत और बोलों पर काम किया वो निश्चय ही प्रशंसनीय है। शंकर अहसान लॉय, सलीम सुलेमान, विशाल शेखर के लिए ये साल फीका फीका सा ही रहा।

 


 वार्षिक संगीतमाला 2011  

वर्ष 2011 में क्रस्ना और राजशेखर की नवोदित जोड़ी ने तनु वेड्स मनू के लिए कमाल का गी संगीत दिया और रंगरेज़ जैसे बेमिसाल गीत की बदौलत सरताज गीत का सेहरा अपने सर बाँध लिया। 

  

वार्षिक संगीतमाला 2010 

2009 की बादशाहत गुलज़ार ने 2010 में भी कायम रखी दिल तो बच्चा है जी में राहत के गाए शीर्षक गीत के द्वारा।
2010 की गीतमाला में  गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...
  1.  दिल तो बच्चा है जी संगीत:विशाल भारद्वाज, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र :दिल तो बच्चा है जी
  2. नैन परिंदे पगले दो नैन.., संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायिका: शिल्पा राव चलचित्र :लफंगे परिंदे
  3. सजदा तेरा सजदा दिन रैन करूँ , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : My Name is Khan
  4. फूल खिला दे शाखों पर पेड़ों को फल दे मौला, संगीत: रूप कुमार राठौड़, गीत : शकील आज़मी, गायक : जगजीत सिंह, चलचित्र : Life Express 
  5.  बिन तेरे बिन तेरे कोई ख़लिश है, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : शफ़कत अमानत अली खाँ, सुनिधि चौहान, चलचित्र : I hate Luv Storys
  6. तेरे मस्त मस्त दो नैन, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : फ़ैज़ अनवर, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : दबंग
  7.  सुरीली अँखियों वाले, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : वीर
  8. तू ना जाने आस पास है ख़ुदा, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : अनजाना अनजानी
  9. मन के मत पे मत चलिओ, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : आक्रोश
  10. मँहगाई डायन खात जात है, संगीत:राम संपत, गायक :रघुवीर यादव, चलचित्र : पीपली लाइव
  11. देश मेरा रंगरेज़ ऐ बाबू, संगीत:Indian Ocean, गीत :स्वानंद किरकिरे, संदीप शर्मा , गायक :राहुल राम, चलचित्र : पीपली लाइव
  12. कान्हा बैरन हुई रे बाँसुरी, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : रेखा भारद्वाज, चलचित्र : वीर
  13. चमचम झिलमिलाते ये सितारों वाले हाथ, संगीत:शैलेंद्र बार्वे, गीत : जीतेंद्र जोशी, गायक : सोनू निगम, चलचित्र : स्ट्राइकर
  14. बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार वे, संगीत: विशाल शेखर, गीत : कुमार, गायक : श्रेया घोषाल, चलचित्र : I hate Luv Storys
  15. आज़ादियाँ, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  16. तुम जो आए, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  17. सीधे सादे सारा सौदा सीधा सीधा होना जी , संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : अनुपम अमोद, चलचित्र : आक्रोश
  18. पी लूँ तेरे गोरे गोरे हाथों से शबनम, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक :मोहित चौहान चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  19. Cry Cry इतना Cry करते हैं कॉय को, संगीत: ए आर रहमान, गीत : अब्बास टॉयरवाला, गायक : राशिद अली, श्रेया घोषाल, चलचित्र : झूठा ही सही
  20. नूर ए ख़ुदा , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : शंकर महादेवन, अदनान सामी, श्रेया घोषाल , चलचित्र : My Name is Khan
  21. मन लफंगा बड़ा अपने मन की करे, संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :लफंगे परिंदे
  22. गीत में ढलते लफ़्जों पर, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  23. यादों के नाज़ुक परों पर, संगीत: सलीम सुलेमान, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :आशाएँ
  24. खोई खोई सी क्यूँ हूँ मैं, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अनुषा मणि, चलचित्र : आयशा
  25. तुम हो कमाल, तुम लाजवाब हो आयशा , संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अमित त्रिवेदी, चलचित्र : आयशा 

वार्षिक संगीतमाला 2009  

साल 2009  में पहली बार मेरे चहेते गीतकार गुलज़ार पहली पायदान पर कमीने फिल्म के लिए विशाल भारद्वाज के संगीतबद्ध गीत इक दिल से दोस्ती के सहारे कब्जा जमाया।

2009 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...

 वार्षिक संगीतमाला 2008   

में सरताज गीत का  का सेहरा बँधा युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी के सर पर। सरताज गीत था शिल्पा राव के गाए और अमिताभ द्वारा लिखे इस बेहद संवेदनशील नग्मे के बोल थे इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला !.

2008 की गीतमाला में बाकी गीतों का सिलसिलेवार क्रम ये था..

वार्षिक संगीतमाला 2007 में एक बार फिर प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध, 'तारे जमीं पर' के गीतों के बीच ही प्रथम और द्वितीय स्थानों की जद्दोजहद होती रही। पर माँ...जैसे नग्मे की बराबरी भला कौन गीत कर सकता था


2007 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी..

वार्षिक संगीतमाला 2006 में ओंकारा और गुरु के गीत छाए रहे पर बाजी मारी 'उमराव जान' के संवेदनशील गीत 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' ने। इस गीत और दूसरे नंबर के गीत 'मितवा ' को लिखा था जावेद अख्तर साहब ने


2006 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी.
  1. अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो (उमराव जान)
  2. मितवा... ( कभी अलविदा ना कहना )
  3. ओ साथी रे दिन डूबे ना... (ओंकारा)
  4. जागे हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो (गुरू)
  5. तेरे बिन मैं यूँ कैसे जिया... (बस एक पल )
  6. बीड़ी जलइ ले, जिगर से पिया.... (ओंकारा)
  7. अजनबी शहर है, अजनबी शाम है.... ( जानेमन )
  8. तेरे बिना बेसुवादी रतिया...(गुरू)
  9. मैं रहूँ ना रहूँ ....( लमहे-अभिजीत )
  10. लमहा लमहा दूरी यूँ पिघलती है...(गैंगस्टर)
  11. नैना ठग लेंगे...... (ओंकारा)
  12. तेरी दीवानी.... ( कलसा- कैलाश खेर)
  13. रूबरू रौशनी है...... (रंग दे बसंती)
  14. क्या बताएँ कि जां गई कैसे...(कोई बात चले)
  15. ये हौसला कैसे झुके.. ( डोर )
  16. ये साजिश है बूंदों की.....( फना )
  17. सुबह सुबह ये क्या हुआ....( I See You.)
  18. मोहे मोहे तू रंग दे बसन्ती....( रंग दे बसंती )
  19. चाँद सिफारिश जो करता.... ( फना )
  20. बस यही सोच कर खामोश मैं......( उन्स )

वार्षिक संगीतमाला 2005 में बाजी मारी स्वानंद किरकिरे और शान्तनु मोइत्रा की जोड़ी ने जब परिणिता फिल्म का गीत 'रात हमारी तो चाँद की सहेली' है और हजारों ख्वाहिशें ऍसी के गीत 'बावरा मन देखने चला एक सपना' क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान पर रहे थे।




वार्षिक संगीतमाला 2004 में मेरी गीतमाला के सरताज गीत का सेहरा मिला था फिर मिलेंगे में प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध गीत "खुल के मुस्कुरा ले तू" को जबकि दूसरे स्थान पर भी इसी फिल्म का गीत रहा था कुछ खशबुएँ यादों के जंगल से बह चलीं। ये वही साल था जब कल हो ना हो, रोग, हम तुम, मीनाक्षी और पाप जैसी फिल्मों से कुछ अच्छे गीत सुनने को मिले थे।




अब ये स्पष्ट कर दूँ कि इस गीतमाला का पॉपुलरटी से कोई लेना देना नहीं है। गायिकी, संगीत , बोल और इनका सम्मिलित प्रभाव इन सभी आधारों को बराबर वज़न दे कर मैं अपनी पसंद के गीतों का क्रम तैयार करता हूँ। कई बार ये स्कोर्स लगभग बराबर होते हैं इसलिए गीतों को ऊपर नीचे करना बड़ा दुरुह होता है।

Saturday, December 01, 2018

किसी गाँव में इक हसीना थी कोई..वो सावन का भीगा महीना थी कोई Jagjit's journey as music director !

प्रेम गीत और अर्थ के बाद अस्सी और नब्बे के दशक में जगजीत सिंह को करीब दर्जन भर फिल्मों के संगीत निर्देशन का मौका मिला। इस सिलसिले में उनकी गीतकार गुलज़ार के साथ संगीत निर्देशित  फिल्म सितम का जिक्र तो मैंने इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में किया ही था। इसके आलावा उन्होंने बिल्लू बादशाह, कानून की आवाज़, जिस्म का रिश्ता, आज, आशियाना, यादों का बाजार और खुदाई में संगीत दिया। मुझे भरोसा है कि एक दो को छोड़ शायद ही आप सबने इनमें किसी फिल्म का नाम सुना हो।

जगजीत सिंह कभी भी मुख्यधारा के संगीतकार नहीं रहे। अस्सी के दशक में ग़ज़ल गायिकी में उनका सितारा जिस बुलंदी पर था उसमें फिल्म संगीत पर ज्यादा ध्यान देना मुमकिन भी नहीं था। अगर इनमें महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्में आज और आशियाना को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो उन्होंने जिस तरह की फिल्में कीं उन्हें देख के तो यही लगता है कि ये काम तब पैसों के लिए कम बल्कि अपने मित्रों का मन रखने के लिए उन्होंने ज़्यादा किया।


इन गुमनाम सी फिल्मों में भी कुछ गीत अपना अगर छोटा सा भी मुकाम बना पाए तो उसमें ज्यादातर में उनकी आवाज़ का हाथ रहा। आज ऐसे ही चार अलग अलग गीतों का का जिक्र आपसे करूँगा जिसमें दो को ख़ुद जगजीत ने अपनी आवाज़ से सँवारा था। ये तो नहीं कहूँगा कि ये गीत हर दृष्टि से अलहदा थे पर हाँ इतना तो हक़ बनता ही था इनका कि ये संगीत के सुधी श्रोताओं तक पहुँचते।

फिल्म "आज" में उस दौर के युवा अभिनेता कुमार गौरव और राजकिरण की मुख्य भूमिकाएँ थीं। आज के बड़े सितारे अक्षय कुमार ने भी इसी फिल्म में एक छोटी सी भूमिका से अपनी फिल्मी पारी की शुरुआत की थी। जगजीत ने इस फिल्म अपनी पुरानी रचना वो क़ाग़ज की कश्ती के आलावा तीन गीत रचे जिनमें घनशाम वासवानी, विनोद सहगल और जुनैद अख्तर के सम्मिलित स्वर में गाई मदन पाल की ग़ज़ल ज़िंंदगी के बदलते रंगों की तस्वीर को कुछ यूँ पेश करती है।

ज़िंंदगी रोज़ नए रंग में ढल जाती है, 
कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है

कभी छा जाए बरस जाए घटा बेमौसम 
कभी एक बूँद को भी रुह तरस जाती है.... 


जगजीत मुखड़े के पहले अपने संगीत में भांति भांति के वाद्यों का इस्तेमाल करते हैं। बाकी का काम उनके शागिर्द रहे घनशाम और अशोक बखूबी कर जाते हैं।

इसी फिल्म में जगजीत का गाया गीत फिर आज मुझे तुमको इतना ही बताना है..हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है भी सुनना मन में आशा की ज्योति जला लेने जैसा लगता है।


आशियाना में जगजीत का रचा और गाया नग्मा आज भी हम सब की जुबाँ पर आज भी गाहे बगाहे आता ही रहता है। मदन पाल के लिखे इस गीत का मुखड़ा था हमसफ़र बन के हम, साथ हैं आज भी.... फिर भी है ये सफ़र अजनबी अजनबी। नजदीक रह कर भी दो इंसान मानसिक रूप से दूर हो जाएँ तो साथ साथ रहना भी कितना पीड़ादायक हो जाता है ये गीत उस दर्द की गवाही देता है। 


मजे की बात ये है कि इस गीत में मार्क जुबेर के साथ जगजीत सिंह फिल्मी पर्दे पर भी नज़र आए।

जगजीत सिंह से जुड़ी इस श्रृंखला का अंत मैं उस नज़्म से करना चाहूँगा जिसे गाया था दिलराज कौर ने। राजेश खन्ना और दीपिका पर फिल्मायी इस नज़्म की लय और दिलराज जी की सुरीली आवाज़ इसे बार बार सुनने को मजबूर करती है। सुदर्शन फाकिर के शब्द किस तरह मोहब्बत से महरूम एक लड़की का दर्द बयाँ करते हैं वो उनकी लिखी इन पंक्तियों में देखिए...

किसी गाँव में इक हसीना थी कोई
वो सावन का भीगा महीना थी कोई 
जवानी भी उस पर बड़ी मेहरबां थी
मोहब्बत ज़मीं है तो वो आसमां थी 
वो अब तक है जिन्दा वो अब तक जवां है
किताबे मोहब्बत की वो दास्तां  है
उसे देखकर मोम होते थे पत्थर 
मगर हमसे पूछो न उसका मुकद्दर 
न घर की बहू वो बनाई गई थी 
अलग उसकी महफ़िल सजाई गई थी 
वो गाँव के लड़कों को चाहत सिखाती 
सबक वो मोहब्बत का उनको पढ़ाती

मगर वक़्त कोई नया रंग लाया 
न पूछो कहानी में क्या मोड़ आया 
हुआ प्यार उसको किसी नौजवां से 
नतीजा न पूछो हमारी जुबां से 
मोहब्बत की राहों पे जिस दिन चली वो
ज़माने की नज़रों में मुजरिम बनी वो 
नसीबों  में उसके मोहब्बत नहीं थी 
मोहब्बत की उसको इजाज़त नहीं थी 

ज़माने ने आखिर उसे जब सजा दी 
हसीना ने अपनी ये जां तक लुटा  दी 
वही आसमां है वही ये जमीं है 
जवां  वो हसीना कही भी नहीं है 
मगर रुहे उल्फत की मंजिल जुदा है 
मोहब्बत की दुनिया का अपना खुदा है 


वो अब तक है ..महीना थी कोई


दिलराज कौर की आवाज़ से मेरी मुलाकात उनकी गायी ग़ज़ल इतनी मुद्दत बाद मिले हो.. से हुई थी। इसके आलावा उनकी आवाज़ में इक्का दुक्का गीत सुनता रहा हूँ। इतनी प्यारी आवाज़ से हमारा राब्ता नब्बे के दशक में छूट सा गया। दिलराज़ इस नज़्म में भी नाममात्र के वाद्य यंत्रों के बावज़ूद अपनी आवाज़ का दिल पर गहरा असर छोड़ती हैं।

नब्बे के दशक में पुत्र की असमय मौत ने जगजीत को हिला कर रख दिया। वे ग़ज़लों और फिल्मी दुनिया से दूर होते चले गए। ग़ज़लों से तो उन्होंने दुबारा नाता जोड़ा पर फिल्मों में उन्होंने बतौर संगीतकार उसके बाद नाममात्र का काम किया।

चार भागों तक चली इस श्रृंखला का आज यहीं समापन होता है। कैसी लगी आपको जगजीत जी से जुड़ी ये श्रृंखला। अपनी राय देना ना भूलिएगा।

 

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